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लौट के बुद्धू घर को आए..

19/06/2019

लौट के बुद्धू घर को आए

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 बद्रीनाथ वर्मा/संजय सिंह

दो दशक से भी अधिक समय तक चली दुश्मनी को भुलाकर मायावती व अखिलेश ने बड़े ही धूम धड़ाके के साथ मोदी-शाह की जोड़ी को परास्त करने के लिए महागठबंधन का ऐलान किया था। लेकिन केवल अपना अस्तित्व बचाने के लिए एकजुट हुए ये दल 112 दिन भी साथ नहीं चल पाये।

 लो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों। यूं तो यह एक मशहूर गीत का मुखड़ा है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बेमेल महागठबंधन के टूट जाने के बाद मायावती व अखिलेश पर बिल्कुल फिट बैठता है। वादा था चुनाव दर चुनाव साथ निभाने का लेकिन हार के बाद यह साथ 12 दिनों तक भी नहीं रह पाया। 12 का जिक्र यहां इसलिए किया गया है क्योंकि 12 जनवरी 2019 को ही एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस के जरिए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश से भाजपा के सफाये की बड़ी-बड़ी डींगे हांकते हुए महागठबंधन की नींव रखी थी। इसके तहत यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से दो सीटें कांग्रेस व दो सीटें राष्ट्रीय लोकदल के लिए छोड़ते हुए सपा-बसपा ने 38- 38 सीटों पर लड़ना तय किया था। बाद में सपा ने अपने कोटे से राष्ट्रीय लोकदल को एक और सीट देकर महागठबंधन को और भी मजबूती देने का संदेश दिया था। हालांकि एकमात्र मोदी विरोध के नाम पर सपा-बसपा व रालोद की जातिगत अंकगणित पर आधारित इस गठबंधन को भारतीय जनता पार्टी की सामाजिक केमिस्ट्री ने बुरी तरह से विफल कर दिया। नतीजा, महागठबंधन के छिन्न-भिन्न होने के रूप में आया। मायावती की ओर से गठबंधन तोड़े जाने के बाद अखिलेश के लिए यह स्थिति लौट के बुद्धू घर को आए जैसी है। बसपा सामान्य तौर पर उपचुनाव नहीं लड़ती है लेकिन इस बार उसने घोषणा की है कि वह राज्य के उपचुनावों में अपने उम्मीदवार उतारेगी। दिल्ली में आयोजित पार्टी की समीक्षा बैठक में मायावती ने कहा कि बसपा को समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से कोई फायदा नहीं हुआ है। मायावती का यह कहना कि एसे गठबंधन से क्या फायदा, जिसमें सहयोगी दल का अपना बेस वोट ही न हो। एक तरह से यह गठबंधन तोड़ने से ज्यादा दिल तोड़ने जैसा है।

यादव बाहुल्य कन्नौज में डिंपल यादव और फिरोजाबाद में अक्षय यादव का हार जाना हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब सपा का बेस वोट ही छिटक गया है तो उन्होंने बसपा को वोट कैसे दिया होगा।
– मायावती

मैं विज्ञान का छात्र रहा हूं, वहां प्रयोग होते हैं और कई बार प्रयोग फेल हो जाते हैं लेकिन आप तब यह महसूस करते हैं कि कमी कहां थी। अच्छी बात है अब अगर हमारे रास्ते अलग हैं, तो इसका स्वागत है।
– अखिलेश यादव

अगर गठबंधन को सफलता मिलती तो मायावती श्रेय लेतीं, लेकिन सफलता न मिलने पर वह सपा पर हार का ठीकरा फोड़ रही हैं। शास्त्रों में ठीक ही कहा गया है कि जो सम्मान पचाना नहीं जानता वो अपमान भी नहीं पचा सकता।
– अपर्णा यादव

मायावती ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रही हैं। अगर लोकसभा चुनाव में सपा का साथ ना
मिला होता तो बीएसपी का वजूद खत्म हो गया होता।
– रमाशंकर विद्यार्थी

