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अपने देश में विदेशी बनने का दर्द

03/07/2019

अरविंद कुमार राय
किसी अपराध के चलते अगर जेल में कोई जाता है तो समाज उसे जायज मानकर कानून का जयगान करता है। लेकिन, अगर विदेशी बताकर अपने किसी देशवासी को जेल में कैद कर दिया जाए तो ऐसे कानून का समर्थन करने के लिए कोई भी समाज तैयार नहीं होगा। पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम में देशी को विदेशी साबित करने के कई मामले सामने आए हैं। सामान्य जनमानस उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। होना भी नहीं चाहिए। कारण कानून की खामियों के चलते हम अपने ही घर में बेगाने बन जाएं, इससे खतरनाक बात और कुछ नहीं हो सकती है।
बांग्लादेश के गठन के बाद से ही असम में लगातार घुसपैठ होनी आरंभ हो गई। घुसपैठ दो कारणों से हुई। एक धार्मिक आधार पर प्रताड़ित होकर शरण लेने के लिए तथा दूसरा, रोजी-रोटी पर कब्जा करने और असम को भारत से अलग करने की नियत से। जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा तो घुसपैठ पर लगाम कसने के लिए सरकार ने असम पुलिस की सीमा शाखा का गठन किया। इस विभाग का मुख्य काम घुसपैठियों की पहचान कर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विदेशी न्यायाधिकरणों में आरोपितों को प्रस्तुत करना था। राज्य में घुसपैठ के मुद्दे पर लगातार हो रहे आंदोलन का दबाव पुलिस की सीमा शाखा पर काफी था। इसके चलते गिनती बढ़ाने के लिए बिना सही जांच-पड़ताल के ही भारतीय नागरिकों को भी विदेशी बताकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज होने लगे। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए, जिसमें पुलिस की लापरवाही और गलतफहमी सीधे तौर पर सामने आई। इससे कई निरपराध भारतीय नागरिकों को अपने जीवन के बहुमूल्य समय जेल की सलाखों के पीछे बिताने पड़े। पुलिस की यह कारगुजारी केंद्र की तत्कालीन कांग्रेसी सत्ता के दिनों की याद दिलाती है जब नसबंदी का कानून देश में लागू हुआ था। आंकड़े बताते हैं कि सरकारी अधिकारियों ने अपनी खानापूर्ति के लिए अविवाहित लड़कों की भी नसबंदी करवा दी थी। कारण उन्हें अपने आंकड़े दिखाने थे। न दिखाने पर उनका वेतन रोक दिया जाता था। यह बेहद शर्मनाक मानसिकता है। इस पर रोक लगानी चाहिए। साथ ही ऐसा करनेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। 
असम में देशी नागरिकों को विदेशी बता कर जेल में ठूंसने के ऐसे-ऐसे चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं, जिसको देखकर लोगों को पुलिस के इस कदम से घृणा होने लगी है। इस तरह का एक मामला चिरांग जिले में देखने को मिला जहां पर कोच राजवंशी समुदाय की एक महिला अन्ना बाला रॉय को विदेशी बताकर विदेशी न्यायाधिकरण में सीमा पुलिस ने पेश किया, जहां से न्यायाधिकरण ने उन्हें कोकराझार के डिटेंशन कैंप में भेज दिया। मामले की जानकारी जब ऑल कोच राजवंशी छात्र संस्था (अक्रासू) को मिली तो उन्होंने न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़कर एक वर्ष पहले अन्ना बाला रॉय को स्वदेशी साबित कर जेल से बाहर निकलवाया।
कुछ इसी तरह की एक और कहानी चिरांग जिले में ही सामने आई, जहां पर पुलिस की लापरवाही का खामियाजा एक 59 वर्षीय महिला को अपने जीवन के कीमती तीन वर्ष जेल की सलाखों के पीछे गुजारने पड़े। इस मामले में पुलिस की गलत पहचान के चलते मधुबाला मंडल नामक (59 वर्षीय) महिला को न्यायालय ने सबूतों के अभाव में विदेशी बताते हुए डिटेंशन कैंप में भेज दिया। न्यायालय में लंबी लड़ाई चली। जांच में पता चला कि मधुबाला मंडल के बदले मधुबाला दास पर विदेशी होने का आरोप था। लेकिन पुलिस ने मधुबाला दास के बदले मधुबाला मंडल को ही न्याय के कठघरे में खड़ा कर विदेशी साबित कर दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायालय में अंततः यह बात साबित हुई कि मधुबाला मंडल भारतीय नागरिक है और पुलिस से इस मामले में बड़ी चूक हुई है
