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सामरिक युद्ध की आशंका

18/08/2019

सामरिक युद्ध की आशंका


मेरिका और चीन के बीच एक व्यापारिक युद्ध चल रहा है। लेकिन दोनों ही यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि यह व्यापारिक युद्ध अंतत: उन्हें सामरिक युद्ध की ओर ले जा सकता है। इस व्यापारिक युद्ध में अमेरिका का उतना जोर व्यापारिक घाटा कम करने में नहीं है, जितना बौद्धिक संपदा का हस्तांतरण रोकने पर है। शुरू में चीन ने अमेरिका को शांत करने के लिए कहा कि वह अपने यहां बौद्धिक संपदा कानूनों को सख्त कर रहा है और अपने नियमों को अधिक पारदर्शी बना रहा है। लेकिन चीन में सबकुछ राज्य द्वारा नियंत्रित है। इसलिए अमेरिका उसके आश्वासनों के बारे में आसानी से संतुष्ट नहीं हो सकता। अमेरिका उस पर केवल अपनी प्रौद्योगिकी की नकल करने या अमेरिकी कंपनियों को उन्हें चीनी कंपनियों के साथ साझा करने के लिए विवश करने का ही आरोप नहीं लगा रहा, वह यह आरोप भी लगा रहा है कि चीन अपने यहां हैकर्स का एक तंत्र खड़ा करके अमेरिकी प्रौद्योगिकी की चोरी कर रहा है।

अमेरिका शुरू से यह जानता है कि चीन के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता लंबी चलने वाली है। इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के पुराने प्रतिद्वंद्वी रूस को अपने साथ लाने की कोशिश में लगे हैं। दूसरे महायुद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत रूस के बीच जो शीत युद्ध शुरू हुआ था, वह सोवियत संघ के बिखरने के बाद समाप्त हो गया है।

चीन ने इस काम के लिए जासूस भी प्रशिक्षित कर रखे हैं। इस तरह के आरोपों को प्रमाणित या अप्रमाणित नहीं किया जा सकता। इसलिए वे आसानी से आशंकाएं बढ़ा सकते हैं। इस तरह की आशंकाओं के रहते अमेरिका और चीन के बीच चलने वाली वार्ता के सफल होने की आशा कम ही रहती है। चीन जो भी अमेरिकी शर्तें माने,उसके कुछ ही समय बाद अमेरिकी शर्तों की नई खेप सामने आ जाएगी। यह जानते हुए भी चीन अगर वार्ता के प्रति आशावान दिख रहा था तो केवल इसलिए कि अमेरिकी नाकेबंदी को जितने दिन भी टाला जा सके, उतना अच्छा है। चीन जल्दी से जल्दी अपने आर्थिक और सामरिक लक्ष्य पाने के लिए उतावला है। इसलिए वह यथासंभव व्यावहारिक नीतियां अपनाने की कोशिश करता है। लेकिन चीन के शासक अपने आपको अमेरिकी शासकों के सामने घुटने टेकते तो नहीं दिखा सकते। उससे उनका राजनीतिक नियंत्रण कठिनाई में पड़ जाएगा।

अमेरिका शुरू से यह जानता है कि चीन के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता लंबी चलने वाली है। इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के पुराने प्रतिद्वंद्वी रूस को अपने साथ लाने की कोशिश में लगे हैं। दूसरे महायुद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत रूस के बीच जो शीत युद्ध शुरू हुआ था, वह सोवियत संघ के बिखरने के बाद समाप्त हो गया है। अब अमेरिका यूरोप की सुरक्षा को लेकर बिल्कुल आशंकित नहीं है। इसलिए वह नाटो की कोई उपयोगिता नहीं देखता। पर अमेरिका का सत्ता प्रतिष्ठान अभी शीत युद्ध के समय की मानसिकता से पूरी तरह उबर नहीं पाया। इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प को रूस से निकटता बनाने में कठिनाइयां आ रही है। लेकिन वे आशावान हैं। पिछले दिनों अमेरिका के विदेश मंत्री माइकल पोम्पिओ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रतिनिधि के रूप में रूस की यात्रा पर गए थे। इस अवसर पर रूस के नेताओं ने भी अमेरिका से सहयोग बढ़ाने की उत्सुकता व्यक्त की थी और कहा था कि दोनों के बीच पुराने दिनों के अविश्वास और प्रतिद्वंद्विता की अब कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। अमेरिका में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो कहते हैं कि रूस सजातीय है। इसलिए उससे सहयोग होना चाहिए।

अभी तक जनसंख्या का दंभ!