दरअसल, बसपा सुप्रीमो मायावती की राजनीति को समझने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि वह कभी घाटे का सौदा नहीं करतीं। उनकी राजनीति का अपना एक तरीका है और वह सत्ता में रहें या फिर बाहर। अपने फायदे से इतर उन्हें कुछ और सूझता ही नहीं। वह विरोधियों पर न सिर्फ खुलकर तीखे हमले करती हैं, बल्कि मौका मिलने पर उन्हें सबक सिखाना नहीं भूलती। यहां तक की कांशीराम के साथ काम कर चुके बसपा नेता भी अगर मायावती की राह का रोड़ा बने, उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा। बसपा सुप्रीमो के इस स्वभाव को नजरअंदाज करना ही अखिलेश यादव की सबसे बड़ी भूल रही। मायावती के अब ‘एकला चलो’ के एलान के बाद अखिलेश भले ही नपे-तुले शब्दों में स्वयं एसा करने की बात बोल रहे हों, लेकिन हकीकत में यह ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकलने’ जैसा है। खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की तर्ज पर इस महागठबंधन को एक प्रयोग बताकर अखिलेश अपनी खीझ मिटाने का असफल प्रयास कर रहे हैं। खुद को साइंस का स्टूडेंट बताकर अखिलेश ने कहा है कि प्रयोग कभी सफल होते हैं और कभी असफल लेकिन इससे उसकी कमियों का पता चल जाता है। बहरहाल, जिस बसपा के साथ मिलकर अखिलेश पहले 2019 में नई दिल्ली और फिर 2022 में उत्तर प्रदेश की सत्ता का ख्वाब देख रहे थे। जिसके लिए उन्होंने अपने पिता मुलायम सिंह यादव और पार्टी के अन्य जमीनी नेताओं की नाराजगी की परवाह नहीं की। चाचा शिवपाल यादव के सुलह की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। यहां तक की उन्हें भाजपा की ‘बी’ टीम करार दिया। उस मायावती के गठबंधन से अलग होने की खबर भी उन्हें मीडिया के जरिए मिली। वही मायावती जिनके साथ 12 जनवरी 2019 को उन्होंने लखनऊ में संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि आज गुरु चेले यानी पीएम मोदी और अमित शाह की नींद उड़ाने वाली प्रेस कांफ्रेंस हो रही है, लेकिन मायावती के दांव के आगे अब अखिलेश को कुछ नहीं सूझ रहा है। उनकी सियासी समझ पर न सिर्फ पार्टी के अन्दर बल्कि बाहर भी सवाल उठ रहे हैं।

शत प्रतिशत सच हुई पीएम की भविष्यवाणी
सपा-बसपा की राहें अलग होने की भविष्यवाणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अप्रैल को ही
कर दी थी। प्रधानमंत्री ने एटा में भाजपा प्रत्याशी राजवीर सिंह के समर्थन में आयोजित रैली में
महागठबंधन को महामिलावट की संज्ञा देते हुए कहा था कि जनता खोखली दोस्ती करने वालों
का सच जानती है और इन दोनों की दोस्ती टूटने की तारीख 23 मई तय हो चुकी है। एक दोस्ती
(सपा-कांग्रेस गठबंधन) यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान हुई थी। चुनाव खत्म हुआ तो दोस्ती
खत्म होकर दुश्मनी में बदल गई। एक और दोस्ती (सपा-बसपा गठबंधन) हुई है, उसके टूटने
की तारीख भी तय है। यह फर्जी दोस्ती 23 मई (लोकसभा चुनाव परिणाम का दिन) को टूट
जाएगी। उस दिन बुआ और बबुआ….। ये दोनों अपनी दुश्मनी का पार्ट टू शुरू कर देंगे। एक
दूसरे को तबाह करने की धमकियां देने लगेंगे। एक दूसरे के कुर्ते फाड़ेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा था
कि सपा-बसपा सोचते हैं कि जो उनका वोट बैंक है, वह उनकी सुविधा के हिसाब से यहां-वहां
ट्रांसफर हो जाएगा। उन्हें लगता है कि वोटरों के वे ठेकेदार हैं, लेकिन वोटरों ने उनकी तैयारी को
खूंटी पर टांग दिया है। बहरहाल, लगभग डेढ़ महीने पहले की गई पीएम मोदी की यह भविष्यवाणी
गठबंधन टूटने के साथ ही सच साबित हो गई है। हालांकि उनकी कही गई बात कि हार के बाद
गठबंधन के लोग एक-दूसरे के कपड़े फाड़ेंगे। यह बसपा की तरफ से तो हो चुका है। अब बारी
अखिलेश यादव के प्रेस कांफ्रेंस की है जिसमें इसी तरह की कपड़ा फाड़ प्रतिक्रिया आनी तय है।

