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इस्तीफे से नहीं बनेगी कांग्रेस की बात

02/07/2019

सियाराम पांडेय 'शांत' 
सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का अध्यक्ष तो बना दिया लेकिन राहुल अध्यक्ष पद की गरिमा को कायम नहीं रख सके। इसमें उनका दोष नहीं। किसी नौसिखिये से इससे अधिक अपेक्षा भी क्या की जा सकती है? उनके राजनीतिक बयान से हर पढ़े-लिखे इंसान को यही लगा कि राहुल गांधी कांग्रेस का ही नुकसान कर रहे हैं। दूसरी पार्टियां उसे नुकसान पहुंचाएं या न पहुंचाएं लेकिन राहुल कांग्रेस को इतना नुकसान जरूर पहुंचा देंगे कि उसे उबरने में वर्षों लगेंगे। अब शायद राहुल गांधी को भी यह बात समझ में आने लगी है। इसीलिए उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की है। यह महज दिखावा है या हकीकत, यह तो उनके राजनीतिक स्टैंड से ही स्पष्ट होगा। बहरहाल, इतना तो तय है कि राहुल भी यह मान चुके हैं कि वे मोटिवेटर अच्छे हो सकते हैं लेकिन पार्टी को मजबूती से खड़ा नहीं कर सकते। पार्टी खड़ी होती है दूरदृष्टि से, जो उनके पास नहीं है। उनके सलाहकार भी लल्लो-चप्पो करने वाले हैं। नीति कहती है कि 'सचिव, वैद्य, गुरु तीनि जो प्रिय बोलहिं भय आस। राज, धर्म, तन तीनि कर होहिं बेगहिं नास।' दुर्भाग्यवश कांग्रेस के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है। सिर्फ इस्तीफा-इस्तीफा खेलने से कांग्रेस की बात नहीं बनेगी। यदि वजूद बनाए रखना है तो उसे रणनीतिपूर्वक आगे बढ़ना होगा। 
  राजनीति में हार-जीत सामान्य बात है। लेकिन राहुल गांधी की इस्तीफे की पेशकश से उनकी हताशा व्यक्त हुई है। पार्टीजनों का विश्वास टूटा है। राहुल गांधी को सोचना होगा कि उनकी पार्टी अब केंद्र की सत्ता में नहीं है। केंद्र की सत्ता पाने के लिए उसे भाजपा से आगे की लकीर खींचनी होगी। यह समय भाजपा की आलोचना करने का नहीं, जनता का विश्वास जीतने का है। उसे विकास कार्य को जल्द पूरा करने का केंद्र या भाजपा नीत राज्य सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए। कांग्रेस को भाजपा से प्रेरणा लेनी चाहिए जिसने लोकसभा में दो सांसदों से सफर शुरू किया और आज लोकसभा में उसके सर्वाधिक सदस्य हैं। यह बात राहुल गांधी और उनके सिपहसालार जितनी जल्दी समझ सकें, उतना ही अच्छा है। अन्यथा कांग्रेस के नुकसान की खाई रोज बढ़ रही है। कांग्रेस का मुकाबला ऐसे दल से है जिसमें कोई भी व्यक्ति शिखर पर पहुंच सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस है, जहां सोनिया, राहुल और प्रियंका के बिना पार्टी में पत्ता भी नहीं हिल सकता। इस प्रवृत्ति से कांग्रेस को उबरना होगा। लोकतंत्र की जंग लोकतांत्रिक होकर ही जीती जा सकती है। 
राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहेंगे या नहीं रहेंगे, यह बाद का विषय है। लेकिन उनका दुख बड़ा है। उनकी जगह कोई भी होता तो इस तरह के दुख के भार से दब जाता। लोकसभा चुनाव से उन्हें बहुत आशा थी। उनके सिपहसालारों ने यही समझाया था कि इस चुनाव में कोई लहर नहीं है। यही सोचकर वे नरेन्द्र मोदी पर पहले से ही हमलावर हो गए थे। लेकिन जब समय अनुकूल नहीं होता तो सारे दांव उलटे पड़ते हैं। लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश कर दी और गांधी परिवार से अलग के किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा। उन्हें भी पता था कि उनके इस्तीफे से न तो कांग्रेस खुश होगी और न ही वह नेहरू परिवार से बाहर का अध्यक्ष तलाशने की जहमत उठाएगी। अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि वे कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहेंगे, लेकिन लोगों की लड़ाई लड़ते रहेंगे। उन्होंने इस बात पर दुख भी जताया कि उनके इस्तीफे के बाद किसी मुख्यमंत्री, महासचिव या प्रदेश अध्यक्ष ने न तो हार की जिम्मेदारी ली और न ही अपने पद से इस्तीफा दिया। वरिष्ठों की राय पर भले ही राहुल गांधी इस वक्त अपने पद पर बने हुए हों लेकिन उनकी जिद बताती है कि आज नहीं तो कल वे अपने पद से विमुक्त जरूर होंगे। राहुल गांधी अध्यक्ष पद न छोड़ें, इसलिए उन पर दबाव बनाने की कांग्रेस स्तर पर हर संभव कोशिश हो रही है। कार्यकर्ता उनके घर तक पहुंच रहे हैं लेकिन जब से उन्होंने कांग्रेसियों को जिम्मेदारी का आईना दिखाया है तब से लेकर आज तक कांग्रेस से धड़ाधड़ इस्तीफे हो रहे हैं। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान समेत कई राज्यों से पदाधिकारी इस्तीफे दे रहे हैं। यह और बात है कि ये इस्तीफे नितांत छोटे स्तर पर हो रहे हैं। राहुल गांधी ने जिन्हें जिम्मेदारियों का अहसास कराया था, इस्तीफे से अपने को दूर ही बनाये रखा है। लगता नहीं कि इस बाबत उनका कोई मानस भी बना है। उन्हें पता है कि पद बहुत मुश्किल से मिलता है। क्या पता फिर मिले या न मिले। नरेन्द्र मोदी रेडियो के जरिये अपने मन की बात करते हैं। राहुल गांधी ने भी अपने मन की बात की है। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों, प्रदेश अध्यक्षों और महासचिवों के दिल तक यह बात नहीं पहुंची या पहुंची भी तो उन्होंने उसे खास तवज्जो नहीं दी। उत्तरप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राजबब्बर ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका इस्तीफा वापस करने का काम भी गांधी परिवार ने ही किया था। ऐसे में राहुल गांधी के दुख का औचित्य समझ में नहीं आता।   
 यह सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बयान के बाद पार्टी में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस महासचिव दीपक बाबरिया समेत ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के साथ विभिन्न राज्यों के करीब 150 कांग्रेस नेताओं ने अपना इस्तीफा पार्टी अध्यक्ष को भेज दिया है। ये त्यागपत्र मंजूर होंगे या उन्हें अपने पद पर  बने रहने को कहा जाएगा, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन राहुल गांधी की हताशा ने कांग्रेस का मानसिक तौर पर बड़ा नुकसान कर दिया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस नुकसान की भरपाई के लिए, राहुल गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए उत्तर प्रदेश मिशन-2022 पर काम शुरू कर दिया है। वह लगातार जनसंपर्क कर रही हैं। कांग्रेस की जमीनी जड़ को समझ रही हैं। उनके साथ चार विशेष टीमें भी उत्तरप्रदेश में जुटी हैं। राहुल गांधी चाहते हैं कि 2022 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बने। यह स्थिति बहुत आसान नहीं है। योगी आदित्यनाथ जिस सक्रियता से विकास कार्य को अंजाम दे रहे हैं। केंद्र सरकार की योजनाओं को आम जन तक पहुंचाने की दिशा में काम कर रहे हैं, उससे नहीं लगता कि कांग्रेस या किसी भी विपक्षी दल के लिए फिलहाल यहां कोई स्कोप बचा है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश पर कोई चमत्कारी प्रभाव नहीं डाल पाए। राहुल गांधी की पारिवारिक सीट भी कांग्रेस के हाथ से निकल गई। इस खीझ में प्रियंका गांधी ने उत्तरप्रदेश की प्रदेश इकाई समेत सभी जिला इकाइयों को भंग कर दिया है। सभी कमेटियां भंग कर दी गई हैं। 
  कांग्रेस नेताओं की मानें तो उत्तर प्रदेश का गढ़ जीतना कांग्रेस के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। यहां हर जाति का अब अपना दल बन रहा है। उत्तर प्रदेश जाति और उपजाति में बंट रहा है। वोटों का ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। केवल सक्रिय होने से ही काम नहीं चलने वाला। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 17 अति पिछड़ी जातियों को अपनी कैबिनेट में प्रस्ताव पारित कर एसटी में शामिल कर दिया है। दलितों और पिछड़ों की राजनीति करने वाले दलों के लिए यह फैक्टर भी दुख देगा। मोदी और योगी सरकार पहले दिन से ही चुनाव मोड में हैं। उन्हें लगता है कि विकास कार्य के माध्यम से ही जनता जनार्दन के दिलों पर राज किया जा सकता है। जब तक विपक्ष इस मुद्दे पर काम नहीं करेगा, तब तक उसकी दाल गलने नहीं जा रही है। नीति और नीयत साफ हो, दृष्टिकोण स्पष्ट हो तो अंधेरे में भी रोशनी की उम्मीद की जा सकती है लेकिन जहां जनता से नजदीकी कुछ समय की ही हो, वहां राजनीतिक सफलता की कल्पना भी बेमानी है। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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