चीन की चुनौतियां भी कम नहीं है। अमेरिकी लंबे समय से आशा कर रहे हैं कि चीन में बाजार के विस्तार और मध्यम वर्ग के विस्तार से जो शक्तियां पैदा होंगी, वे कम्युनिस्ट शासन को छिन्न-भिन्न कर देंगी। हालांकि अब तक ऐसा नहीं हुआ और चीनी शासक वर्ग अपने सत्ता प्रतिष्ठान को निरंकुश बनाए रखने में सफल रहा है। लेकिन वह अनंतकाल तक इसमें सफल रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। चीन में यह भी तर्क दिया जाता रहा कि अमेरिका और चीन दोनों ही नाभिकीय शक्तियां हैं। अगर दोनों के बीच सामरिक युद्ध की नौबत आई तो वह नाभिकीय युद्ध में बदल सकता है। लेकिन ऐसा कोई युद्ध हुआ तो अपनी विशाल जनसंख्या के बल पर चीन फिर भी बचा रहेगा। अमेरिका अपने आपको नहीं बचा पाएगा। यह दरअसल माओ के समय दिया गया तर्क था। अपने नाभिकीय कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए माओ ने यह तर्क दिया था कि कभी नाभिकीय युद्ध हुआ तो पश्चिम कीे औपनिवेशिक शक्तियों को अधिक नुकसान होगा। चीन की जनसंख्या बहुत विशाल है और वह नाभिकीय हमले के बाद भी बची रहेगी। यह तर्क काफी नादानी से भरा लगता है। नाभिकीय अस्त्र सबसे पहले सत्ता प्रतिष्ठान को समाप्त करेंगे। जापान पर जो नाभिकीय बम गिराए गए थे, वे केवल जापान का मनोबल गिराने के लिए गिराए गए थे। उसे पराजित या नष्ट करने के लिए नहीं, क्योंकि उसकी पराजय तो निश्चित हो चुकी थी। अपने लगभग सभी शहरों के विध्वंस के बावजूद वह युद्ध समाप्त करने को राजी नहीं हो रहा था। दूसरा महायुद्ध नाभिकीय हथियारों के बल पर नहीं लड़ा गया था। लेकिन भविष्य में कोई महायुद्ध हुआ तो वह पहले या दूसरे महायुद्ध जैसा नहीं होगा। पहले और दूसरे महायुद्ध में अमेरिका देर से शामिल हुआ और वह यूरोप जैसे विनाश से बच गया। अब अमेरिका और चीन के बीच कोई युद्ध हुआ तो चीन के पुनर्निर्माण के लिए उसके पास कोई साधन नहीं बचेंगे। इसलिए केवल अधिक जनसंख्या के आधार पर बचे रहने का तर्क देना निरर्थक है

चीन विजातीय है, इसलिए उसे आगे नहीं बढ़ने दिया जाना चाहिए। क्योंकि वह अमेरिकी प्रभुता को बिना किसी दुविधा के चुनौती दे सकता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि दूसरे महायुद्ध के दौरान जब अमेरिका अपने नवविकसित नाभिकीय बम का परीक्षण करना चाहता था तो उसने उसे गिराने के लिए अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी जर्मनी को नहीं चुना, जापान को चुना। रूस का शासक वर्ग भी अंतत: चीन की बजाय अमेरिका के साथ जाना पसंद करेगा। आज अगर रूस चीन के साथ खड़ा दिखाई देता है तो उसके तात्कालिक आर्थिक और राजनीतिक कारण है। रूस यह जानता है कि उसके दूरगामी हित चीन के हितों से टकराएंगे। चीन अधिक ताकतवर होते ही मध्य एशिया में अपना प्रभुत्व जताएगा, जैसा आज वह दक्षिण चीन सागर में जता रहा है। उस समय रूस और चीन आमने-सामने होंगे।

