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जय श्रीराम के नारे से क्यों चिढ़ने लगीं ममता

03/06/2019

योगेश कुमार सोनी 
पिछले दिनों दो बार ऐसा देखा गया कि पश्चिम बंगाल में कुछ लोगों ने जय श्रीराम के नारे लगाए जिससे ममता बनर्जी इतनी नाराज हो गईं कि गाड़ी से उतरकर ऐसे लड़ रही थीं कि जैसे वो उनकी चिढ़ हो। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति मानी जा रही है। कभी बचपन में ऐसा होता था कि मजाक में किसी के नाम को बिगाड़ कर या किसी बच्चे को कोई जो चीज पसंद न हो और उसके सामने बार-बार उस चीज का नाम लेकर चिढ़ाया जाता था। लेकिन एक मुख्यमंत्री जो अपने राज्य के लिए बेहद गंभीर भी मानी जाती हैं, वह मात्र भगवान का नाम लेने से चिढ़ रही हों, ऐसा पहली बार देखा जा रहा है।
अब यदि इस बात का विश्लेषण करें तो इस तरह की शैली से ममता बनर्जी मन की कुंठा स्पष्ट हो जाती है कि वो हिंदुत्व को पसंद नहीं करतीं या फिर यह समझ में आता है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने जिस तरह अपने पैर पसारे हैं, उससे ममता इस कदर विचलित हो गई हैं कि उन्हें राम नाम भी बुरा लगने लगा है। हालांकि ऐसा करके मुख्यमंत्री अपना अहित कर रही हैं और खुद का मजाक बना रही हैं। वैसे भी बीजेपी की रैली व सभा में यह नारा लगता रहता है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में 42 में से 18 सीटों पर विजय प्राप्त की है। उधर, राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मात्र 22 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। पिछली संसद में तृणमूल के 32 सांसद थे। इस बार उसे 10 सीटों का नुकसान हुआ, जबकि पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी ने इतनी सीट हासिल की है। विधानसभा वार चुनावी आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मात्र 28 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। इस बार के चुनाव में बीजेपी का 128 क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन रहा है। दूसरीओर, साल 2014 में 214 क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने वाली टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) अब केवल 158 क्षेत्रों में सिमटकर रह गई। इसके अलावा विगत दिनों टीएमसी के करीब 63 पार्षद व तीन विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे। यह सिलसिला अभी जारी है। लगातार इस तरह के झटकों से कोई भी बौखला जाएगा। लेकिन जिस तरह ममता बनर्जी का व्यवहार खुले तौर पर सबके सामने आ रहा है, इससे उनकी छवि नकारात्मक हो रही है। लगातार दो बार से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनती आ रही हैं। 2016 में विधानसभा चुनाव में 294 में से 211 सीटों पर अकेले तृणमूल कांग्रेस ने कब्जा किया था। लेकिन इस बार हुए लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल से बनर्जी की जमीन खिसक गई। आगामी विधानसभा चुनाव जो 2021 में होने हैं, को लेकर बनर्जी को चिंता सताने लगी। जो स्वाभाविक है, क्योंकि कोई भी अपना किला भेदते हुए या गिरते हुए नहीं देख सकता। किसी पार्टी का निर्माण करना, उसके बाद उसको संचालित करना बहुत कठिन काम है। अब राजनीति का फॉर्मेट पूरी तरह बदल चुका है। जो जनता के साथ खड़ा होगा, जो काम करेगा, वही टिकेगा। अब राजनीति पार्ट टाइम का खेल नहीं बची। इस बार से लोकसभा चुनाव से उन लोगों का भ्रम भी दूर हो गया जो लगातार जीतने वाली सीटों को अपनी पैतृक सीट समझने लगे थे। ग्राउंड लेवल पर हर घटना की जानकारी जरूरी है, क्योंकि जनता जितनी जल्दी सिर पर बैठाती है उससे ज्यादा जल्दी उतार भी देती है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार इसका उदाहरण है। इस हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बेहद चिंतित और परेशान हैं, जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
2019 के लोकसभा चुनावों के सभी सातों चरणों में पश्चिम बंगाल में बड़े स्तर पर हिंसा हुई थी। कई लोगों की जानें गई। पार्टियों के कार्यकर्ता भी मारे गए। भाजपा का दावा तो अपने 54 कार्यकर्ताओं की हत्या का है। जान-माल का भारी नुकसान हुआ। इसको लेकर राजनीतिक विशेषज्ञों ने यह मान लिया कि बंगाल में हिंसा के बिना चुनाव होना संभव नहीं।
हम आज तक यही सुनते आए हैं कि दृढ़ निश्चय जीत का संकल्प होता है लेकिन ऐसी राजनीति भी किस काम की जिसमें निर्दोषों की जान जाए। राजनीति हमेशा से विचारों की लड़ाई रही है। हमेशा नेता मंच पर एक-दूसरे की पार्टी को नीचा दिखाने का प्रयास करते आए हैं। लेकिन उन्होंने लड़ाई को कभी व्यक्तिगत नहीं लिया। लेकिन बीते दशक में राजनीति का स्तर बहुत गिरा है। शब्दों की मर्यादा का किसी को ख्याल नहीं रहा। आरोप-प्रत्यारोप के चक्कर में मुद्दा हर बार भटकता रहा था। ज्यादातर एक-दूसरे के निजी जीवन पर वार किया गया।
बहरहाल, यह लोकतंत्र है। पश्चिम बंगाल में अब दोनों (भाजपा-टीएमसी) को मिलकर जनता की कसौटी पर खरा उतरते हुए उनका भला करना है। हालांकि पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में दोनों का साथ मिलकर काम करना आसान नहीं है। ममता दीदी हर छोटी से छोटी घटना को दिल पर ले जाती हैं और हर बात पर अपना वजूद अड़ाने का प्रयास करती हैं, जो मुख्यमंत्री पद की गंभीरता पर सवालिया निशान खड़ा करता है। हिन्दुस्तान जैसे देश में किसी भी नेता को हर धर्म को साथ लेकर चलना अनिवार्य है। वैसे भी हमारे देश में विकास कार्यों से ज्यादा धर्मों की राजनीति होती है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में तो कुछ पार्टियों ने कई जातियों, खासतौर अल्पसंख्यकों पर अपना कॉपी राइट समझते हुए इस तरह वोट मांगे थे जिससे देश बांटने का स्टंट साफ दिख रहा था। सौभाग्य का इतराना सबको अच्छा लगता है लेकिन अब अपनी जीत के लिए कुछ भी करना या बोलना दुर्भाग्य को भी इतराने का मौका देने लगा। अब टीएमसी व बीजेपी दोनों को ही साथ काम करने की जरूरत है क्योंकि किसी पार्टी का उद्देश्य राज्य की तरक्की करना व शांति व्यवस्था बनाए रखना होता है। यदि एक-दूसरे को परेशान करके या बैर रख के किया गया तो राज्य का विकास धूमिल हो जाएगा। आज के तकनीकी युग में जरूरत है रोजगार, सुरक्षा, रक्षा, नौकरियां जैसे मुद्दों पर चर्चा करने व उस पर काम करने की है क्योंकि अब युवा पीढ़ी बदलाव व तरक्की चाहती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 


 
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