इस तरह की एक अन्य घटना बरपेटा जिले में भी सामने आई, जहां पर देश की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान से लड़ाई लड़ने वाले सैन्य अधिकारी सनाउल्लाह को सीमा पुलिस ने विदेशी बता कर नोटिस जारी कर दिया। न्यायालय में 2007 से सुनवाई आरंभ हुई। विदेशी न्यायाधिकरण ने जून 2019 में सनाउल्लाह को विदेशी घोषित कर दिया। उल्लेखनीय है सनाउल्लाह का जन्म 1967 में हुआ था। 1987 में वे सेना में शामिल हुए तथा 2017 में स्वैच्छिक अवकाश लेकर असम सीमा पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं देने लगे। इस मामले में भी पुलिस से चूक हुई। बिना सटीक जांच के अपनी रिपोर्ट बनाकर सीमा पुलिस ने न्यायाधिकरण में दाखिल कर दिया, जिसके बाद न्यायालय ने सजा का ऐलान करते हुए डिटेंशन कैंप में भेज दिया। इस मामले ने असम से लेकर दिल्ली तक तहलका मचाया। गौहाटी हाईकोर्ट ने अंततः सनाउल्लाह को जमानत पर रिहा कर दिया। भारतीय फौज ने भी साफ किया कि सनाउल्लाह भारतीय नागरिक है। 
एक ताजा वाकया बिश्वनाथ जिले में देखने को मिला है, जहां पर एक चाय बागान इलाके में रहने वाली भारतीय नागरिक अमिला शाह को विदेशी न्यायाधिकरण ने सबूतों के अभाव में विदेशी नागरिक घोषित करते हुए डिटेंशन कैंप में भेज दिया। वर्तमान समय में अमिला शाह तेजपुर स्थित डिटेंशन कैंप में बंद है। मजेदार बात है कि अमिला के परिवार के सभी सदस्य भारतीय नागरिक हैं। महिला के पिता की ओर से न्यायाधिकरण में 1951 की एनआरसी के दस्तावेज दाखिल किए गए थे। बावजूद उन्हें विदेशी करार दिया। इन घटनाओं से कानून की खामियों का पता चलता है कि अपने ही देश में इसलिए वे विदेशी हो गए, क्योंकि उनके पास कागज का टुकड़ा नहीं था।
सवाल उठता है कि इस देश में ज्यादातर आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ग्रामीण इलाकों के लोगों के पास अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करने के अलावा अन्य बातों की ओर ध्यान नहीं जाता है। देश के आदिवासी इलाकों और चाय बागानों में निवास करने वाले लोगों के बारे में अगर पता करें तो ऐसे अनगिनत नागरिक मिलेंगे, जिनके पास भारतीय होने का कोई भी प्रमाण नहीं मिलेगा। क्योंकि, उनको इस बात की कभी चिंता नहीं थी कि उन्हें कभी देश का नागरिक बताने की जरूरत होगी। मुख्य रूप से असम के चाय बागानों की अगर बात करें तो ज्यादातर चाय श्रमिक झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों से आए हैं। ऐसे कई चाय श्रमिक हैं, जिनके पास भारतीय होने के कोई प्रमाण नहीं मिलेंगे। कारण चाय बागानों की जमीन किसी भी दूसरे राज्य के नागरिक के नाम पर नहीं हो सकती है। न तो चाय श्रमिकों के पास बिजली, राशन कार्ड आदि की तत्कालीन समय में व्यवस्था थी। हालांकि मतदाता सूची में कइयों के नाम जरूर दर्ज हैं। तो क्या जिनके पास देशी साबित करने के लिए कोई कागज नहीं होगा तो ऐसे नागरिकों को हमारा कानून विदेशी बताकर जेल में बंद करेगा? देशी और विदेशी की इस जंग में कहीं न कहीं कानून में खामियां जरूर हैं। जिसका विदेशी फायदा उठाकर देशी बन रहे हैं तथा देशी लोग विदेशी बताकर जेल की सलाखों में पहुंचा दिए जा रहे हैं। कानून की इन खामियों को दूर करना नितांत आवश्यक है, वरना सामान्य जनमानस का कानून पर से भरोसा उठने लगेगा। अपने देश-प्रदेश की लोकहितकारी सरकारों के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात होगी। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।) 


 
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