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सत्ता की पिच पर खेलने को आतुर बाजवा

28/10/2019

सत्ता की पिच पर खेलने को आतुर बाजवा

रहीस सिंह

पाकिस्तानी सेना चीफ कमर जावेद बाजवा सेना से इतर कामों में जिस तरह से दिलचस्पी ले रहे हैं, उससे यह कयास लगने शुरू हो गए हैं कि पाकिस्तान में इमरान सरकार के दिन पूरे हो गए हैं क्या?

पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना चीफ कमर जावेद बाजवा ने कुछ देर के लिए अपनी वर्दी उतारकर संभ्रांत नेता की तरह कराची में पाकिस्तान के जगत सेठों की बैठक लेने पहुंच गये। यह बैठक गुपचुप नहीं हुयी बल्कि आधिकारिक रूप से सम्पन्न हुयी थी, जबकि इससे पहले वे रावलपिंडी में दो बार गुपचुप बैठकें कर चुके थे। इसलिए इस बैठक के बाद यह कयास लगना शुरू हो गया कि क्या यह बैठक इमरान खान के तख्तापलट का ट्रेलर है?
क्या पाकिस्तान एक बार फिर अपना पुराना इतिहास दोहराएगा? क्या एक बार फिर पाकिस्तानी लोकतंत्र सैन्य मार्शलों के बूटों के नीचे रौंदा जाएगा? क्या इमरान खान का हस्र नवाज शरीफ जैसा होगा या फिर जुल्फिकार अली भुट्टो जैसा? पाकिस्तान के अंदर एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च स्तरीय विश्लेषक तक के जेहन में यह बात बैठ चुकी है कि पाकिस्तानी सेना अब इमरान को सत्ता से बेदखल करने की पटकथा लिख रही है और प्रधानमंत्री इमरान खान का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। अब पाकिस्तानी आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा अपना हुलिया ही नहीं बदल रहे हैं बल्कि मिजाज भी बदल रहे हैं। यह मिजाज इसलिए बदल रहा है, क्योंकि वे एक डिफैक्टो शासक की तरह काम करने लगे हैं यानी वे अब पाकिस्तान की ड्राइविंग सीट पर बैठ चुके हैं।
अगर गौर से देखें तो यह पाकिस्तान में तख्तापलट या सत्ता हस्तांतरण का एक नरम तरीका है। ऐसा लगता है कि कमर बाजवा अभी कुछ दिनों तक इमरान खान को मुखौटा बनाए रखना चाहते हैं ताकि लोकप्रिय सरकार को सत्ताच्युत करने का आरोप उन पर न लगे। लेकिन वे जनमत को जानने की कोशिश इन मीटिंग के जरिए कर रहे हैं। विशेषकर उन वर्गों के जरिए जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पकड़ रखते हैं और बाजार के मर्म को पहचानते हैं। जैसे ही उन्हें यह लगेगा कि इस बिजनेस क्लास के साथ बाजार और बाजार के साथ जनता का मूड बदल गया है, वे इमरान को पूरी तरह से सत्ताच्युत कर देंगे। लेकिन तब तक वे इस नरम तख्तापलट के जरिए ही सत्ता चलाने की युक्ति पर चलेंगे। अब कुछ सवाल हैं, जिनका उत्तर ढूंढना आवश्यक है।
पहला यह कि पाकिस्तान में आखिर बार-बार ऐसा होता क्यों है? दूसरा यह कि बाजवा किस हद तक जा सकते हैं? तीसरा यह कि बाजवा की इमरान खान के साथ विदेश यात्राएं और उन देशों के राष्ट्रप्रमुखों व सेनाप्रमुखों के साथ मीटिंग आखिर क्या संदेश देती है? जहां तक पहले प्रश्न का सम्बंध है तो इसके लिए पाकिस्तान के लोकतांत्रिक इतिहास को देखना होगा। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में लोकतंत्र सही रूप में कभी जड़ें जमा ही नहीं पाया बल्कि वह सेना द्वारा नियंत्रित या गाइडेड ही रहा। इस तरह से वहां सेना ‘रियल स्टेट एक्टर’ की हैसियत में रही और इस्लामाबाद का राजनीतिक स्टैब्लिशमेंट औपचारिक और प्रतीकात्मक एक्टर के रूप में। रही बात बाजवा की, कि वे किस हद तक जा सकते हैं। तो इसका एक उदाहरण नवाज शरीफ के रूप में देखा जा चुका है।
