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गढ़ वापसी की चुनौती

05/10/2019

गढ़ वापसी की चुनौती

बद्रीनाथ वर्मा

लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा व महाराष्ट्र में होने जा रहे विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की निगाहें हैं। एक तरफ मोदी सरकार की चमकदार उपलब्धियों से भाजपा कार्यकर्ता पूरे उत्साह में हैं। वहीं, अंतरकलह व सिरफुटौव्वल कांग्रेस की नियति बन चुकी है। ऐसे में दूसरी पारी खेलने को बेताब भाजपा को आखिर कैसे रोक पायेगी अंतर्द्वंद्व से जूझ रही कांग्रेस? क्या कभी कांग्रेस के गढ़ रहे दोनों ही राज्यों में भाजपा एकबार फिर अपना दबदबा बनाये रखेगी? चुनावों के इसी गुणा- भाग की पड़ताल करती इस बार की आवरण कथा।

ह रियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। लोकसभा चुनावों के बाद ये पहला मौका है जब देश में चुनाव होने जा रहे हैं। सबके तरकश में तीर सजने लगे हैं। हालांकि किसके तीर में कितना दम है और किस तीरंदाज का तीर लक्ष्यभेद कर पाने में सफल होगा, यह तो 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा, जब वोटों की गिनती शुरू होगी। लेकिन हां, एक बात सत्य है कि 2014 के विधानसभा चुनाव और 2019 के चुनाव में कुछ बुनियादी फर्क है। बीजेपी जहां पूरे दम खम व एकजुटता के साथ मैदान में है, वहीं विपक्ष में पूरी तरह से बिखराव है।

मतदान 21 अक्टूबर
मतगणना 24 अक्टूबर

मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस अभी भी अंतर्कलह से जूझ रही है। जबकि इसके विपरीत नरेंद्र मोदी सरकार की चमकदार उपलब्धियों से भरे 100 दिनों का जश्न ढोल नगाड़ों के साथ मनाकर भारतीय जनता पार्टी पूरे उत्साह में है। हो भी क्यों न। दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने ढेर सारे ऐसे बड़े फैसले लिए हैं, जिनका असर इन चुनावों पर भी जरूर पड़ेगा। भले ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अंतर होता है लेकिन राष्ट्रीय फलक पर प्रभावकारी मुद्दे भी इन पर अपना असर छोड़ते हैं, इसमें कोई शक नहीं। महाराष्ट्र में 288 सीटें हैं और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा-शिवसेना की गठबंधन सरकार है।

यहां विधानसभा का कार्यकाल 9 नवंबर को खत्म हो रहा है। इसी तरह हरियाणा विधानसभा में 90 सीटें हैं और मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है। यहां विधानसभा का कार्यकाल 2 नवंबर तक है। हरियाणा में 1.28 करोड़ वोटर हैं और 1.3 लाख ईवीएम का इस्तेमाल होगा। महाराष्ट्र में 8.94 करोड़ वोटर हैं और 1.8 लाख ईवीएम का इस्तेमाल होगा। दोनों ही राज्यों में 21 अक्टूबर को मतदान होगा। बहरहाल, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक जैसी कुप्रथा से मुक्ति दिलाना हो या जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना। मोदी सरकार के इन साहसिक फैसलों का प्रभाव इन चुनावों पर नहीं पड़ेगा, ऐसा सोचना भी मूर्खता होगी। जम्मू- कश्मीर से अनुच्छेद 370 की बिदाई के बाद हरियाणा से तो ऐसी भी खबरें आईं कि प्रशासन द्वारा स्कूलों से कहा गया कि वे इसका जश्न मनाएं। खैर, अनुच्छेद 370 को इतिहास के गर्त में धकेल देने के बाद का ये पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र व हरियाणा विधानसभा चुनाव में उतरने जा रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि देशहित में लिए गए इस फैसले का विधानसभा चुनाव में पार्टी को कितना लाभ मिलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नासिक में अपने भाषण के दौरान कश्मीर पर लिए फैसले का जोरदार तरीके से जिक्र किया। इसी तरह तमाम विरोधों को दरकिनार कर मुस्लिम महिलाओं को सदियों से चली आ रही तीन तलाक नामक कुप्रथा से आजाद कराना भी मोदी सरकार का साहसिक फैसला रहा। वोट बैंक के लिहाज से कई दलों ने इस बिल का विरोध किया लेकिन साहसिक फैसले लेने के लिए मशहूर पीएम मोदी न रुके न झुके।

