युगवार्ता

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एक व्यर्थ प्रयास

02/01/2020

एक व्यर्थ प्रयास

प्रकाश के रे

भारतीय इतिहास की जटिलता और हमारे समाज की विविधता के कारण फिल्मकारों को अतिरिक्त सावधानी व संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए।

इतिहास के पुनर्लेखन एवं पुनर्पाठ का सिलसिला ऐतिहासिक अध्ययनों तथा साहित्यिक व कलात्मक विधाओं में निरंतर चलता रहता है। सिनेमा भी इस प्रक्रिया में अपना योगदान देता है। ऐसे आख्यान समाज के संबंधों और कलात्मक स्वतंत्रता के आधार पर भी परखे जाते हैं और कथा या इतिहास के मर्म व मूल की कसौटी पर भी उनकी परीक्षा होती है। दुर्भाग्य से भारतीय सिनेमा, विशेषकर हिंदी सिनेमा, इतिहास की कथाओं को परदे पर लाने के मामले में विश्व के अन्य प्रतिष्ठित सिनेमा उद्योगों की तुलना में बहुत कमतर रहा है। ख्यातिप्राप्त फिल्मकार आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत: द ग्रेट बिट्रेयल’ भी आशाओं और अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी है, जबकि फिल्म में नामचीन कलाकार व तकनीक के सिद्धहस्त लोग हैं और इसका बजट भी बहुत है।
फिल्म से दर्शकों की निराशा का ही नतीजा है कि इसने अभी तक बहुत मामूली कमाई की है। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं है कि फिल्म की प्रस्तुति और कलाकारों का काम उम्दा है तथा कई दृश्य, विशेष रूप से युद्ध और राजसी बैठकों के, बहुत प्रभावी हैं। लेकिन ऐसा कर तो किसी भी तरह के विषय पर फिल्म बन सकती है और बनती भी है, फिर उसमें इतिहास या ऐतिहासिक आख्यानों पर आधारित करना क्योंकर आवश्यक हो जाता है? इस प्रश्न के मंथन से पहली बात यह निकलती है कि ऐसा करना केवल अपनी प्रस्तुति को प्रचार और विश्वास देने का एक पैंतरा भर है। कुछ दिन पहले यह समाचार प्रकाशित हुआ था कि राजस्थान में कुछ दृश्यों को काटकर फिल्म प्रदर्शित की जाएगी। इसका कारण यह था कि अट्ठारवीं सदी के भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण चरित्र राजा सूरजमल के साथ फिल्मकार द्वारा न्याय नहीं किए जाने से जाट समुदाय आहत है और इस भावना का सम्मान करते हुए फिल्मकार ने यह निर्णय लिया है।
इस संदर्भ में दो बातें उल्लेखनीय हैं- पहली बात, भारतीय इतिहास की जटिलता और हमारे समाज की विविधता के कारण ऐसी आपत्तियां हमेशा की जाती रहेंगी, इसलिए फिल्मकारों को अतिरिक्त सावधानी व संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए, तथा, दूसरी बात यह कि अगर किसी फिल्मकार ने पर्याप्त शोध व समुचित संवेदना के साथ फिल्म बनाई है, उसे आपत्तियों का उत्तर साहस व समझ के साथ देना चाहिए। हाल में हुए ऐसे विवादों में फिल्मकारों ने इन दोनों बिंदुओं का ध्यान नहीं रखा है, इसलिए उनकी मंशा पर संदेह के कारण पैदा होते हैं।
ऐसा नहीं है कि इतिहास आधारित फिल्में बनाने के लिए हमारे फिल्मकारों के पास धन या प्रतिभा का अभाव है, असल में वे सिनेमाई चलन और कारोबार के गणित में फंसे हुए हैं। उनसे यह पूछना चाहिए कि जब आप करोड़ों रुपये सेट बनाने, कोई गाना फिल्माने या किसी स्टार को लेने में खर्च कर सकते हैं, तो कुछ लाख रुपये अच्छे इतिहासकारों से सलाह लेने पर खर्च करने में क्या परेशानी है। पानीपत की तीसरी लड़ाई जनवरी, 1761 में हुई थी और उससे संबंधित अनेक पुस्तकें और अध्ययन उपलब्ध हैं। भरतपुर के जाट राजा सूरजमल की भूमिका के विविध पहलुओं का समायोजन कर विवाद से बचा जा सकता था या विवाद के आधारों को चुनौती दी जा सकती है। पर, आम तौर पर हमारे फिल्मकार भारी बजट का हवाला देकर आपत्तियों के सामने घुटने टेक देते हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि असल में उन्होंने कथानक के ठोस होने पर पहले ही ध्यान नहीं दिया था।
आशुतोष गोवारिकर लगान, स्वदेश, जोधा अकबर, मोहेंजो दारो आदि जैसी फिल्में बना चुके हैं, वे पानीपत के माध्यम से हालिया भारतीय इतिहास के एक अहम दौर की परतें खोल सकते थे, पर उनका सारा ध्यान प्रेम प्रसंग, युद्ध और षड्यंत्रों के घिसे-पिटे फिल्मी फार्मूलो पर रहा। इसी वजह से फिल्म किरदारों के नामों के अलावा बहुत पहचानी, देखी और उबाऊ लगती है। गोवारिकर को सोचना चाहिए कि इतने अच्छे कलाकारों और कम्प्यूटर जनित व प्रभावी सेट के दृश्यों के बाद भी सौ करोड़ की लागत से बनी फिल्म अब तक एक तिहाई खर्च भी क्यों वसूल नहीं कर सकी है। यह भी कि क्या यह फिल्म किसी भी स्तर पर इतिहास की हमारी समझ को बढ़ाती है या फिर खोखले गौरव या कुंठा से भर देती है। किसी पक्ष का गौरव गान ठीक है, पर वह किसी अन्य को कमतर दिखाकर नहीं किया जाना चाहिए। इतिहास हमेशा संदर्भों में घटित व परिभाषित होता है।


 
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