पाकिस्तानी आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा की नियुक्ति नवाज शरीफ द्वारा की गयी थी। लेकिन नवाज शरीफ को जेल पहुंचाने में भी बाजवा की ही मुख्य भूमिका रही। ध्यान रहे कि इमरान खान की जीत के पीछे पाकिस्तानी आर्मी की ही अहम भूमिका थी क्योंकि आर्मी यदि नवाज शरीफ और उनकी पार्टी को न्यायपालिका के जरिए खत्म न करती तो इमरान खान का इस्लामाबाद जाने का रास्ता कभी साफ नहीं हो पाता। दरअसल सेना और आईएसआई ने इमरान खान को एक पिच तैयार करके दी थी। उस पिच पर इमरान खान को खेलना था और बाजवा को अंपायरिंग करनी थी। इस स्थिति में इस्लामाबाद की चुनी हुयी सरकार के लिए पहला विकल्प यह था कि वह रावलपिंडी के रियल स्टेट एक्टर (अथवा डीप स्टेट) अर्थात सेना के सबआॅर्डिनेट की तरह से काम करें।
हालांकि जिस समय नवाज शरीफ ने कमर जावेद बाजवा को अपना आर्मी चीफ नियुक्त किया था, उस समय पाकिस्तानी मीडिया के रिपोर्ट्स और एक्सपर्ट्स ने लिखा था कि बाजवा को चार सीनियर जनरलों के मुकाबले इसलिए तरजीह दी गयी क्योंकि लो-प्रोफाइल और लोकतंत्र समर्थक विचारों के पक्षधर हैं। चूंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाकिस्तान की सेना के प्रमुख के रूप में ऐसे जनरल को चुनना चाहते थे, तो मिलिट्री एक्सपर्ट होने के साथ ही इस्लामिक राष्ट्र में लोकतंत्र का समर्थक भी हो।
इसलिए बाजवा उनकी पहली पसंद बने। लेकिन हुआ क्या? और क्यों? नवाज एक तरह से सत्ता से बेदखल किए गये और बाजवा लो- प्रोफाइल से हाई-प्रोफाइल कॉडर में आ गये। बाजवा ने आर्मी चीफ बनते ही पाकिस्तानी सैनिकों को संबोधित करते हुए कश्मीर पर आक्रामक रवैया अपनाने को कहा था। एक बात और इमरान खान की सत्ता संभालने के बाद से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी कमजोर पड़ती दिखी है। ध्यान रहे कि आर्गेनाइजेशन आॅफ इस्लामिक कोआॅपरेशन (ओआईसी) ने अपनी बुनियाद पड़ने से लेकर 2019 तक भारत को पूछा तक नहीं। वहां सिर्फ पाकिस्तान और सऊदी अरब की दादागीरी चली। लेकिन 2019 में भारत को विशिष्ट अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया जबकि पाकिस्तान द्वारा धमकी दी गयी थी यदि भारत को आमंत्रित किया गया तो ओआईसी समिट का बहिष्कार करेगा। फिर भी भारत को आमंत्रित किया गया।
संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को सर्वोच्च नागरिकता सम्मान प्रदान किया गया। आज अधिकांश मुस्लिम देश या तो भारत के साथ खड़े हैं या फिर भारत की ओर देख रहे हैं। चूंकि यही पाकिस्तान की असल ताकत थी, जो अब उसके हाथ से निकल रही है। पाकिस्तान आतंकवाद पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर रहा इसलिए पश्चिमी देश भी उसके साथ खड़े नहीं हो पा रहे और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वे भारत के साथ आ गये हैं। यह स्थिति इमरान खान के नेतृत्व के दौरान ही पैदा हुयी या यूं कहें कि अपने उच्चतम बिंदु तक पहुंची। स्वाभाविक है पाकिस्तानी फौज इसके लिए इमरान खान को ही जिम्मेदार मानेगी और अंपायरिंग की बजाय अब स्वयं कप्तानी करने के विकल्प का चयन करेगी।
