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देश काल से परे राम

14/10/2019

देश काल से परे राम

सियाराम पांडेय ‘शांत’/ संजय सिंह

रामकथा शताब्दियों से भारतीय जनमानस से जुड़ी हुई है, और इसीलिए भारतीय लोक-जीवन का अभिन्न अंग भी है। सच तो यह है कि राम देश काल से परे हैं। यही कारण है कि न केवल भारत बल्कि विश्व के अनेक देशों में पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ राम कथा का मंचन होता है। यह भी कह सकते हैं कि विश्व में जहां-जहां रामभक्त हैं, वहीं रामलीला है। कहां, कैसे होती है रामलीला? इसी पर आधारित इस बार की आवरण कथा।

भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां रामलीला का आयोजन प्रतिवर्ष होता है। भारत तो भगवान् श्रीराम की अपनी भूमि है इसलिए उनके जीवन लीला का गान बहुत ही स्वाभाविक है। रामलीला में राम, सीता और लक्ष्मण के जीवन वृत्तांत का वर्णन किया जाता है। रामलीला का मंचन देश के विभिन्न क्षेत्रों में होता है। यह देश में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। बंगाल और मध्य भारत के अलावा दशहरा पर्व देश के अन्य राज्यों में क्षेत्रीय विषमता के बावजूद एक समान उत्साह और शौक से मनाया जाता है।


उत्तरी भारत में रामलीला के उत्सव दस दिनों तक चलते रहते हैं और अश्विन माह की दशमी को समाप्त होते हैं, जिस दिन रावण, मेघनाद व कुंभकर्ण की आकृति पुतले के रूप में जलायी जाती है। पहली रामलीला कब शुरू हुई? किसने कराई, यह शोध का विषय हो सकता है। लेकिन इतना तो तय है कि सबसे पहली राम लीला भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में ही आरंभ हुई थी। ऐसी मान्यता है कि राम वनगमन के बाद अयोध्यावासियों ने चौदह साल भगवान राम की बाल लीलाओं का अभिनय करते हुए बिताए थे।


इसके बाद के इतिहास की अगर छानबीन करें तो रामलीला के आदि प्रवर्तक वाराणसी के कतुआपुर स्थित फुटहे हनुमान के निकट रहने वाले मेघा भगत थे। ऐसी किंवदंती है कि भगवान राम ने उन्हें सपने में दर्शन देकर आदेश दिया था कि वे उनकी लीलाओं का मंचन कराएं। इस सपने के बाद ही उन्होंने काशी में रामलीला शुरू कराई। वहीं अधिकांश लोगों का मत है कि रामलीला की अभिनय परंपरा के प्रतिष्ठापक गोस्वामी तुलसीदास हैं। उन्हीं की प्रेरणा से अयोध्या और काशी के तुलसी घाट पर प्रथम बार रामलीला का आयोजन हुआ था।
आज रामलीला सार्वदेशिक हो चुकी है। भारत के साथ मॉरीशस, नेपाल और यहां तक कि रूस में भी रामलीला का मंचन होने लगा है। काशी, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग, कानपुर, बिठूर की रामलीलाएं तो सैकड़ों साल पुरानी हो चुकी हैं। इसके पीछे मूल उद्देश्य भगवान राम का गुणानुवाद और उनके आचरण से कुछ बेहतर सीखना ही रहा है। बहरहाल, देश के विभिन्न हिस्सों में रामलीला के अलग-अलग प्रकार हैं। कर्नाटक में मंदिरों के प्रांगण में यक्षगान शैली में रामायण के विविध प्रसंगों का वर्णन होता है। पर ये प्रसंग उत्तर भारत की परम्परा से भिन्न होते हैं। केरल में कथकली नृत्य-नाटक शैली में रामकथा के आठ प्रसंगों का प्रदर्शन होता है।
पश्चिम बंगाल में और ओड़ीसा में जात्रा तथा छाऊ नृत्यों के रूप में, गुजरात में भवाई नृत्य के रूप और महाराष्ट्र में ललित स्वरूप में राम कथा का पारम्परिक प्रदर्शन होता है। थाईलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया, बर्मा, लओस आदि में रामकथा का प्रर्याप्त प्रचार है। थाईलैंड और कम्बोडिया में रामकीर्ति प्रसिद्ध है। यहां रामलीला का आयोजन नृत्य-नाटक के रूप में होता है। इंडोनेशिया की रामलीला का आयोजन रंग-बिरंगे नृत्य के रूप में होता है। जबकि नेपाल में रामलीला मनोरंजन के लिए नहीं होती बल्कि धार्मिक भावना से की जाती है। नेपाली भाषा में अनुदित ‘भानु रामायण’ पर आधारित रामकथा को प्रत्येक वर्ष पंचमी तिथि पर जानकी मंदिर में अनुप्राणित किया जाता है, क्योंकि लोगों का विश्वास है कि यहां सीता-राम का विवाह हुआ था।