मनोहर लाल खट्टर: जबरदस्त दावेदारी साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी के सरप्राइज पैकेज से मनोहर लाल खट्टर के नाम का ऐलान हरियाणा के सीएम के रूप में हुआ। सरप्राइज इसलिए क्योंकि सीएम पद के लिए उनका नाम दूर दूर तक नहीं था। यह भी एक तथ्य है कि हरियाणा में पहली बार बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल की थी। लेकिन पिछले पांच साल के कार्यकाल में खट्टर ने हर मोर्चे पर खुद की दावेदारी और पार्टी की छवि को मजबूत किया है। इसलिए साल 2019 के विधानसभा चुनाव में भी एक बार फिर उनके नाम की चर्चा है। वह हरियाणा के करनाल निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिस्टम और सामाजिक सुधार की हॉबी रखने वाले खट्टर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य और प्रचारक रहे हैं। पांच मई 1954 को हरियाणा के रोहतक जिले के निंदाना गांव में जन्मे मनोहर लाल खट्टर ने 12वीं तक की पढ़ाई जिले से की। उसके बाद दिल्ली से ग्रेजुएशन पूरा कर सदर बाजार में एक दुकान भी खोली लेकिन मन नहीं लगा क्योंकि नियति को कुछ और मंजूर था। उन्होंने 1977 में आरएसएस ज्वाइन किया। कालांतर में वह संघ के फुल टाइम प्रचारकर बन गए। 1994 बीजेपी के सदस्य बनकर संगठन के लिए एक कर्मठ कार्यकर्ता की भूमिका निभायी। परिणामस्वरूप साल 2000 में खट्टर को हरियाणा का महासचिव बना दिया गया। 2014 लोकसभा चुनाव में मनोहर लाल खट्टर हरियाणा इलेक्शन कमेटी के चेयरमैन भी रहे। सूबे में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल करने वाले खट्टर दूसरी दमदार पारी खेलने के लिए अपने कार्यों व मोदी सरकार की उपलब्धियों के बलबूते पर चुनावी मैदान में पूरे दमखम के साथ मौजूद हैं।

मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी में उठाए गए इस कदम का मुस्लिम महिलाओं ने भले ही खुले दिल से स्वागत किया है लेकिन यह भी एक सत्य है कि पुरुष वर्ग झल्लाया हुआ है। अकेले महाराष्ट्र में ही मुस्लिमों की आबादी 11.5 प्रतिशत है। ऐसे में इस फैसले का वोटों पर क्या असर पड़ेगा, यह भी देखने वाली बात होगी। इन कड़े और बड़े फैसलों के आलोक में भाजपा के लिए सब हरा-हरा ही है, ऐसा भी नहीं है। तीन तलाक को खत्म कर मुस्लिम महिलाओं को न्याय देकर पीएम मोदी और भाजपा ने दूर की कौड़ी खेली है। इससे उसे मुस्लिम महिलाओं के एक वर्ग का समर्थन जरूर मिलेगा। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 को समाप्त करने से भी कार्यकर्ता पूरे उत्साह में हैं। साथ ही पांच सालों में दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने अपने राज्यों में किये गये अच्छे काम उनके प्लस प्वाइंट हैं। लेकिन इसी के साथ आर्थिक मंदी के असर से बंद होती कंपनियां और बेरोजगार होते लोगों की नाराजगी को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। खुद विपक्ष भी मंदी और मंदी के कारण जा रही नौकरियों को अपने एजेंडे में शीर्ष पर रखेगा। इस लिहाज से भाजपा के न चाहते हुए भी आर्थिक मंदी का मुद्दा फलक पर मौजूद रहेगा। अब बात अगर कांग्रेस की की जाये तो महाराष्ट्र और हरियाणा, दोनों ही राज्य एक समय तक कांग्रेस का गढ़ हुआ करते थे।

लेकिन अपने हर गढ़ की तरह कांग्रेस ने इन्हें भी गंवाया है। वह अपने इन गढ़ों पर एक बार फिर काबिज हो जाएगी कम से कम इन विधानसभा चुनावों में तो ऐसी सूरत नहीं ही दिखाई पड़ रही है। राफेल का रायता फैलाकर प्रधानमंत्री मोदी को पटखनी देने का ख्वाब लोकसभा चुनाव में बिखर जाने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। काफी दिनों तक मान मनौव्वल के बाद भी जब वे नहीं मानें तो अंतरिम अध्यक्ष के रूप में एक बार फिर उनकी मां सोनिया गांधी ने कांग्रेस की बागडोर संभाल ली। मतलब इस बार अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का हो राहुल की यह मंशा धरी की धरी रह गई। घूम फिरकर अध्यक्ष परिवार के भीतर ही रही। बहरहाल, गांधी परिवार को कांग्रेस के लिए संजीवनी मानने वालों के लिए बुरी खबर है कि सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद भी पार्टी के भीतर के हालात ठीक नहीं हैं। राष्ट्रीय राजधानी से सटे हरियाणा कांग्रेस में सिर फुटौव्वल वाली स्थिति है। 9 सालों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे भूपिंदर सिंह हुड्डा और हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक तंवर के बीच की तनातनी की खबरें अक्सर मीडिया की सुर्खियां बनती रहीं। मामला यहां तक पहुंच गया था कि हुड्डा ने अपने करीबी विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाने की धमकी दे दी थी।

