लेख

Blog single photo

एनआरसी : खोदा पहाड़, निकली चुहिया

01/09/2019

अरविंद कुमार राय
सम में विदेशी घुसपैठ की समस्या को लेकर 80 के दशक में राज्य के लोगों ने चिंता व्यक्त करना शुरू किया था। जिसके तहत 5 वर्षों तक ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के नेतृत्व में लंबा आंदोलन चला। आंदोलन के सापेक्ष में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, असम सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया और आसू के नेताओं की बैठक में ‘असम समझौता’ किया गया। समझौते में अवैध घुसपैठियों को राज्य से बाहर निकालने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के अद्यतन की बात कही गई थी। हालांकि तब राजनीतिक कारणों से एनआरसी की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। आंदोलन की कोख से जन्म लेने वाली असम गण परिषद (अगप) ने राज्य में दो बार सत्ता संभाली, लेकिन घुसपैठ को लेकर उसने भी कोई मजबूत पहल नहीं की।
विभिन्न संगठनों के द्वारा बार-बार दबाव बनाए जाने के बाद तत्कालीन कांग्रेसी राज्य सरकार ने 2009 में एनआरसी को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट दो जिलों में शुरू किया, जिसका मुस्लिम संगठनों ने भारी विरोध किया। नतीजतन वोट बैंक के खिसकने के डर से कांग्रेस ने पायलट प्रोजेक्ट को बंद कर दिया। इस संबंध में असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्ल्यू) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में अपनी निगरानी में एनआरसी के काम को शुरू करने का निर्देश दिया। केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने एनआरसी की प्रक्रिया को राज्य में एक साथ आरंभ किया। एनआरसी के अद्यतन के लिए एनआरसी आवेदन फॉर्म की प्राप्ति की प्रक्रिया मई, 2015 के अंत में शुरू हुई और 31 अगस्त, 2015 को समाप्त हुई। कुल 3 करोड़ 30 लाख 27 हजार 661 लोगों ने आवेदन किया। राज्य सरकार के 52 हजार से अधिक अधिकारी और कर्मचारियों ने काम करना शुरू किया। 30 जुलाई, 2018 में एनआरसी की पहली मसौदा सूची जारी की गई। उसमें 2,89,83,677 लोगों का नाम शामिल कर लिया गया। आवेदन करने वाले लोगों में से 41 लाख अधिक लोगों का नाम दस्तावेजों में कमी पाए जाने के कारण बाहर कर दिया गया। इस दौरान एक लाख 87 हजार 633 व्यक्तियों को शामिल किए जाने के खिलाफ आपत्तियां प्राप्त हुईं, जिनके नाम पूर्ण प्रारूप में दिखाई दिए थे। एक और अतिरिक्त ड्राफ्ट बहिष्करण सूची 26 जून, 2019 को प्रकाशित की गई थी, जिसमें एक लाख दो हजार 462 व्यक्तियों को बाहर रखा गया था।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी की निगरानी करते हुए 31 जुलाई को एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित करने का कड़ा निर्देश जारी किया। राज्य सरकार ने याचिका दायर करते हुए समय सीमा को बढ़ाने की मांग की। जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। इस बीच राज्य में आए भीषण बाढ़ के चलते एनआरसी सेवा केंद्र में पानी भरने के चलते काम में बाधा उत्पन्न होने की बात कही गई। एनआरसी के असम प्रदेश संयोजक प्रतीक हाजेला ने भी याचिका दायर करते हुए इस बात को न्यायालय के सामने रखा। जिस पर संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने एनआरसी की अंतिम सूची 31 अगस्त को जारी करने का फैसला सुना दिया। राज्य सरकार और केंद्र सरकार बार-बार न्यायालय से अंतिम सूची प्रकाशित करने की समय सीमा को बढ़ाने की मांग की लेकिन, न्यायालय अपने आदेश पर अड़ा रहा और साफ तौर पर सख्त हिदायत दी कि तय सीमा के अंदर अगर एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित नहीं की जाती है तो इसे न्यायालय की अवमानना करार दिया जाएगा। सरकार के सामने न्यायालय की बातों को मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था। आनन-फानन में 31 अगस्त को एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित कर दी गई। जिसमें कुल 3 करोड़ 11 लाख 21 हजार चार व्यक्ति अंतिम एनआरसी में शामिल होने के योग्य पाए गए। जबकि 19 लाख 6 लाख 657 व्यक्तियों का नाम एनआरसी में शामिल नहीं किया गया।