रामनगर की रामलीला
नवरात्रि के दौरान देश की सबसे प्राचीन नगरी कहे जाने वाले वाराणसी में अलग ही तरह का अनुभव मिलता है। वाराणसी की रामलीला देश भर में काफी प्रसिद्ध है और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। आम रामलीलाओं से अलग यह रामलीला पूरे एक महीने तक चलती है। साल 1783 में रामनगर में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। यह रामलीला आज भी उसी अंदाज में होती है और यही इसे और जगह होने वाली रामलीला से अलग करता है। इसका मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। रामनगर की रामलीला पेट्रोमेक्स और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज के दम पर होती है। बीच-बीच में खास घटनाओं के वक़्त आतिशबाजी जरूर देखने को मिलती है। अनंत चतुर्दशी के दिन रामलीला का आरंभ होता है और इसका समापन एक माह बाद पर्ू्णमासी के दिन खत्म होता है। नवरात्रि के दौरान धार्मिक अनुष् ठान के संपूर्ण विधान सहेजने वाली विश् व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला को खास बनारसी अंदाज में दुनिया भर के मेहमान देखते हैं।
नदी किनारे होने वाली इस रामलीला को किसी स्टेज पर नहीं बल्कि दूर दूर तक फैले घाट और शहर में आयोजित किया जाता है। 235 साल से चली आ रही इस रामलीला में हर एक दृश्य के लिए अलग स्थान को चुना जाता है। जैसे अगर रामलीला में अयोध्या दिखाना है तो उसकी जगह अलग होगी, लंका दिखाना है तो उसका स्थान अलग होगा। इसी प्रकार स्वयंवर और युद्धक्षेत्र के सीन भी अलग जगहों पर किये जाते हैं। इस रामलीला की भव्यता इसको बेहद खास बनाती है। 45 दिन तक चलने वाली रामनगर रामलीला को यूनेस्को द्वारा अनोखी वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पहचान मिली है।

