युगवार्ता

Blog single photo

दिल्ली से बाहर केजरी?

04/03/2020

दिल्ली से बाहर केजरी?

संजय वर्मा

दिल्ली विधान सभा चुनाव में मिली जीत के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साहित होना स्वाभाविक है लेकिन वामपंथी मीडिया जो खुद को ‘लिबरल’ कहता है, कोई कम उत्साहित नहीं है। उसे अरविंद केजरीवाल के रूप में एक और राजनीतिक चेहरा मिल गया है जिसे वह आने वाले लंबे समय तक एक गैर-भाजपाई और गैरकां ग्रेसी चेहरे के तौर पर आभामंडित कर सकता है। कहा जा रहा है कि देश में यह पहला चुनाव था जिसमें सरकार के काम के आधार पर मतदान हुआ और केजरीवाल को उनके विकास कार्यों के लिए दिल्ली की जनता ने एक बार फिर से अपना मुख्यमंत्री चुना है। मीडिया के कई मठाधीश तो केजरीवाल को 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का संभावित चेहरा भी घोषित कर रहे हैं और कह रहे हैं कि ‘आप’ मार्का राजनीति के माध्यम से भाजपा को चुनावी पराजय दी जा सकती है। एक बार फिर से गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे से संबंधित खबरें भी प्लांट की जाने लगी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच दिल्ली विधान सभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के ‘बहुप्रचारित काम’ के आधार पर मतदान हुआ है और क्या देश के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है? क्या आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की जीत इतनी महत्वपूर्ण है कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकने वाले नेता के तौर पर देखा जाए? क्या केजरीवाल में वह क्षमता है कि वे खुद को तीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर स्थापित कर सकें? सबसे पहले काम के आधार पर पहली बार जनता के समर्थन की बात को ही लें।

क्या अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा एक बार फिर जोर मारेगी या फिर वे इससे उसी तरह दूर रहेंगे, जैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान, जामिया या शाहीन बाग पर मुंह खोलने से बचते रहे थे।

अगर केजरीवाल से पहले किसी को काम के आधार पर वोट नहीं मिला था तो फिर 2003 और 2008 में हुए दिल्ली के विधान सभा चुनाव में ही तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को किस आधार पर वोट मिले थे? उन चुनावों में मेट्रो, लाईओवर और सीएनजी बसों के सहारे विकास के नाम पर ही तो वोट मांगे गए थे। पिछले 20 सालों से ओडिशा में नवीन पटनायक किस आधार पर मुख्यमंत्री चुने जाते रहे हैं? गुजरात में बार-बार और लगातार भाजपा की जो राज्य सरकारें बनती रही हैं उनकी सफलता के पीछे कौन से कारण हैं? मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में शिवराज सिंह और रमण सिंह ने क्या काम के आधार पर सरकारें नहीं बनाईं थीं।

नीतीश कुमार क्या सुशासन के नाम पर चुनाव-दर- चुनाव कामयाबी हासिल नहीं करते रहे हैं? पिछले लोकसभा चुनाव में क्या भाजपा की भारी-भरकम जीत का कारण विकास कार्य नहीं थे? ऐसा कोई राजनीतिक दल है क्या जिसने लगातार दूसरी बार जीत हासिल करने के बाद यह नहीं कहा हो कि जनता ने उसे उसके द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर जिताया है? फिर केजरीवाल को आजादी के बाद, काम के आधार पर चुनाव जीतने वाले पहले मुख्यमंत्री होने का श्रेय कैसे दिया जा सकता है? जबकि सच्चाई यही है कि अगर कांग्रेस ने दिल्ली विधान सभा चुनाव दिल से लड़ा होता और उसे 15 प्रतिशत मत भी मिल गए होते तो अभी दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर केजरीवाल नहीं बल्कि भाजपा का कोई नेता बैठा होता। इस बार, पांच प्रतिशत से भी कम मतों पर अंटक गई कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में 22.46 प्रतिशत मत मिले थे और पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। कांग्रेस के ‘वाकओवर’ ने दिल्ली चुनाव पर सबसे अधिक प्रभाव डाला है और इस सच्चाई को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने स्वीकार भी किया है।