अमेरिका, चीन की चुनौती को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसे डोनाल्ड ट्रम्प के नाभिकीय कार्यक्रम में आसानी से देखा जा सकता है। डोनाल्ड ट्रम्प ने नाभिकीय हथियारों के परिसीमन के मामले में रूस के साथ हुई संधि को निरस्त करके अपने नाभिकीय भंडार को तेजी से बढ़ाने का रास्ता खोल दिया है। उसके लिए रूस पर संधि के उल्लंघन का बहाना बनाया गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने यह प्रमाणित नहीं किया कि रूस ने कब संधि की शर्तों का उल्लंघन किया और अपनी तरफ से संधि समाप्त करने और अपने नाभिकीय भंडार को बढ़ाने की घोषणा कर दी। यह स्पष्ट ही चीन को ध्यान में रखकर किया गया है। अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान चाहता है कि समय रहते अमेरिका को नाभिकीय हथियारों के मामले में इतना आगे निकल जाना चाहिए कि चीन उसकी बराबरी करने का सपना भी न देख सके। अपनी सामरिक तैयारी को और अधिक ऊंचाई तक ले जाने के लिए अमेरिकी रक्षा प्रयोगशालाओं की राशि कई गुना बढ़ाई जा रही है।

अमेरिका चाहता है कि उसकी रक्षा प्रयोगशालाओं को नई सामरिक प्रौद्योगिकी विकसित करने में किसी तरह साधनों की कमी अनुभव न हो। साधनों के मामले में चीन भी पीछे नहीं है, वह अपने रक्षा प्रतिष्ठान को उदारतापूर्वक साधन उपलब्ध कर रहा है। वह प्रौद्योगिकी के नए और अधुनातन क्षेत्रों में चीन को अग्रणी बनाना चाहता है। सूचना प्रौद्योगिकी में वह कुछ हद तक अपनी अग्रता सिद्ध भी कर पाया है। लेकिन सामरिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभी भी अमेरिकी अग्रता को आसानी से चुनौती देना संभव नहीं है। कुछ क्षेत्रों में रूस भी अपनी अग्रता बनाने में सफल रहा है। पर कुल मिलाकर वह भी अमेरिका को सीधे चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। इसलिए कम से कम सामरिक क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती देना चीन के लिए आसान नहीं होगा। चीन में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि अमेरिका अब ढलान पर है। उसकी आंतरिक प्रतिभा और ऊर्जा चुकती दिखाई दे रही है।

नहीं बना भारत का सामरिक तंत्र

भारत अब तक इन सब अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं से अनजान बना रहा है। जवाहर लाल नेहरू ने जिस शांतिवादिता के आधार पर अपनी विदेश नीति तैयार की थी, वह केवल गोस्वामी तुलसीदास के पद की याद दिलाती है-‘सब ते भले विमूढ़, जिन्हें न व्यापे जगत गति’। जवाहर लाल नेहरू ने अपनी भ्रामक अवधारणाओं के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की भी अनदेखी की थी। हमने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने लायक सामरिक तंत्र तक नहीं खड़ा किया। 1962 में चीन के हाथों पिटने के बाद अपना रक्षा उद्योग खड़ा करने की कई बार कोशिश हुई लेकिन हमारा नौकरशाही ढांचा हमारे राजनीतिक प्रतिष्ठान से भी अधिक तमस का शिकार है। वह देश की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। मोदी सरकार ने आते ही रक्षा उद्योग खड़ा करने की कोशिश शुरू की, लेकिन वह भी हमारे नौकरशाही तंत्र में निष्फल होती दिख रही है। यह चिंता की बात है कि अपनी सारी क्रियाशीलता और नए विचारों के बावजूद नरेंद्र मोदी नौकरशाहों पर ही निर्भर रहे हैं। हमारे नौकरशाह शिखर नेतृत्व में पूरे राजनीतिक तंत्र के प्रति इतना अविश्वास भर देते हैं कि सभी प्रधानमंत्री उनकी गिरμत से बाहर नहीं निकल पाते। यही स्थिति मुख्यमंत्रियों की भी है। राजनीतिक तंत्र की अपनी कमजोरियां हैं। विधायिका और कार्यपालिका को अलग रखकर हमने पूरे राजनीतिक तंत्र को निकम्मा बनाए रखने का इंतजाम कर रखा है। हमारे सांसदों और विधायकों की वास्तविक शासन में कोई भूमिका नहीं है। विधान का सारा काम भी वास्तव में नौकरशाह ही करते हैं। सांसदों और विधायकों को तो पार्टी या शिखर नेतृत्व के निर्देश के अनुसार हाथ ही उठाना होता है। इन्हीं सब कारणों से हम सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से पिछड़ते चले जा रहे हैं। भारत को अमेरिका और चीन की लड़ाई में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। पर उनके बीच तनातनी हुई तो भारत अप्रभावित नहीं रह पाएगा। कम से कम अपनी सुरक्षा दृष्टि से ही हमें गंभीरता से सोचना आरंभ करना चाहिए। असल में नेहरू-काल का दिशाभ्रम अभी मिटा नहीं है। नरेंद्र मोदी के बावजूद । इस पर और गंभीरता से विचार होना चाहिए।