लखनऊ की रामलीला
लखनऊ में 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने रामलीला की शुरुआत की। नवाबी काल में नवाब आसिफुद्दौला खुद यहां रामलीला देखने आते थे, उन्हें रामलीला इतनी पसंद आयी की उन्होंने ऐशबाग में रामलीला के लिए साढ़े छ: एकड़ जमीन दे दी और एक मिसाल कायम करते हुए इतनी ही जमीन ईदगाह के लिए भी दी। नवाबी दौर के बाद अंग्रेजों ने इस आयोजन को रोकने की कोशिश की तो फिरंगियों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए हिन्दू और मुस्लिम समुदाय ने मिलकर रामलीला करते हुए गंगा जमुनी तहजीब की नयी मिसाल कायम की। लाला किशनदास परिवार से शुरू हुई इस रामलीला समिति को उनके बाद कन्हैयालाल प्रागदास ने संभाला। प्रागदास के बाद पुत्र चमनलाल और गुलाबचंद ने मिल कर रामलीला को आगे बढ़ाया।
साथ ही उन्हें पंडित केदारनाथ और उनके परिवार से भी पूरा सहयोग मिलता रहा। जिसके चलते पंडित केदारनाथ के पुत्र और लखनऊ के मेयर डॉ. दिनेश शर्मा रामलीला समिति के मुख्य संरक्षक हो गए। रामलीला को नया आयाम देने के लिए डॉ. दिनेश शर्मा के सहपाठी और मित्र पण्डित आदित्य द्विवेदी भी उनके साथ इस आयोजन में मंत्री पद का दायित्व निभाते आ रहे हैं। लखनऊ की इस अनूठी रामलीला में कुल 270 कलाकार हर साल भाग लेते है। जिनमें दूसरे राज्यों के भी कलाकार होते हैं। इन कलाकारो में आराध्य का अंश लाने के लिए रामलीला के पहले दिन इनकी आरती की जाती है और रामलीला के आखिरी दिन तक उन कलाकारों को पूज्य माना जाता है, जिसके चलते दशहरे के दिन मुख्य अतिथि मंच पर इन कलाकारों की आरती करते हैं। खास बात यह है कि भगवान राम का किरदार निभाने वाला कलाकार ही रावण का वध करता है।

गोरखपुर की रामलीला
गोरखपुर मंडल की रामलीला साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। कहीं सीता की भूमिका युवा शाकिर निभाते नजर आते हैं तो कहीं जाहिद अली सरीखे लोग करोड़ों कीमत की जमीन रामलीला के मंचन के लिए दान देने से नहीं हिचकते हैं। 156 वर्ष पुरानी वर्डघाट रामलीला समिति अपनी भव्यता के लिए पूर्वांचल में प्रसिद्ध है। रामलीला में अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार व बिहार के कलाकार अपने जीवंत अभिनय से लोगों को अभिभूत करते हैं। वर्डघाट समिति की रामलीला के किरदारों और 100 वर्ष पुरानी दुर्गा पूजा समिति के मिलन के बाद ही गोरखपुर की दशहरा पूरी होती है। वर्डघाट की रामलीला स्वर्गीय कृष्ण किशोर प्रसाद के प्रयास से वर्ष 1862 में स्थानीय कलाकारों के प्रयास से शुरू हुई थी। संरक्षक सुशील गोयल बताते हैं कि तब बमुश्किल 100 रुपये में रामलीला मंचन हो जाता था।

गोरखपुर मंडल की रामलीला साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। कहीं सीता की भूमिका युवा शाकिर निभाते नजर आते हैं तो कहीं जाहिद अली सरीखे लोग करोड़ों कीमत की जमीन रामलीला के मंचन के लिए दान देने से नहीं हिचकते हैं।

अब बजट 2 लाख के पार पहुंच गया है। वर्ष 1940 से बंसतपुर चौराहे पर राघव-शक्ति मिलन का कार्यक्रम होता है। जहां वर्डघाट में रावण दहन के बाद भगवान राम, सीता, लक्ष्मण के साथ शहर की सबसे पुरानी दुर्गावाड़ी पूजा समिति की दुर्गा प्रतिमा की आरती उतारते हैं। करीब दो दशक पहले तक विद्या मिश्र और उनके दो भाई राम, लक्ष्मण और सीता का चरित्र निभाते थे। गोरखपुर की दूसरी सबसे पुरानी रामलीला आर्यनगर की है। 101 वर्ष पुरानी रामलीला 1914 में गिरधर दास व पुरुषोत्तम दास रईस के प्रयासों से शुरू हुई थी। रामलीला के लिए जमीन गिरधर दास और पुरूषोत्तम दास के साथ ही जाहिद अली सब्जपोश ने भी दी थी।
लंबे समय तक रावण का चरित्र निभाने वाले पूर्णमासी बताते हैं कि शुरुआत में स्थानीय कलाकारों द्वारा शुरू हुई। रामलीला के मंच को जगतबेला के नंद प्रसाद दुबे ने विहंगम स्वरूप दिया। कमेटी के अध्यक्ष रेवती रमण दास बताते हैं कि 50 साल पहले 500 रुपये में रामलीला हो जाती थी, अब यह खर्च 8 लाख से अधिक पहुंच चुका है। तीसरी सबसे पुरानी रामलीला विष्णुमंदिर की है। वहीं राजेन्द्र नगर और धर्मशाला बाजार की रामलीला भी पूरी भव्यता से होती है।