लोकसभा चुनाव के परिणामों पर नजर डालें तो 2014 में शून्य पर रही बसपा के इस बार दस उम्मीदवार लोकसभा पहुंचे। सपा को पिछली बार की तरह ही पांच सीटें मिलीं, लेकिन अखिलेश अपनी पत्नी डिम्पल यादव, चचेरे भाई धर्मेन्द्र और अक्षय यादव को मायावती के साथ के बावजूद विजय दिलाने में नाकाम रहे। अखिलेश पहले ही मुलायम कुनबे की इस करारी हार को पचा नहीं पा रहे थे, लेकिन मायावती के लिए अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी का ख्वाब टूटना इससे भी बड़ा सदमा था। इसलिए उन्हे विधानसभा चुनाव में अखिलेश को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना कैसे स्वीकार होता।

यही वजह है कि उन्होंने तुरन्त अपनी राहें अलग कर लीं। यह कुछ एसा है कि तुम अपना वादा पूरा नहीं कर सकें तो मैं अपना क्यूं निभाऊं। मायावती के इस फैसले की वजह को समझें तो इस चुनाव में बसपा को 19.26 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2014 में पार्टी का वोट प्रतिशत 19.77 रहा। इस लिहाज से दस सीटें जीतने के बाद भी उन्हें ये घाटे का का सौदा नजर आया। इसीलिए उन्होंने सपा के वोटबैंक बसपा में ट्रांसफर नहीं होने का आरोप लगाया। इसके लिए उन्होंने यादव परिवार के सदस्यों की हार का भी हवाला दिया। मायावती की दलील है कि जब सपा अध्यक्ष ‘यादव’ वोट अपने कुनबे के उम्मीदवारों को ही नहीं दिला पाये तो बसपा को क्या मिले होंगे। वैसे देखा जाए तो सपा के लिए भी यह गठबंधन मत प्रतिशत के लिहाज से फायदे वाला साबित नहीं हुआ। इस बार उसे 17.96 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2014 में वोट पाने के मामले में समाजवादी पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी। उसे 22.35 प्रतिशत वोटों के साथ पांच सीटें मिली। इस तरह सपा को 4.39 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ। इस लिहाज से अखिलेश का ये नुकसान बसपा के 0.51 प्रतिशत नुकसान से कहीं ज्यादा है और पार्टी की सीटें भी नहीं बढ़ी। एसे में जो आरोप अखिलेश को लगाने चाहिए थे, वह उल्टा मायावती ने लगाकर अपने चिर परिचित अंदाज को एक बार फिर जगजाहिर कर दिया। इससे इतर राजनीतिक विश्लेषक गैर जाटव और गैर यादव वोट का गठबंधन से छिटकना उनकी हार का अहम कारण मान रहे हैं। सेंटर फॉर द स्टडी आॅफ डेवलपिंग सोसाइटीज के मुताबिक 64 प्रतिशत यादवों ने उन संसदीय क्षेत्रों में बसपा को वोट दिया जहां मायावती ने उम्मीदवार खड़े थे।

