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दूध के खिलाफ मिथ्या प्रचार

30/09/2019

डॉ. प्रभात ओझा

श्चिम जगत में एक अजीब तरह की धारणा बन रही है। मुश्किल यह है कि हमारे देश में भी इसे चलन में लाने की कोशिशें हो रही है। चलन भी ऐसा जो हजारों-हजार साल से हमारे जीवन का अंग रहा है। कहा जा रहा है कि दूध पीना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद नहीं होता। चलिए मानते हैं कि बहुत से देशों में यह धारणा घर कर चुकी है कि जो जानवर अपने बच्चों के लिए दूध देना चाहते हैं, वह हम इंसान निकाल लिया करते हैं। हमारे यहां तो गाय जैसे जानवर को माता की संज्ञा दी गयी है। आमतौर पर हम देखते ही हैं कि मनुष्य अपनी गायों का कितना ध्यान रखता है। आम किसान आज भी गाय का दूध निकालते वक्त उसके छोटे बच्चों के लिए पर्याप्त दूध छोड़ देता है। वैसे चीन की पुरानी सभ्यता में दूध पीना अच्छी बात नहीं थी। यही कारण है कि आज  भी चीन के बहुत से निवासी दूध के उत्पाद जैसे चीज, पनीर आदि से चिढ़ रखते हैं। उसी चीन में सन 2000 में सरकार ने लोगों की सेहत का ध्यान रखते हुए दूध और दूध के उत्पाद के उपयोग को बढ़ावा देने का अभियान चलाया। जो अमेरिका कभी दुनियाभर में मिल्क पाउडर भेजा करता था, वहीं अब दूध के उपयोग को धक्का पहुंचा है। वहां का कृषि विभाग मानता है कि उसके यहां 1970 के बाद से दूध का प्रयोग 40 प्रतिशत तक कम हो गया है। ब्रिटेन में हुआ एक सर्वे तो यहां तक बताता है कि जो बच्चे दूध अधिक पीते हैं, उनमें भी 50 में से एक दूध की एलर्जी का शिकार हैं। 
चीन में दूध के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो कई देशों में इसका उपयोग कम होता जा रहा है। आखिर इसका कारण क्या है? इस बात पर गौर करें तो पाते हैं कि दूध के कई तरह के विकल्प आ गये हैं, जो स्वादिष्ट भी हैं। इनमें सोया मिल्क और बादाम मिल्क तो हमारे यहां भी प्रचलन में हैं। प्रश्न यह है कि पश्चिमी देश दूध से इतने दूर क्यों हो रहे हैं? इसका कारण वहां दूध रखने का ढंग ही लगता है। आमतौर पर इन देशों में वैक्स पेपर से निर्मित डिब्बों में दूध बेचा जाता है। इन डिब्बों में बंद करने से पहले दूध कई तरह की प्रक्रिया से गुजरता है। इस 'ट्रीटमेंट' का कुछ तो असर होगा ही। अब हमारे यहां भी पश्चिम के इस अल्ट्रा हीट ट्रीटेड, यानी यूएचटी का प्रयोग धीरे से ही सही, शुरू हो चुका है।  
 यूएचटी मिल्क के स्तर तक आया दूध 140 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर गरम किया जाता है। इतना अधिक तापमान पर सिर्फ तीन सेकेंड में गरम करने की प्रक्रिया पूरी होती है। सही है कि बहुत अधिक तापमान के चलते दूध में मौजूद बैक्टीरिया मर जाते हैं। इस तरह का दूध जब तक पैकेट खोला नहीं जाय, खराब नहीं होता। परंतु लोग भूल जाते हैं कि डिब्बाबंद दूध दूसरे देशों अथवा देश के सुदूर हिस्से में पहुंचता है, तो बहुत गरमी के कारण खराब हो चुका होता है। असल में इसे 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तक ही रखना पड़ता है। दही अथवा जेली की तरह दिखने वाले इस खराब दूध में नुकसान पहुंचाने वाले कीटाणु फिर से सक्रिय हो उठते हैं। स्वाभाविक है कि इससे कई तरह के रसायनिक प्रयोग के खतरे बढ़ जाते हैं। 
भारत में दूध के प्रयोग का आम तरीका आज भी गाय अथवा भैंस के ताजा दूध से ही जुड़ा है। अधिक से अधिक हम वैज्ञानिक लुई पास्चर की खोज का सहारा लेकर थैली वाले पास्चराइज्ड मिल्क का उपयोग किया करते हैं। इसके भी उपयोग की सीमा तय रहती है। दरअसल, दूध की उपयोगिता का महत्व उसके अंदर पाये जाने वाले तत्वों के कारण ही है। हमारे यहां तो प्राचीन काल से ही मनुष्य और गाय का रिश्ता बन गया था। ब्रिटेन जैसे देश में वहां की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) का भी मानना है कि दूध और दूध के उत्पाद, जैसे पनीर, दही और मक्खन बड़ी मात्रा में कैल्शियम और प्रोटीन प्रदान करते हैं। ये तत्व संतुलित आहार के अंग हैं। अमेरिकी खाद्य विशेषज्ञ डोनाल्ड हेंसरड के मुताबिक, कैल्शियम और प्रोटीन के अलावा दूध में विटामिन 'ए' और 'डी' के पोषक भी मिलते हैं। हमारे यहां तो इसे बचपन के लिए जरूरी तत्व ही मान लिया गया है। बच्चों के साथ बड़ों के लिए भी आयरन, कैल्शियम, विटामिन, जिंक और आयोडीन की जरूरत दूध से पूरी हो जाती है। जहां तक इसके विकल्पों की बात है, तय है कि इनमें पोषक तत्व कृत्रिम रूप में ही डाले जाते हैं। यह कृत्रिम रूप प्राकृतिक दूध की तरह नहीं हो सकते। 
एक खोज के मुताबिक हमारे यहां बच्चों को दिया जाने वाला दूध इसलिए भोजन का विकल्प हो जाता है, क्योंकि उसमें कार्बोहाइट्रेड और प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में होता है। बड़ों से साथ दिक्कत यह है कि उनके अंदर दूध में मौजूद लैक्टोज को पचाने की क्षमता कम हो जाती है। लैक्टोज को पचाने के लिए एक एंजाइम की जरूरत होती है, जो बच्चों में अधिक पायी जाती है। प्राकृतिक दूध स्वाभाविक रूप से व्यायाम करने वालों और अधिक शारीरिक श्रम करने वालों को आसानी से पच जाया करता है। अधिक वसा से बचने के लिए वयस्कों को दूध की मलाई उतारकर पीने की सलाह दी जाती है। पश्चिम के लोगों की यही दिक्कत है कि वहां लोगों में लैक्टोज को पचाने  की क्षमता कम होती है। भारत में दूध पीने का अभ्यास बहुत से बुजुर्गों में भी इसे पचाने की भरपूर क्षमता देता है। स्वाभाविक है कि भारत और पश्चिमी देशों में दूध के प्रति धारणा में आ रहा अंतर इन्हीं कारणों से है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका यथावत के समन्वय संपादक हैं।) 


 
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