प्रयागराज की रामलीला
प्रयाग की रामलीला का इतिहास काफी पुराना है। ऐसी मान्यता है कि 1913-14 में इस रामलीला की शुरुआत हुई थी। यहां की रामलीला का मंचन इसलिए भी अनोखा है कि इसमें कलाकार एक स्थान पर नहीं बल्कि पूरे दारागंज इलाके में मंचन करते हैं। गंगा किनारे नागवासुकि मंदिर में अगर अयोध्यापुरी बनाई जाती है तो गंगा किनारे ही मोरी में जनकपुरी बनाई जाती है। जिस तरह अयोध्या से जनकपुर के लिए भगवान राम की बारात गई थी, उसी तरहकी परंपरा का यहां बखूबी निर्वाह किया जाता है। राम बारात के बाद आगे की सभी लीला का मंचन अलोपीबाग स्थित रामलीला मैदान में एक मंच पर होता है। यह मंचन शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन शुरू होता है। रामलीला का इतना बड़ा क्षेत्र कहीं और देखने को नहीं मिलता।

कानपुर की रामलीला
रामलीला मंचन में कानपुर का समृद्धशाली इतिहास है। 18वीं सदी में यहां पहली बार राम लीला हुई थी। व्यवस्थित मंचन की बात करें तो परेड की रामलीला दशकों पुरानी है, कैलाश मंदिर की रामलीला का भी ऐसा ही अतीत है। गोविंद नगर में होने वाली लीला में संवाद पंजाबी भाषा में होते हैं। कानपुर में रामलीला का सूत्रपात 1774 में हुआ था। सचेंडी के राजा ने सबसे पहले जाजमऊ क्षेत्र में धनुष यज्ञ-रामलीला कराई थी। उसी के बाद कानपुर में रामलीला के मंचन शुरू हुए। अनवरगंज में होने वाली छोटी सी रामलीला की जिम्मेदारी महाराज प्रयाग नारायण तिवारी ने संभाली। राय बहादुर विशम्भरनाथ अग्रवाल, बाबू विक्रमाजीत सिंह आदि सहयोगियों के साथ सन् 1876 में परेड रामलीला सोसाइटी गठित कर इसका मंचन परेड के मैदान में शुरू कराया।
धीरे-धीरे इस रामलीला ने विशिष्ट पहचान बना ली। कानपुर की दूसरी ऐतिहासिक रामलीला सन 1849 में शिवली ग्राम के रामशाला मंदिर में शुरू हुई। सरसौल क्षेत्र की पाल्हेपुर की रामलीला की स्थापना 1861 में हुई। यहां प्रतिवर्ष 20 दिवसीय रामलीला का आयोजन होता है। इस लीला की शुरुआत झंडागीत के रचनाकार पद्मश्री श्यामलाल गुप्त पार्षद और संस्थापक स्वामी गोविंदाचार्य महाराज ने की थी। कानपुर की चौथी ख्यातिप्राप्त रामलीला कैलाश मंदिर के संस्थापक गुरुप्रसाद शुक्ल ने उसी मंदिर में सन 1880 में शुरू की थी। इसकी खासियत है कि रामलीला के लिए रामयश दर्पण नाटक के नाम से तीन भागों में पुस्तक लिखी गई। इसमें लिखे संवाद ही पात्र बोलते हैं। दशहरे की सुबह रावण पूजन के लिए यहां रावण का मंदिर भी बनवाया गया है।