उपचुनाव में फिर आमने-सामने
मायावती और अखिलेश की राहें अब अलग होने के बाद उत्तर प्रदेश में उपचुनाव का दंगल
रोचक होने के आसार हैं। लोकसभा चुनाव में संयुक्त रैलियां करने वाले ये दोनों नेता उपचुनाव
में एक दूसरे को निशाना बनाते दिखेंगे। सपा और बसपा दोनों के लिए ही ये उपचुनाव अहम
हैं। मायावती के गठबंधन से अलग होने के एलान के बाद अभी से सपा नेताओं की तल्खी
नजर आने लगी है। पार्टी महाचिव रामगोपाल यादव कहते हैं कि कभी कोई जाति पूरी तरह
साथ नहीं रही। अगर सपा के वोट ट्रांसफर नहीं हुए होते तो बसपा उम्मीदवार जीत नहीं दर्ज
करते। सपा, बसपा से बड़ी और पुरानी पार्टी है। हम भी अकेले लड़ेंगे।

हालांकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को 57 प्रतिशत यादवों के ही मत मिले। इसी तरह 75 प्रतिशत जाटवों ने भी गठबंधन के उम्मीदवारों को अपना वोट दिया। इससे पहले हुए चुनावों में 80 प्रतिशत जाटवों ने बसपा को और 70 प्रतिशत यादवों ने समाजवादी पार्टी को वोट किया था। इन आंकड़ों के मुताबिक वास्तव में दोनों पार्टियां अपने वोटबैंक को सहेजने में असफल रहीं हैं, जिसमें भाजपा ने सेंधमारी की। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उप्र के 42.63 प्रतिशत मतदाताओं का वोट मिला, जबकि इस बार उसे 49.56 प्रतिशत मत मिले। गैर जाटव दलित और गैर यादव पिछड़ी जातियों के वोट हासिल करने में भाजपा को कामयाबी मिली, जिसकी वजह से गठबंधन धराशायी हो गया। सपा या बसपा के उम्मीदवार वाले चुनाव क्षेत्रों में गैर जाटव दलितों में 39 प्रतिशत ने बसपा और 46 प्रतिशत ने सपा उम्मीदवारों को अपना वोट दिया। जबकि लगभग 50 प्रतिशत गैर जाटव दलितों के वोट भाजपा अपने पाले में करने में कामयाब रही। इसी तरह गैर यादव पिछड़ी जातियों का 17 प्रतिशत वोट ही गठबंधन उम्मीदवारों को मिल सका, जबकि 75 प्रतिशत तक ये वोट भाजपा की झोली में गया। इसे मोदी फैक्टर और अमित शाह के रणनीतिक कौशल का असर माना जा रहा है। यही वजह है कि मायावती अब एक बार फिर अपने वोटबैंक को सहेजने में जुट गई हैं। उन्होंने भाजपा की तर्ज पर बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने का निर्देश दिया है। इसके लिए 2007 की तरह हर विधानसभा क्षेत्र में भाईचारा कमेटियों पर काम करने को बोला गया है।

‘धोखेबाज’ हैं मायावती: हरिओम यादव यादव वोट बसपा को ट्रांस्फर नहीं होने के कारण गठबंधन से फायदा नहीं होने की बात कहते हुए गठबंधन से अलग होने वाली मायावती को शिकोहाबाद से सपा विधायक हरिओम यादव ने सीधे सीधे धोखेबाज करार दे दिया है। यादव के मुताबिक गठबंधन से सपा को नहीं मायावती को ही फायदा हुआ है। अगर गठबंधन नहीं होता तो बहन जी का खाता भी नहीं खुलता जबकि सपा 25 सीटें जीतती। अगर बहन जी का आरोप है कि यादवों ने उन् हें वोट नहीं दिया तो मैं बता दूं कि यादव वफादार होते हैं और जिसके साथ रहते हैं उसका पूरा साथ देते हैं। सच तो यह है कि बसपा के लोगों ने समाजवादी पार्टी को वोट नहीं दिया है। यही वजह है कि हमें गठबंधन का कोई फायदा नहीं हुआ। हरिओम यादव का दावा है कि उन्होंने इसी साल 22 जनवरी को रामलीला मैदान में रैली की थी और उसी दिन घोषणा कर दी थी कि टाइम, दिन और तारीख नोट कर लें कि ये गठबंधन चुनावों के बाद टूटेगा। मायावती का कोई भरोसा नहीं हैं और वो कभी भी गठबंधन तोड़ सकती हैं। एसा ही हुआ है।

