युगवार्ता

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हो जायेगा कायाकल्प

30/08/2019

हो जायेगा कायाकल्प

कृष्णमोहन सिंह

ऐसा लगता है कि डाक कर्मियों को ग्राहकों तक पार्सल पहुंचाने में बहुत रुचि नहीं रहती है। पांच दिन तक कोई भी पोस्ट आफिस में पड़ी रहती है। जबकि छोटे कस्बों में जहां निजी कूरियर वालों की भी पहुंच है, वहां ये कूरियर वाले तीन दिन में सामान पहुंचा देते हैं। कूरियर से पैकेट वापस आने का प्रतिशत एक से दो तक है। जबकि डाकघर से वापस आने का 50 प्रतिशत से अधिक है। इसकी प्रमुख वजह है जिम्मेदारी नहीं होना, पैकेट या पत्र डिलीवरी का टारगेट नहीं होना। गांवों के ज्यादातर डाक कर्मियों के पास स्कूटर या मोटरसाइकल न होना।
जबकि निजी कूरियर कम्पनियों के कर्मचारियों को हर दिन पैकेट डिलिवरी का टारगेट होता है। जिन्हें भी यहां नौकरी पर रखा जाता है, उसके लिए वाहन होना एक शर्त होती है। यदि डाक कर्मियों को भी समय से पैकेट डिलीवरी का लक्ष्य दे दिया जाये, और डाक विभाग व केन्द्र सरकार तमाम बड़ी कम्पनियों से गांवों के ग्राहकों तक उनके पार्सल समय से पहुंचाने का करार कर लें, तो डाक विभाग का कायाकल्प हो जायेगा। विश्व में सबसे अधिक डेढ़ लाख डाकघर भारत में है। लगभग एक लाख 33 हजार डाकघर गांवों में हैं। यदि डाकघरों से पार्सल डिलीवरी समय से होने लगे, तो इसके आगे निजी कूरियर कम्पनियों की हालत खराब हो सकती है।


 
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