राम जन्मभूमि

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राम नाम धुन के साथ दिल्ली में निकाली गईं प्रभात फेरियां

05/08/2020

नई दिल्ली, 05 अगस्त (हि.स.)।  अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन के अवसर पर दक्षिणी दिल्ली की रिहायसी कॉलोनियों की सड़कें और गलियाँ राममय हो गयीं। बुधवार सुबह लोगों का जागरण राम नाम की धुनों से हुआ। भोर से ही स्थान-स्थान पर ढोलक मजीरों के साथ कीर्तन मंडलियाँ राम नाम की धुन गाते हुए सड़कों पर निकल आयीं। कीर्तन मंडलियों ने गली मोहल्लों में प्रभात फेरियाँ निकालीं।


दक्षिणी दिल्ली के बदरपुर, तुगलकाबाद, लाजपत नगर, कालकाजी और ग्रेटर कैलाश इलाकों में लोग भगवा पटके लगाकर ढोलक, झांझर और मजीरे बजाते हुए श्रीराम जयराम जय जय राम की धुन गाते निकले। बीच बीच में जय श्रीराम के नारे लग रहे थे। कॉलोनियों में महिला पुरुष सुबह सुबह-सुबह राम नाम की प्रभात फेरी की धुनों को सुनकर अपनी बालकनियों और छज्जों पर आ गये। लोगों ने जगह-जगह प्रभात फेरियों के ऊपर फूलों की बरसात कर स्वागत किया।
बदरपुर में निकल रही प्रभातफेरी में शामिल 60 वर्षीय विजय सिंघल ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि उनके लिए आज का दिन विशेष खुशियों का दिन है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के संघर्ष का मैं स्वयं गवाह रहा हूँ। मैं 1990 की पहली कारसेवा और ऐतिहासिक दिन 6 दिसंबर 1992 का साक्षी रहा हूँ। पहली कारसेवा में हम दिल्ली से करीब 30 लोग थे। दिल्ली से लेकर अयोध्या तक कारसेवकों की धर पकड़ चल रही थी। हम पुलिस से बचते बचाते ट्रेन से लखनऊ पहुँच गये। वहां पुलिस ने हमारे कुछ साथियों को गिरफ्तार कर लिया। हम पुलिस से बचते हुए दूसरी ट्रेन से गोंडा पहुंचे। गोंडा से अयोध्या का रास्ता हमने गाँव गाँव पैदल चलकर पूरा किया। हमारे पास खाने को कुछ नहीं था। गाँव के लोगों ने हमें खाना-पानी दिया था। पैदल चलते हम सरयू नदी के पुल तक पहुँच गए। वहां हज़ारों की भीड़ थी। लोग नदी पार करना चाहते थे, लेकिन पुलिस आगे नहीं जाने दे रही थी। पुलिस ने गोली चला दी और मैंने देखा कि एक गोली वहां के स्थानीय हलवाई को लगी थी। लोग फिर भी अड़े खड़े थे। बहुत सारे लोग विवादित ढांचे के पास पहले से ही पहुंच गए थे। मुलायम सिंह की सरकार थी। वहां पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चला दी। कई कारसेवक गोलीबारी में मारे गए। उनमें दोनों कोठारी भाई भी थे।

दूसरी बार 6 दिसम्बर 1992 को भी मैं अयोध्या में ही था। हम साथियों के साथ एक टीले से दृश्य देख रहे थे। एक धूल का गुबार सा उठा। कुछ लोग ढांचे की गुम्बद पर चढ़े हुए थे। देखते ही देखते तीनों गुम्बद जमीदोंज हो गया। हम दूसरे दिन सुबह दिल्ली पहुंच गए। आज असम्भव लगने वाला काम पूरा हो रहा है
। हृदय में उल्लास है, खुशी है। इसीलिये आज हमने प्रभात फेरी निकालने का निश्चय किया था।

हिन्दुस्थान समाचार/रतन सिंह 


 
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