मायावती ने पार्टी के बेस वोट के साथ सोशल इंजीनियरिंग की राह पर चलते हुए सर्वसमाज को साधने की बात कही है। उनकी रणनीति इस तरह पचास से साठ प्रतिशत वोट जुटाने की है। जाहिर है एसे में अखिलेश या फिर कोई और उनके लक्ष्य में मददगार न होकर रोड़ा ही बनेगा। इसलिए वह 2022 को लक्ष्य बनाकर काम कर रही हैं। प्रधानमंत्री की कुर्सी का ख्वाब टूटने के बाद मुख्यमंत्री का पद ही उनका विकल्प है। फिर भी मायावती इस बात का जवाब नहीं दे पायी हैं कि अगर वह चुनाव हारने के लिए ईवीएम को दोष दे रहीं थीं तो उन्होंने अब सपा से गठबंधन क्यों तोड़ा। अखिलेश-डिम्पल की इतनी ही इज्जत करती हैं तो उन्हें मीडिया से पहले क्यों नहीं बताया। अगर बसपा का वोटबैंक नहीं खिसका है, तो उन्होंने संगठन के स्तर पर फेरबदल क्यों किये हैं। इससे इतर प्रदेश में ग्यारह विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है। इनमें गंगोह (सहारनपुर), टूंडला, गोविंदनगर (कानपुर), लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़, मानकपुर कैंट, रामपुर सदर, जैदपुर (बाराबंकी), बलहा (सुरक्षित), इगलास (अलीगढ़) और जलालपुर (अंबेडकरनगर) शामिल हैं। इनमें नौ सीटें भाजपा विधायकों के लोकसभा चुनाव जीतने की वजह से रिक्त हुई हैं। इनमें कानपुर की गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र से पार्टी विधायक सत्यदेव पचौरी कानपुर लोकसभा से, लखनऊ कैंट से विधायक रीता बहुगुणा जोशी इलाहाबाद से, फिरोजाबाद के टूंडला से विधायक एसपी सिंह बघेल आगरा से, बाराबंकी के जैदपुर से विधायक उपेंद्र रावत बाराबंकी से, चित्रकूट के मानिकपुर से विधायक आरके पटेल बांदा से, बहराइच की बलहा विधानसभा सीट से विधायक अक्षयवर लाल गोंड बहराइच से, गंगोह विधानसभा सीट से विधायक प्रदीप चौधरी कैराना से, अलीगढ़ की इगलास विधानसभा सीट से विधायक राजवीर बाल्मीकि हाथरस से और प्रतापगढ़ विधानसभा सीट से भाजपा विधायक संगमलाल गुप्त प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने हैं। वहीं मीरापुर विधानसभा सीट भाजपा विधायक अवतार सिंह भड़ाना के इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल होने पर खाली हुई है। इसके अलावा रामपुर विधानसभा सीट से सपा विधायक आजम खां रामपुर लोकसभा और जलालपुर विधानसभा सीट से बसपा विधायक रितेश पांडेय अंबेडकरनगर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं। बहरहाल, मायावती और अखिलेश दोनों के लिए आगे की लड़ाई और भी कठिन है। सियासी महासमर के हाल के कुछ वर्षों में सपा पहले 2017 में कांग्रेस के साथ और 2019 में बसपा, सपा और रालोद के साथ मिलकर चुनाव लड़ी। हर बार जीत के बड़े-बड़े सपने देखे गये लेकिन हर बार भाजपा और मजबूत होती गई। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जहां 15 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं 2017 में पार्टी ने 40.6 प्रतिशत वोटों के साथ सत्ता का अपना वनवास खत्म किया। इस बार लोकसभा चुनाव में तो विपक्ष का बहुत बड़ा प्रयोग हुआ और दलित, मुस्लिम, ओबीसी वोटबैंक के सहारे भाजपा की सियासत खत्म करने के दावे किये गये, लेकिन नतीजा सिफर रहा। मायावती के बाद अखिलेश भी गठबंधन के प्रयोग को असफल मान चुके हैं। एसे में सवाल उठता है कि जो एक होकर भाजपा से मुकाबला नहीं कर पाये, वह अलग-अलग होकर जनता से किस आधार पर वोट मांगेंगे और भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा पायेंगे।