स्वयं अमेरिका में आज जो प्रतिभा और ऊर्जा दिखाई दे रही है, वह बाहर से आए प्रतिभाशाली लोगों की बदौलत है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अब तक रही अपनी श्रेष्ठता और आर्थिक समृद्धि के कारण अमेरिका दुनियाभर के प्रतिभाशाली लोगों को अपने यहां आकर्षित कर रहा है। उसके यहां काम करने की परिस्थितियां अनुकूल हैं और अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ने के अवसर प्रचुर हैं। इसलिए दुनियाभर से उसके यहां प्रतिभाशाली लोगों का तांता लगा रहता है। चीन में कम्युनिस्ट शासन होने के कारण बाहरी लोगों के लिए उतनी गुंजाइश नहीं है। अब तक चीनी शासक अपने समाज में समृद्धि का शिखर छूने की एक राष्ट्रीय आकांक्षा पैदा करने और बनाए रखने में सफल रहे हैं। अपनी विशाल आबादी के कारण चीन को अपने प्रौद्योगिकी अभियान में प्रतिभाशाली लोगों की कमी नहीं होती। लेकिन जैसे-जैसे चीन आगे बढ़ेगा,चीनी समाज में आगे बढ़ने की चुनौती कम होती जाएगी। फिर उसका वही हाल नहीं होगा जो अमेरिका का हुआ है, इसकी क्या गारंटी है?

अमेरिका, चीन की चुनौती को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसे डोनाल्ड ट्रम्प के नाभिकीय कार्यक्रम में आसानी से देखा जा सकता है। डोनाल्ड ट्रम्प ने नाभिकीय हथियारों के परिसीमन के मामले में रूस के साथ हुई संधि को निरस्त करके अपने नाभिकीय भंडार को तेजी से बढ़ाने का रास्ता खोल दिया है।

अमेरिका ने यह प्रौद्योगिकी पैदा की है, वह उसका जनक है। चीन उसकी नकल कर रहा है। इसलिए चीन की प्रतिभा और ऊर्जा को चुकने में अमेरिका से भी कम समय लगने वाला है। इसलिए यह तर्क बहुत अर्थ नहीं रखता कि अमेरिकी लंबी लड़ाई में चीन से मात खा जाएंगे। दोनों के पास नाभिकीय हथियारों की पर्याप्त मात्रा होने से हो सकता है कि वे अपने युद्ध को परंपरागत हथियारों तक सीमित रखें। वरना वे एक-दूसरे का भारी विनाश ही कर रहे होंगे। दूसरे महायुद्ध के बाद यूरोप के बौद्धिक जगत में जो युद्धविरोधी भावनाएं पैदा हुई थीं, उनके कारण यह धारणा बनी कि दो महायुद्धों में हुए विनाश को देखते हुए अब आगे युद्ध नहीं होंगे। यह वह समय था जब अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियां युद्ध से ध्वस्त हुए यूरोपीय भौतिक ताने-बाने को फिर से खड़ा करने में लगी थीं। पुराने ताने-बाने के खंडहर पर जो नया ताना-बाना खड़ा हुआ वह और भी भव्य और आकर्षक था। उसने यह भ्रम पैदा किया कि संपन्नता के इस नए युग को फिर से युद्ध छेड़कर कोई नष्ट नहीं करना चाहेगा। हालांकि संपन्न औद्योगिक देशों की सीमाओं के बाहर निरंतर युद्ध होते रहे।