दिल्ली की जीत से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर पैर पसारने का प्रयास करने की घोषणा की है जिसके अंतर्गत पहले देश के सभी प्रमुख नगरों की परिषदों के चुनाव लड़े जाएंगे। इसके अलावा, कुछ राज्यों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए प्रांतीय स्तर के चुनाव लड़ने की बात भी की जा रही है। इसमें नया क्या है? क्या 2015 के बाद, आम आदमी पार्टी ने पंजाब, गोवा, हरियाणा सहित राज्यों में अपनी प्रासंगिकता बढ़ाने के प्रयास नहीं किए थे लेकिन उनमें से केवल पंजाब में ही उसे महत्वपूर्ण सफलता मिली जब पार्टी मुख्य विपक्षी दल की हैसियत पाने में सफल रही। लेकिन उसके बाद, पार्टी पंजाब में लगातार कमजोर ही हुई है। ऐसे में यह मान लेने का कोई कारण नहीं है कि आप को दिल्ली जैसी सफलता दूसरे प्रदेशों में भी मिल सकती है। दिल्ली में आप के आगे बढ़ने का एक बड़ा कारण अन्ना हजारे का आंदोलन था जिसकी वजह से यहां उसके पक्ष में माहौल बना। केजरीवाल को मिली जीत के पीछे तत्कालीन यूपीए सरकार के प्रति जनता की नाराजगी की बहुत बड़ी भूमिका थी। लेकिन अन्य राज्यों में वैसा कोई फायदा नहीं हुआ और अपने गठन के सात वर्षों बाद भी आम आदमी पार्टी की पहचान मुख्य तौर पर दिल्ली की पार्टी के रूप में ही है। यहां भी पार्टी बस विधान सभा तक ही सीमित है। उसका एक भी लोकसभा सदस्य नहीं है और नगर निगम में भी भाजपा का ही वर्चस्व है। जहां तक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दिए जाने का सवाल है तो 2014 के लोकसभा चुनाव में वे ऐसा कर चुके हैं। ये और बात है कि वाराणसी में उन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। कथित ‘लिबरल’ मीडिया जो भी कहे लेकिन 8 फरवरी को हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव के लिए प्रचार करने के दौरान, केजरीवाल जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने से बचते रहे उससे जाहिर है कि उन्हें हकीकत का एहसास है। अरविंद केजरीवाल जानते हैं कि दिल्ली जैसे छोटे और आधे राज्य में तो भाजपा को हराया जा सकता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई करिश्मा कर पाना उनके बूते के बाहर की बात है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली बनारस की हार और 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में मिला तीसरा स्थान, उन्हें वास्तविकता का एहसास कराने के लिए पर्याप्त है। वैसे भी इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि अपनी-अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बोझ से दबे गैरकां ग्रेसी और गैर-भाजपाई क्षेत्रीय दलों के नेता उनके नेतृत्व को स्वीकार करने की मानसिकता में आने को तैयार हैं।

पहले से ही वहां ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव, मायावती जैसे नेताओं की वजह से ‘ट्रैफिक जाम’ है। गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे का प्रयोग बार-बार विफल हुआ है लेकिन जब भी किसी राज्य में किसी क्षेत्रीय दल की सरकार बनती है, मीडिया का एक तबका मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने लगता है। जबकि देश की राजनीति की एक बड़ी सच्चाई यह है कि अब तक ऐसा कोई गठबंधन सफल नहीं हो सका है जिसमें भाजपा और कांग्रेस में से एक न हो। लेकिन कथित ‘लिबरल मीडिया’ अपने इस प्रयास में वीपी सिंह के जमाने से ही लगा हुआ है जिन्होंने भाजपा और वामपंथियों, दोनों से ही समर्थन लेकर सरकार बनाने का असंभव प्रतीत होने वाला कमाल किया था। उसके बाद भी ऐसे प्रयास होते रहे हैं लेकिन हर बार विफलता ही हाथ लगी है। उनके समर्थन में खड़ा मीडिया का एक तबका कितना भी उकसाए, अरविंद केजरीवाल तीसरे मोर्चे के इस चक्कर से उसी तरह दूर रहेंगे, जैसे दिल्ली विधान सभा चुनाव के दौरान, जामिया या शाहीन बाग पर मुंह खोलने से बचते रहे थे। अभी तो उनकी प्राथमिकता दिल्ली नगर निगम चुनाव ही है, जिसमें कोई प्रभाव छोड़ने में पिछली बार वे विफल रहे थे। वैसे भी लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर है।


 
Top