कहीं जांच की आंच तो वजह नहीं
मायावती द्वारा महागठबंधन तोड़े जाने के पीछे राजनीतिक विश्लेषक कयास लगा रहे हैं कि कहीं यह आय से अधिक संपत्ति के मामले से बचने की कवायद तो नहीं है। दरअसल, मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला 1995 से 2003 के बीच का है। इसकी शुरुआत हुई ताज कॉरिडोर मामले की सुनवाई के दौरान। जब सुप्रीम कोर्ट की बेंच के एक आदेश के आधार पर 2004 में सीबीआई ने मायावती के खिलाफ जांच शुरू की। सीबीआई ने जांच के बाद 2007 में सुप्रीम कोर्ट को 96 प्लॉट, मकान और बगीचों की जानकारी दी। ये संपत्तियां या तो मायावती के नाम पर थीं या उनके करीबी रिश्तेदारों के नाम पर। हालांकि मायावती ने इसे बतौर उपहार साबित कर दिया। मायावती को राहत मिल गई थी, मगर 2014 में कमलेश वर्मा नाम के शख्स ने मायावती के खिलाफ नए सिरे से एफआईआर की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने अप्रैल 2016 में याचिका को विस्तृत सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया। उल्लेखनीय है कि मायावती के कार्यकाल में ताज कॉरिडोर घोटाला, एनआरएचएम घोटाला, स्मारक घोटाला, यादव सिंह घोटाला, खनन घोटाला व चीनी मिल घोटाला आदि हुए हैं।

यूज एंड थ्रो माया की फितरत

देखा जाए तो महागठबंधन से किनारा कर लेना मायावती के लिए कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती पहली बार जून 1995 में सपा के साथ गठबंधन तोड़ कर भाजपा और अन्य दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थीं। दरअसल मुलायम-कांशीराम के नेतृत्व में 1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने चुनाव लड़ा और जीत के बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन जैसे ही कांशीराम ने मायावती को पार्टी उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश प्रभारी बनाया, उनका सपा से विवाद हुआ और उन्होंने सरकार गिरा दी। फिर वह स्वयं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई। इसके बाद वह दूसरी बार 1997 और तीसरी बार 2002 में मुख्यमंत्री बनीं और तब उनकी पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन था। गठबंधन में मायावती के अंदाज की बात करें तो भाजपा के साथ ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनने के फार्मूले में भी मायावती स्वयं तो कुर्सी पर आसीन हुईं, लेकिन कल्याण सिंह के विराजमान होते ही उन्हे यह अखरने लगा और उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। इसी तरह लखनऊ में 1995 के स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती हमेशा सपा पर हमलावर रहीं। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले हुए उपचुनाव में ये दुश्मनी चन्द दिनों के लिए दोस्ती में बदली, लेकिन अब मायावती ने एक बार फिर अखिलेश से मुंह मोड़ लिया है। इसी तरह वह 1996 में कांग्रेस से गठबंधन कर चुकी हैं,लेकिन चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने बसपा का वोट कांग्रेस में ट्रांसफर होने लेकिन कांग्रेस का वोट बसपा को नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए पार्टी से किनारा कर लिया था। खुले शब्दों में कहा जाए तो मायावती की राजनीति यूज एण्ड थ्रो की तरह है।




 
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