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जल संकट से जूझता जनजीवन, सचेत होने की जरूरत

14/06/2019

डॉ.दिनेश प्रसाद मिश्र 
'गगरी न फूटी खसम मर जाय, भौंरा तोर पानी गजब कर जाय,' बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र का यह शोकगीत क्षेत्र में जल संकट की भयावह स्थिति की तस्वीर बयान करती है। यहां महिला को पति का मर जाना तो स्वीकार है किंतु भौंरा पोखर का सूख जाना गंवारा नहीं है। स्पष्ट है कि पाठा क्षेत्र में एक घड़े पानी की कीमत व्यक्ति  या मनुष्य के जीवन से अधिक है। वहां गर्मी में तो महिलाएं प्रातःकाल से ही जल की व्यवस्था में जुट जाती हैं। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय पूरे देश में पर्याप्त पानी उपलब्ध था। लोगों को पेयजल के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी। आम जनता तथा उसके पशुओं के लिए उनके घर के आसपास ही पर्याप्त जल उपलब्ध था, किंतु आज जल के अधिकांश स्रोत सूख रहे हैं। भूगर्भ जल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। पीने के पानी के लिए लोगों को बोतलबंद पानी पर निर्भर होना पड़ रहा है। पेयजल की यह समस्या यूं तो वर्ष भर बनी रहती है किंतु गर्मी के आने के साथ ही यह समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। आकाश की तपिश से जनमानस बेहाल रहता है और पानी दुर्लभ होता जा रहा है। 
वस्तुतः जो स्थिति बुंदेलखंड की है, लगभग यही स्थिति आज संपूर्ण राष्ट्र की बन गई है। यदि कहें कि यह स्थिति पूर्ण विश्व की बनने जा रही है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज देश का कोना-कोना जल समस्या से ग्रस्त है। वर्ष 2018 में कर्नाटक ने अभूतपूर्व बाढ़ देखी थी, किंतु अब 2019 में उसके 176 में से 156 तालुके सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं। महाराष्ट्र, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ भयंकर जल समस्या का सामना कर रहे हैं। समीक्षकों द्वारा तृतीय विश्वयुद्ध की आशंका पानी के लिए व्यक्त की जाती रही है। पानी की उपलब्धता की स्थिति को देखते हुए यह लगने लगा है कि विश्वयुद्ध हो या न हो, पर हर गली- मोहल्ले में, शहर -शहर में, गांव- गांव में पानी के लिए 10-15 वर्ष में ही युद्ध होंगे और भाईचारे के साथ रह रहे पड़ोसी पानी के लिए आपस में लड़ेंगे। पानी की यह समस्या भारत के साथ-साथ समस्त विश्व को भी निरंतर व्यथित कर रही है। अफ्रीका के केपटाउन शहर में पानी पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अरब देश पहले से ही इस समस्या से जूझ रहे हैं। हालांकि वह अपनी आर्थिक समृद्धि के बल पर समस्या का तात्कालिक समाधान कर ले रहे हैं, किंतु पानी को लेकर उनके समक्ष भी यक्ष प्रश्न खड़ा है कि कब तक पानी की आपूर्ति सहज ढंग से होती रहेगी। निकट भविष्य में पानी का प्रयोग अस्त्र रूप में भी संभावित है। कुछ समय पहले पाकिस्तान से तनाव हो जाने पर भारत द्वारा सिंधु नदी के प्रवाह को रोक कर पानी की उपलब्धता बाधित करने की चेतावनी दी गई थी। पानी की अनुपलब्धता की समस्या पूरे राष्ट्र में पिछले 10-15 साल से चल रही है। इसके मूल में नियमित रूप से वर्षा का न होना तथा सूखा पड़ते रहना तथा सरकार की गलत नीतियां भी हैं। इन नीतियों का परिणाम ही रहा है कि राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में 10 से 15 फीट तक पानी नीचे चला गया है। इसके अन्य प्रमुख कारणों में हमारे द्वारा जल स्रोतों का भलीभांति रखरखाव न होना, नदी नालों पर अंधाधुंध बांध बनाना, चेकडैम बनाना तथा उनके निरंतर प्रवाह को बाधित कर उन्हें समाप्त कर देना एवं कुआं-तालाबों को पाटकर उन पर भूमाफिया द्वारा कब्जा कर लेना आदि है। सभी जानते हैं कि जल ही जीवन है। लेकिन इस दिशा में व्यक्ति, राज्य या सरकार की ओर से सहज रूप में कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। जल स्रोत निरंतर समाप्त हो रहे हैं। भूगर्भ का जल निरंतर हमारी पहुंच से दूर होता जा रहा है। भारत में विश्व की आबादी का 18 फीसदी भाग निवास करता है, किंतु उसके लिए हमें विश्व में उपलब्ध पेयजल का मात्र 4 फीसदी हिस्सा ही मिल पाता है। नीति आयोग के एक ताजा सर्वे के अनुसार भारत में 60 करोड़ आबादी भीषण जल संकट का सामना कर रही है। अपर्याप्त और प्रदूषित जल के उपभोग से भारत में हर साल 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यूनिसेफ द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार भारत में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर जिस प्रकार पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं, उससे लगता है कि 2030 तक भारत के 21 महानगरों का जल पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा और वहां पानी अन्य शहरों से लाकर उपलब्ध कराना होगा।
 विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण से स्पष्ट है कि पिछले 7 दशकों में विश्व की आबादी दोगुने से भी अधिक बढ़ गई है, किन्तु पानी की उपलब्धता किसी भी रूप में न बढ़कर कम ही हुई है। इसके कारण लोगों तक पानी की उपलब्धता निरंतर कम होती जा रही है। पानी की अनुपलब्धता के साथ-साथ उसकी स्वच्छता एवं शुद्धता भी प्रभावित हो रही है। प्रायः अशुद्ध एवं गंदा पानी एक बड़े वर्ग द्वारा प्रयोग में लाया जा रहा है। फलस्वरूप गंदे पानी के उपयोग से डायरिया, टायफाइड, हैजा जैसी जलजनित बीमारियां पैदा हो रही है। स्लोवाकिया की एक कहावत है कि 'शुद्ध जल विश्व की प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण औषधि है।' बेशक, शुद्ध जल की आपूर्ति समस्त विश्व की समस्या है किंतु यह समस्या भारत में अत्यंत गंभीर है। यहां कुछ व्यावसायिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां मौके का फायदा उठाते हुए भूगर्भ के जल का असीमित दोहन कर बोतलबंद पानी बेचकर असीमित लाभ उठा रही हैं। वैसे उनके पानी की गुणवत्ता भी किसी स्तर पर प्रमाणित नहीं है। परीक्षण करने पर बहुधा दूषित जल बेची जा रही बोतलों में पाया जाता है। 
 पानी की आवश्यकता को देखते हुए देश की जल नीति में प्रथम स्थान पेयजल को प्राप्त है। उसके पश्चात सिंचाई तथा उद्योग को स्थान दिया गया है। लेकिन व्यवहार में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। पेयजल की समस्या के निवारण के लिए कहीं कोई प्रयास नहीं किया जा रहा। कारोबारियों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने बोतलबंद पानी, शीतल पेय जैसे उत्पादों को तैयार कर मालामाल होने के लिए असीमित जल हर समय उपलब्ध कराया जाता है। उन्हें भूगर्भ के जल का असीमित दोहन करने का लाइसेंस प्रदान किया जाता है। अभी समय है। प्रत्येक व्यक्ति, राज्य एवं सरकार को नित्य प्रति बढ़ रही पानी की कमी तथा भूगर्भ जल के स्तर में हो रही गिरावट को दृष्टि में रखकर उसकी उपलब्धता तथा वृद्धि हेतु सार्थक प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके लिए भूगर्भ के जल के अपरिमित दोहन पर प्रतिबंध लगाना होगा। तभी भूगर्भ जलस्तर में वृद्धि हो सकती है। इस समय देश में हो रही कमजोर बारिश तथा कमजोर जल प्रबंधन के कारण वर्षा का जल संरक्षित न हो पाने के कारण आवश्यकतानुसार जल उपलब्ध न होकर निरंतर कम पड़ता जा रहा है। अब पानी सहेजने के लिए कुछ कारगर उपाय सरकार के साथ-साथ जनमानस को भी करना होगा। प्रायः देखा जाता है कि बरसात का पानी बहकर निकल जाता है। उसको रोकने तथा उसके संरक्षण के लिए छोटे-छोटे बांध और तालाब बनाने में समाज और सरकार दोनों को ही आगे बढ़ कर कार्य करना होगा, जिससे बरसात का पानी सुरक्षित तथा संरक्षित हो जिससे भूगर्भ का जलस्तर सहज रूप में ऊपर उठे। इस साल भयंकर गर्मी पड़ने के कारण पानी की समस्या मुंह बाए खड़ी है। दूसरी ओर, अलनीनो के प्रभाव के कारण वर्षा में 7 फीसदी कमी होने की बात कही गई है। मौसम विभाग ने भी 3 फीसदी कम वर्षा होने का अनुमान लगाया है। कर्नाटक महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों के बांध एवं जलाशय लगभग जलरहित हो चुके हैं। कम बारिश होने पर उनके आगे आने वाले दिनों में भी जल से परिपूर्ण होने की संभावना नहीं बनती। अस्तु, आवश्यकता है कि हम अपने जल संचयन की क्षमता को बढ़ाते हुए वर्षा के अधिकाधिक जल को संरक्षित करें। तभी हमारा प्रयास सार्थक होगा और जल समस्या से मुक्ति मिलेगी। अन्यथा भयंकर परिणाम सामने होंगे।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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