इसकी झलक न केवल बाजवा द्वारा व्यवसायियों की बैठक में मिली है, बल्कि उनके विदेश दौरों में भी दिखी। उल्लेखनीय है कि आर्मी चीफ बाजवा इमरान खान के चीन दौरे पर गये और प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ शीर्ष चीनी नेताओं के साथ यहां हुई बैठकों में भी शामिल हुए। वे चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग के साथ इमरान की बैठक में मौजूद थे। बाजवा ने केंद्रीय सैन्य आयोग के उपाध्यक्ष जू किइलियांग के साथ अलग से बैठक की और दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों पर चर्चा की। यही नहीं हाल ही में संपन्न हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के सत्र में भाग लेने अमेरिका गए इमरान खान के साथ बाजवा और आईएसआई प्रमुख लेμिटनेंट-जनरल फैज हमीद भी मौजूद थे। जहां तक घरेलू नीतियों का प्रश्न है तो बाजवा ने जब कारोबारियों की मीटिंग ली, तो कारोबारियों की उनसे मांग थी कि वे जल्द से जल्द निवेश बढ़ाने के बारे में विचार करें, ताकि अर्थव्यवस्था में आई कमियों को दूर किया जा सके।
इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान के ज्यादातर बड़े कारोबारियों को इमरान खान सरकार से ज्यादा सेना पर भरोसा है। वहीं पाकिस्तानी आर्थिक विश्लेषक भी यह मानने लगे हैं कि सेना देश के आर्थिक हालात को अच्छे से सुधार सकती है। उनका मानना है कि इमरान सरकार इस मामले से निपटने के लिए ज्यादा सक्षम नहीं हैं। यह भरोसा सैन्य संगठन और उनके चीफ पर व्यक्त किया जा रहा है, क्या यह कुछ और ही संकेत नहीं करता? स्पष्ट रूप से इससे पाकिस्तान की डेमोक्रेसी और असैन्य संगठनों पर असर पड़ेगा जिसका फायदा उठाते हुए सेना इमरान खान सरकार की छुट्टी कर सकती है। यह निष्कर्ष इसलिए निकाला जा सकता है कि क्योंकि पाकिस्तानी सेना ऐसा ही करती आयी है।
इतिहास गवाह है कि वर्ष 1958, 1969, 1977 और 1999 का जब सेना ने चुनी हुयी सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। खास बात यह है कि सेना लोकतांत्रिक सरकारों को आर्थिक संकट और भ्रष्टाचार के नाम पर ही उखाड़ फेंकती रही है। चूंकि इस समय भी पाकिस्तान में आर्थिक संकट है और इमरान खान उससे देश को उबार पाने में असफल होते नजर आ रहे हैं और इसे देखते हुए जनता उनसे नाराज है। जम्मू-कश्मीर मामले को भी संभालने में इमरान खान पूरी तरह से फेल हा गये। कुल मिलाकर सेना ने जो पिच इमरान खान के लिए तैयार की थी, उस पर इमरान अपने आपको सफल करार नहीं दे पाए। इसलिए अब कमर जावेद बाजवा स्वयं इस पिच पर कप्तान के रूप में खेलने के लिए प्रस्तुत हो रहे हैं।


 
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