विशेषकर अमेरिका एक के बाद एक युद्ध में फंसा रहा है और अधिकांश युद्धों में पहल अमेरिका ने की है। चीन भी शुरू से एक प्रतिस्पर्धी शक्ति के रूप में अनेक सामरिक संघर्षों में उलझा रहा है। कोरिया युद्ध में तो अमेरिका और चीन आमने-सामने ही थे। लेकिन 2008 में हुई मंदी के बाद समृद्धि के दिनों की शांतिवादिता समाप्त हो गई। यूरोप अभी भी अपनी आर्थिक समस्याओं में उलझा हुआ है। लेकिन अमेरिका चीन पर आंख गड़ाये हुए है और वह उसकी हर गतिविधि को बारीकी से देख रहा है। चीन की वन वेल्ट-वन रोड योजना ने भी अमेरिकी संदेहों को गहरा किया है। अपनी इस योजना के द्वारा चीन विश्वभर में ऐसा भौतिक तंत्र खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, जो उसके व्यापार को तेज गति प्रदान कर सके। अपनी इस योजना के अंतर्गत वह जो बंदरगाह आदि बना रहा है, वे केवल व्यापारिक उपयोग तक सीमित नहीं रहेंगे। वे उसके सामरिक तंत्र के भी काम आएंगे। जिस तरह पिछली शताब्दियों में यूरोप के व्यापारिक जहाज उसके सैनिक अभियान का भी अंग थे। उसी तरह चीन अपने व्यापार के माध्यम से अपने सामरिक तंत्र की भी विश्वव्यापी उपस्थिति सुनिश्चित करेगा।

अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्धकामी शक्तियां हमारे सौरमंडल के बाहर से नहीं आने वाली, वे हमारे अपने संसार के भीतर ही हैं।

वह सभी व्यापारिक मार्गों को अपने लिए सुगम बनाने और नियंत्रित करने में लगा हुआ है। दक्षिण चीन सागर को तो वह नियंत्रित कर रही रहा है, हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भी अपनी गतिविधियां तेजी से बढ़ा रहा है। उसकी इन कोशिशों के बाद अमेरिका ने भी समानांतर अभियान आरंभ किया है। अभी यह कठिन दिखता है कि अमेरिका या चीन में से कोई अपनी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को सामरिक युद्ध में बदलने का जोखिम उठाएगा। दोनों के पास जिस तरह के हथियार हैं,वे एक-दूसरे के विनाश के लिए काफी हैं। अब तक सभी नाभिकीय शक्तियां सीधे किसी सामरिक युद्ध से बचती रही हंै। शीत युद्ध की पूरी अवधि को इसके उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन व्यापारिक और सामरिक युद्ध के बीच एक-दूसरे को निस्तेज करने की बहुत सी रणनीतियां होती हैं। पहले तो अमेरिका और चीन उन्हीं रणनीतियों का उपयोग करने की कोशिश करेंगे। पर इस प्रक्रिया में कोई भी घटना चिनगारी बन सकती है। इतना अवश्य है कि अब युद्ध के जिस तरह के हथियार पनप गए हैं और एक-दूसरे को असमर्थ बनाने के जो नए तरीके उभर रहे हैं, उन्हें देखते हुए युद्ध हुआ भी तो वह सीमित युद्ध ही होगा।

यह भी संभव है कि अमेरिका और चीन एक-दूसरे से सीधे किसी सामरिक युद्ध में पड़ने के बजाय कोई अप्रत्यक्ष चुनौती खड़ी करें। बहरहाल अमेरिका और चीन दोनों एक-दूसरे को अपने लिए चुनौती समझने लगे हैं और दोनों के बीच शीत युद्ध का दौर आरंभ हो चुका है। वह किसी वास्तविक युद्ध में बदलेगा या नहीं, हम नहीं जानते। लेकिन यूरोपीय जाति ने पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी का जो भस्मासुर खड़ा कर दिया है, वह हर प्रतिस्पर्धा को परस्पर विनाश की ओर ले जा सकता है। कल तक यह प्रतिस्पर्धा अमेरिका और सोवियत रूस के बीच थी। आज अमेरिका और चीन के बीच है। कल नई प्रतिस्पर्धी शक्तियां उभर सकती हैं। लेकिन पांच-छह दशक शांतिपूर्वक विकास का जो भ्रम पैदा किया गया था, वह अब समाप्तप्राय है। अब तक मुख्य चुनौती काल्पनिक वैज्ञानिक साहित्य के जरिए किसी अन्य ग्रह से मिलती दिखाई जा रही थी। अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्धकामी शक्तियां हमारे सौरमंडल के बाहर से नहीं आने वाली वे हमारे अपने संसार के भीतर ही हैं।




 
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