युगवार्ता

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तरक्की या मौत का सामान

06/07/2019

तरक्की या मौत का सामान


हमने अपने बचपन में देखा है कि बुहारने के बाद घर का कूड़ा कचरा दरवाजे के बाहर फेंक दिया जाता रहा है। अगर आप नगरपालिका वाले या नोटिफाइड एरिया कमेटी में रहते हैं, तो कोई न कोई उसे साफ कर देता है। पर वह कूड़ा-कचरा जाता कहां है, हम नहीं जानते। आमतौर पर वह कूड़ा-कचरा आपके शहर के ही किसी जगह पर फेंक दिया जाता है। यह कूड़ा वे लोग भी ले जाते हैं, जो कूड़ा बटोरकर अपनी दाल-रोटी चलाते हैं। महानगरों में कूड़ा बटोरने के बाद जो कूड़ा-कचरा बचता है, वह किसी नदी-नाले में फेंक दिया जाता है।

यह कूड़ा कहीं पर डाल दिया जाता है। ऐसा ही एक प्रसंग देश की राजधानी दिल्ली का है। दिल्ली में एक इलाका है गाजीपुर, जहां कूड़े का अंबार जमा होते-होते लगभग कुतुब मीनार जितना ऊंचा हो गया है। यहां पर पिछले दिनों हादसा भी हो चुका है। पर कूड़े का पहाड़ जस का तस जमा हुआ है। समय-समय पर एक खबर भी छपती है कि कूड़ा-कचरा से बिजली बनने वाली है, बन सकती है। पर कभी बनी नहीं। स्वच्छता अभियान केवल अभियान बनकर रह गया है। इसे समझने के लिए चमकी बुखार से पीड़ित किसी भी मुजμफपुर के लिए अस्पताल को देख लें। इतनी गंदगी है कि स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जाए। हम यह मान कर चलते हैं कि अस्पताल या उद्योग या कहीं पर कूड़ा-कचरा डाल देना तरक्की की पहचान है। अभी उतर प्रदेश की ‘यूपी सालिड वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी’ ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है कि ‘प्रदूषण या गंदगी’ से निपटारे की सभी जुगाड़ असफल हो चुके हैं।

सीवेज को साफ करने में अनेक राज्यों में सीवेज कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। नोएडा ही नहीं, उससे जुड़े ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और इनसे जुड़े आसपास के गांव तरक्की के साथ मौत का सामान भी फैला रहे हैं। सरकार की तरफ से दिखावे के लिए ही सही देखरेख होती है। देखरेख को माॉनिटरिंग भी कहते हैं। इसकी जब माॉनिटरिंग की गयी, तो पता चला कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में सुस्त ही नहीं पस्त भी है। नोयडा में कूड़ा-कचरा तो ठीक-ठाक ढंग से हुआ है, मगर सिर्फ कालोनियों में या बड़े लोगों के घरों में। मगर देखरेख वालों ने माना क्योंकि यूपी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष जस्टिस डी. पी. सिंह ने माना कि अस्पतालों में वॉयोमेडिकल कचरा अलग कूड़ेदान में रखा तो जा रहा है, पर उसे मिले जुले कुड़े के साथ फेंका जाता है।

परिणाम यह हो रहा है कि 30- 35 प्रतिशत लोगों में कैंसर, दमा और पेट की बीमारियां बढ़ रही हैं।’ ‘मॉनिटरिंग कमेटी’ ने यह भी माना कि नालों में यह सब बहाया जा रहा है। इतना ही नहीं प्रदूषण मापने के औजार भी नहीं है। नोएडा में अनेक जगहों पर जैसे शारदा अस्पताल, होंडा कार, कलर एंड स्टाइलिश, सूचि पेपर मिल, कैलाश अस्पताल, मदरलैंड अस्पताल समेत हल्दीराम से भी नमूना लिये गए। जाहिर है प्रदूषण के इस बढ़ते नमूनों को एक वृक्ष लगाकर नहीं रोका जा सकता। ना ही कोई जांच से रोका जा सकता है। इस प्रदूषण को रोकने के लिए केवल गरीबी भर ही मिटाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कूड़ा-कचरा उठाने वालों का संगठन बनाया जाये। कुछ शहरों की नगर पालिकाएं छोटी-छोटी बाल्टियां नागरिकों को देती हैं, जिसे कूड़ा निस्तारण कम, नहाने में अधिक उपयोग होता है।


 
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