सवाल उठता है कि एनआरसी के अद्यतन की प्रक्रिया के पीछे उद्देश्य क्या था?  क्या एनआरसी अद्यतन से उन उद्देश्यों की पूर्ति हुई है, तो इसे एक शब्दों में कहा जा सकता है यह प्रक्रिया पूरी तरह से हिंदी के एक मुहावरे ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ साबित हुआ है। कारण एनआरसी राज्य में अवैध विदेशियों की पहचान करने के उद्देश्य से चलाया गया था, लेकिन यह अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सका। राज्य की जनता यह सवाल कर रही है कि भारी-भरकम धनराशि खर्च करने के बाद भी कोई सफलता हासिल नहीं हुई है। सरकार ने एनआरसी में वंचित लोगों को ट्रिब्यूनल में अपील करने के लिए 120 दिन का समय दिया है। जिन लोगों का नाम एनआरसी में शामिल नहीं किया है, उसमें अधिकांश भारतीय लोग बताए जा रहे हैं। एनआरसी की प्रक्रिया को पूरी तरह से त्रुटि रहित नहीं कहा जा सकता। कारण ऐसे-ऐसे उपनामधारी लोगों का नाम शामिल नहीं किया गया है, जो मूलतः केवल भारत में ही पाए जाते हैं। जैसे राय, सिंह, शर्मा, यादव आदि तो क्या वे सभी विदेशी हैं? एक वाजिब सोच है कि अपने घर में रहने वाले लोगों को कभी अपने को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज की जरूरत नहीं होती है। दूसरों को अपनी प्रमाणिकता साबित करने के लिए दस्तावेजों की जरूरत होती है। असम में हुए एनआरसी अद्यतन के संबंध में इसको पूरी तरह से सटीक पाया गया है। लोगों का कहना है कि विदेशी भारत में प्रवेश करने से पहले ही अपने सभी तरह के दस्तावेज बना लेते हैं, जिसके चलते उन्हें विदेशी साबित करने में काफी परेशानी होती है। इसके अनगिनत उदाहरण असम में देखे गए हैं।
एनआरसी की सूची को लेकर सवाल एनआरसी की अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद से ही उठने लगे हैं। इस सूची का वामपंथी पार्टियां, एआईयूडीएफ, ऑल असम माइनारिटी स्टूडेंट यूनियन (आम्सू) आदि ने समर्थन किया है। जबकि भाजपा, कांग्रेस, अगप, छात्र संस्था आसू, एपीडब्ल्यू के साथ ही कई संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले एनआरसी के प्रदेश संयोजक प्रतीक हाजेला पर तथ्यों की अनदेखी कर मनमाने ढंग से एनआरसी को प्रकाशित करने का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही सरकार के तर्कों का न्यायालय में हाजेला द्वारा लगातार विरोध करने का भी लोग आरोप लगा रहे हैं। सूची में राज्य के चर्चित व्यक्तियों का नाम भी शामिल नहीं किया गया है। जिसमें सेना के सेवानिवृत्त हवलदार बिमल चौधरी का नाम एनआरसी में शामिल नहीं है। जबकि उनके परिवार के सभी सदस्यों का नाम शामिल हो गया है। एआईयूडीएफ के नेता व अभयापुरी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के विधायक अनंत मालू, एआईयूडीएफ के पूर्व विधायक अताउर रहमान माजर बरभुइंया, दलगांव के विधायक इलियास अली की पुत्री का नाम भी एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है। जबकि देश में सुर्खियां बटोरने वाले विदेशी न्यायाधीकरण द्वारा विदेशी घोषित सेवानिवृत्त भारतीय सेना के जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) मोहम्मद सनाउल्लाह व उनके तीन बच्चों का नाम भी एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं हुआ है। हालांकि, सनाउल्लाह की पत्नी का नाम अंतिम सूची में शामिल कर लिया गया है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने असमिया लोगों के लिए ऐतिहासिक दिन करार दिया है। लगता है महंत अपने आंदोलन के दिनों को पूरी तरह से भूल गए हैं। जबकि, उनकी पार्टी इसका विरोध कर रही है। भाजपा के प्रभावशाली नेता व असम सरकार में वित्त आदि मामलों के मंत्री डॉ हिमंत विश्वशर्मा ने न्यायालय से रि-वेरिफिकेशन की मांग की है। उनका कहना है कि लिगेसी डाटा में भारी गड़बड़ी की गई है। जिसके चलते कई विदेशियों का नाम एनआरसी में शामिल हो गया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने कहा है कि एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए पूर्व में 10 दस्तावेजों को शामिल किया गया था, लेकिन प्रतीक हाजेला ने पांच और नए दस्तावेजों को जोड़वा दिया, जिसके चलते विदेशियों का नाम बड़ी संख्या में शामिल हो गया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रिपुन बोरा ने कहा है कि हम शुरू से ही मांग करते आ रहे हैं कि एक भी बांग्लादेशी नागरिक का नाम एनआरसी में शामिल न हो तथा एक भी भारतीय का नाम एनआरसी में शामिल होने न छूटे। कांग्रेस बड़ी
सफाई से अपने स्टैंड को छुपा गई है। 
असम गण परिषद ने भी एनआरसी को लेकर नाराजगी व्यक्त करते हुए रि-वेरिफिकेशन की मांग की है। अगप अध्यक्ष अतुल बोरा ने कहा है कि पार्टी एनआरसी की सूची से संतुष्ट नहीं है। असम के लोग इससे निराश हैं। संघर्ष विराम करने वाले उग्रवादी संगठन एनडीएफबी (प्रगतिशील) के अध्यक्ष गोविंद बसुमतारी ने नागरिकता का आधार वर्ष 1951 नहीं होने पर असंतुष्टि जाहिर की है। उन्होंने एनआरसी की अंतिम सूची के प्रकाशन पर असंतुष्टि प्रकट करते हुए इसे विदेशियों को स्वदेशी बनाने का एक तंत्र करार दिया है। ज्ञात हो कि एनआरसी के लिए असम समझौते के अनुसार नागरिकता आधार
वर्ष 1971 रखा गया है।
असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्ल्यू) के अध्यक्ष अभिजीत शर्मा ने इसे बांग्लादेशियों का भारतीयकरण करने के रूप में करार दिया है। उन्होंने इसके लिए प्रतीक हाजेला को जिम्मेदार ठहराया है। जबकि आसू ने नाराजगी व्यक्त करते हुए इस मामले को पुनः सुप्रीम कोर्ट में उठाने की चेतावनी दी है। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
Top