शाकिर बनते हैं सीता
देवरिया जिले के भागलपुर में पिछले 68 वर्षों से हो रही रामलीला गंगा जमुनी संस्कृति की मिसाल है। यहां संस्कृत की चौपाई और हिन्दू संस्कृति से जुड़े प्रसंगों का जीवंत चित्रण मुस्लिम करते हुए दिखते हैं। भरत-मिलाप के दृश्य को जीवंत करने वाले अहमद अली को देखने दूरदूर से लोग पहुंचते हैं। अहमद के साथ ही कई मुस्लिम रामलीला में पात्र बनते हैं। 1950 में शुरू भागलपुर की रामलीला में बलिया में प्रिंटिंग प्रेस संचालित करने वाले शाकिर अली सीता की भूमिका निभाते हैं। 30 वर्ष के शाकिर कहते हैं कि आंसुओं के साथ भावुक होते दर्शकों का प्रेम हमें हर साल सीता मां का चरित्र निभाने की प्रेरणा देता है।
भरत का किरदार निभाने वाले अहमद अली का कहना है कि गांव की आबादी काफी कम थी, लेकिन आसपास की मुस्लिम आबादी इसमें जोर शोर से शिरकत करती थी। पहले लालटेन की रोशनी में लीला का मंचन होता था, पात्र खुद घर से साड़ी और धोती लेकर मंचन करने के लिए आते थे। रामचरित मानस की अधिकांश चौपाई जुबान पर याद रखने वाले अहमद कहते हैं कि धर्म के ठेकेदारों ने सौहार्द को बिगाड़ा है। वरना सभी धर्म प्रेम और सदभाव का ही संदेश देते हैं। रामलीला में शमशाद लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला का तो मोहम्मद अली मुनि का चरित्र निभाते हैं।

दिल्ली की विख्यात रामलीला
दिल्ली में रामलीलाओं का इतिहास बहुत पुराना है। दिल्ली में, सबसे पहली रामलीला बहादुरशाह जफर के समय पुरानी दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई थी। लवकुश रामलीला कमेटी, अशोक विहार रामलीला कमेटी आदि दिल्ली की प्राचीन रामलीलाओं में से हैं। राम भारतीय कला केन्द्र द्वारा रामलीला का मंचन तीन घंटों में दर्शाया जाता है। यहां की रामलीला में पात्रों की वेशभूषा दर्शनीय है। इनके अतिरिक्त दिलशाद गार्डन रामलीला, दिल्ली छावनी की रघुनन्दन लीला समिति मयूर यूथ क्लब, मयूर विहार-1 रामलीला, सूरजमल विहार रामलीला आदि भी दिल्ली की चर्चित रामलीलाओं में से हैं। दिल्ली में रामलीला की शुरुआत अब से कोई 250 वर्ष पहले हुई। इसका वर्णन ‘हμत तमाशा’ में मिलता है। इस समय रामलीला दलों की संख्या 500 से अधिक है। दिल्ली की रामलीलाओं में सर्वाधिक विख्यात है फिरोजशाह कोटला के मैदान में होने वाली भारतीय कला केन्द्र की रामलीला। यह नृत्य नाटिका है जिसमें श्रीराम के जन्म से लेकर राज्याभिषेक की पूरी कथा का 50 प्रतिशत कलाकारों की टोली द्वारा प्रस्तुत की जाती है।

चार सौ साल की राम लीला
उत्तर-प्रदेश के फतेहपुर जिले के खजुहा कस्बे में रामनगर शैली में रामलीला तो होती ही है। साथ ही रावण को उतना ही सम्मान दिया जाता है जितना कि दक्षिण भारत में। यहां पुतले को जलाने के स्थान पर उसकी आरती वंदना की जाती है। इस रामलीला की शुरुआत लगभग 400 वर्ष पूर्व हुई थी जिसका उल्लेख ‘वंशावली’ पुस्तक में मिलता है।


 
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