हुड्डा की धमकी से डरे कांग्रेस नेतृत्व ने डैमेज कंट्रोल के तहत अशोक तंवर को किनारे लगाते हुए हुड्डा की करीबी बतायी जाने वाली कुमारी शैलजा को हरियाणा कांग्रेस की कमान सौंप दी। इससे तंवर का नाराज होना बनता ही है। अब वे मीडिया में कांग्रेस को परेशानी में डालने वाले बयान देते फिर रहे हैं। कभी इस सूबे में काफी दखल रखने वाली इंडियन नेशनल लोकदल भी पारिवारिक कलह का शिकार होकर बेअसर साबित हो चुकी है। महाराष्ट्र की भी हालत इससे अलग नहीं है।

यहां भी कांग्रेस के भीतर का संघर्ष खुलकर सामने आया है। मिलिंद देवड़ा और संजय निरूपम के बीच हुई नोंकझोंक ने अखबारों की खूब सुर्खियां बटोरी। रही सही कसर लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस में शामिल होकर मुंबई उत्तर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने वाली उर्मिला मातोंडकर के इस्तीफे ने पूरी कर दी। उन्होंने यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि महाराष्ट्र कांग्रेस में सब ठीक नहीं है। इसी तरह मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर पार्टी छोड़ दी। विलासराव देशमुख की सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे सिंह ने कहा कि वे इस मुद्दे पर कांग्रेस के रुख से आहत हैं। कुल मिलाकर हरियाणा व महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में अंतरकलह से जूझ कांग्रेस की राह बेहद मुश्किल होने वाली है। वैसे महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ 125-125 सीटों का बंटवारा तो हो गया है, लेकिन अगर पार्टी का अंदरूनी हिसाब नहीं बैठता है तो यह चूं चूं के मुरब्बा सरीखा ही साबित होगा।

देवेंद्र फडणवीस: दोबारा दावेदारी : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों की लिस्ट में देवेंद्र फडणवीस ऐसे दूसरे मुख्यमंत्री बन गये हैं जिन्होंने लगभग पिछले 47 वर्षों में अपना कार्यकाल पूरा किया। फडणवीस से पहले वसंतराव नाइक एकमात्र ऐसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे जिन्होंने 1967-72 के दौरान अपना कार्यकाल पूरा किया था। फडणवीस वोट के लिहाज से राज्य के जातीय सामाजिक समीकरण में फिट नहीं बैठते। बावजूद इसके साल 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और देवेंद्र फडणवीस ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 44 साल की उम्र में महाराष्ट्र के दूसरे सबसे युवा मुख्यमंत्री बने फडणवीस महाराष्ट्र विधान सभा में नागपुर दक्षिण पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। 1986 से 1989 के दौरान फडणवीस आरएसएस की एक शाखा से जुड़कर युवाओं को समाज के पुनर्निर्माण के लिए प्रेरित किया। बाद में 1989 में दशक के उत्तरार्ध में एबीवीपी के सक्रिय सदस्य बने। 21 वर्ष की आयु में फरवरी 1992 में फडणवीस सबसे कम उम्र में राम नगर वार्ड से नागपुर नगर निगम के पार्षद निर्वाचित हुए और नागपुर के मेयर भी बने। यह उनका पहला चुनाव था जिसमें उन्हें सफलता भी मिली। 1992 से 1997 तक लगातार दो बार उन्हें इस पद पर रहने का मौका मिला। इसके अलावा उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर अपने दायित्वों का सफलता पूर्वक निर्वहन किया। मुख्यमंत्री के रूप में किसानों की कर्जमाफी व अन्य कार्यों तथा मोदी सरकार की चमकदार उपलब्धियों को आगे रखकर वे दूसरी बार चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। 2014 में दिया गया नारा केंद्र में नरेंद्र व महाराष्ट्र में देवेंद्र अपनी उपयोगिता अभी भी बनाये हुए है। यह भी उनकी एक और सफलता है।


 
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