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बड़ौदा हाऊस में बड़ा खेल

08/07/2019

बड़ौदा हाऊस में बड़ा खेल

भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का खेल रेलवे बोर्ड में चल रहा है। बड़े-बड़े अधिकारी ऐसे लोगों के पैरोकार बन गए हैं। वे उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। अगर कोई इसके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे, डराया-धमकाया जाता है। पदोन्नति रोकने का भय दिखाया जाता है। इस तरह का माहौल बड़ौदा हाउस में है। यहीं उत्तर रेलवे बोर्ड का मुख्यालय है। यहां काम के बजाए हेराफेरी करने वालों को बचाने की जुगत भिड़ाई जाती है। पूरा बोर्ड इसी काम में लगा है। तभी तो जो काम महीने भर में खत्म होना चाहिए, उसे पूरा करने में साढ़े चार महीने लग जाते हैं। वह इसलिए नहीं कि बोर्ड के अधिकारियों के सिर पर काम का बहुत बोझ है बल्कि इसलिए क्योंकि वे लोग कुछ आरोपियों के पक्ष में खड़े हैं। उन्हें विजिलेंस से बचाना है। उसके लिए तानाबाना बुनना पड़ता है। कहां-कहां जुगाड़ लगाया जा सकता है, उसका गणित बैठाना पड़ता है। इन सब में समय लगता है। तो जाहिर है बाकी काम देर से होगा। ऐसा ही विभागीय परीक्षा के साथ हुआ। इसमें सी समूह के कर्मचारियों को बी समूह में प्रोन्नत करना था। उसके लिए परीक्षा होती है। इसे महीने भर के अंदर करना होता है।

एक तरफ तो हमारे देश में और रेलवे में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री और रेल मंत्री सतत प्रयासरत हैं वही दूसरी ओर कुछ अधिकारी नियम-कानून को ताक पर रख कर भ्रष्ट कर्मचारियों को बचाने में लगे हैं।

लेकिन बोर्ड की लापरवाही देखिए, उसे परीक्षा लेने और उसका परिणाम घोषित करने में साढ़े चार माह लग गए। जो सीधे तौर पर रेलवे बोर्ड के नियमों का उल्लंघन है। लेकिन इसकी कहां किसी को चिंता है। नियम तोड़ना तो बोर्ड का स्वभाव बन चुका है। इस तरह का स्वभाव क्यों बना और परीक्षा में देरी क्यों हुई? इसका किस्सा बहुत दिलचस्प है। हुआ यह कि बोर्ड में भाई- भतीजावाद की संस्कृति ने जन्म ले लिया। इस वजह से सबको खुश रखने का सिलसिला चल पड़ा। अधिकारी किसी को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकते थे। इस वजह से राजदारों को बचाने का सिलसिला भी चल पड़ा। उनमें से कुछ का नाम बाहर आ गए हंै। एक हंै आशीष गुलाटी और दूसरे हैं, संजीव कुलश्रेष्ठ। इनकी हेराफेरी के किस्से बोर्ड में प्रचलित हैं। लोग इनकी मिसाल देते हैं। कहते हैं, कैसी सेटिंग है दोनों की। विजिलेंस भी कुछ नहीं कर पा रहा है। विभागीय परीक्षा में भी दोनों पास है।

जल्द ही विजिलेंस से भी क्लीन चिट मिल जाएगी। फिर दोनों सहायक वाणिज्य अधिकारी बन जाएगे। इस तरह की चर्चा बोर्ड में आम है। लोग रेल मंत्रालय को इस बाबत पत्र भी लिख चुके हैं। उसमें लिखा है… ……एक तरफ तो हमारे देश में और रेलवे में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री और रेल मंत्री सतत प्रयासरत हैं वहीं दूसरी ओर कुछ अधिकारी नियम- कानून को ताक पर रख कर भ्रष्ट कर्मचारियों को बचाने में लगे हैं।… ताजा मामला संजीव कुलश्रेष्ठ और आशीष गुलाटी का है जिनको 2013 में रेल मंत्रालय के सतर्कता विभाग ने भ्रष्टाचार के मामले में नोटिस जारी किया था। उसे तत्कालीन सतर्कता निरीक्षक नवीन रावत और दिनेश शर्मा की मिलीभगत और तत्कालीन मुख्य सतर्कता अधिकारी शैलेन्द्र शर्मा के दबाव के कारण दबा दिया गया।.. लेकिन सतर्कता निदेशक अधिकारी सुनील माथुर के बार-बार कहने पर नोटिस दिल्ली मंडल भेजा गया। मंडल में किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वह संजीव कुलश्रेष्ठ और आशीष गुलाटी को सतर्कता विभाग को नोटिस दे।

इन का रसूख इतना है कि वे पैसे के बल पर सतर्कता विभाग में भी खेल करा लेते हंै।… जो पत्र में लिखा है, यदि वह सही है तो मामला बहुत गंभीर है। उसकी वजह यह है कि दोनों सतर्कता विभाग को प्रभावित करने में सक्षम हैं। इस विभाग को ईमानदार माना जाता है। कारण यह है कि जांच का जिम्मा इन्हें ही पास है। अब अगर जांच अधिकारी ही भ्रष्ट हो जाएगा तो सतर्कता विभाग का मतलब क्या रह जाएगा। हालांकि पत्र में जिस तरह से कहा गया है, उससे साफ है कि सतर्कता विभाग भ्रष्टाचारियों के साथ खड़ा है। पत्र में इस बात को साफ तौर पर उजागर किया गया है। पत्र में लिखा है…. सतर्कता विभाग 100- 200 रुपये कम होने पर पार्सल कर्मचारियों को दंडित करता रहता है, पर उन लोगों (संजीव कुलश्रेष्ठ और आशीष गुलाटी) पर वह छह साल से लंबित मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। यही नहीं इन्हें बचाने के लिए इनके पुराने साथी तथा वर्तमान में उत्तर रेलवे सतर्कता विभाग में कार्यरत दिनेश शर्मा तथा मंत्रालय में कार्यरत नवान रावत और इन दोनों के गुरु शैलेन्द्र शर्मा जो कि ईडीसीसी का कार्य देख रहे हैं और आपका लेकर (रेल मंत्री) महाप्रबंधक, मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, मंडल रेलवे प्रबंधक पर अपने चहेतों को बचाने के लिए प्रक्रिया में फेर बदल करने का दबाव बना रहे हैं।

पिछले साल भी जब मंडल से गुलाटी और कुलश्रेष्ठ को आरोप मुक्त करने की अनुशंसा उत्तर रेलवे सतर्कता विभाग को भेजी गई थी। तब दिनेश श्रर्मा ने त्वरित कार्यवाही करते हुए अनुशंसा को मंत्रालय में भिजवाया था। सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि एक बार फिर दोनों भ्रष्ट वाणिज्य निरीक्षकों ने श्रीमति गुंजन गुप्ता पर श्रीमति मणि आनंद से दबाव बनवाकर आरोप मुक्त करवाने को कहा है। उत्तर रेलवे सतर्कता विभाग कुछ कर्मचारियों के विजिलेंस क्लीयरेंस देने में भी हμतों का लगा देता है, परंतु अपने चहेते कर्मचारियों के बचाव के लिए उत्तर रेलवे सतर्कता विभाग ने सहयोग करते हुए मंत्रालय को इन्हें दंड मुक्त करने की अनुशंसा एक घंटे में भेज दी।…. पत्र से इतना तो स्पष्ट है कि बोर्ड और सतर्कता विभाग मंत्रालय की आंखों में धूल झोंक रहा है। वह मंत्रालय को सच से दूर रख रहा है और मनमाने तरीके से काम रहा है। इसी वजह से वहां काम कर रहे, कर्मचारियों के साथ अन्याय हो रहा है। वे न्याय मांग रहे हैं। लेकिन बोर्ड आंख और कान बंद करके बैठा है।


 
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