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गांधी-दर्शन का मूल तत्व

30/09/2019

(बापू की 150वीं जन्म जयंती पर विशेष)


डॉ. राकेश राणा

धुनिक विचार का मूल विश्वास बुद्धिवाद में है। जबकि, गांधी-विचार की धुरी सत्य है। उत्तर-आधुनिकतावादी विचारक मिशेल फूको का मानना है कि सत्य मात्र बुद्धि का ही विषय नहीं है। ऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की अनुपस्थिति में सत्य का बौद्धिक अन्वेषण करना एक तरह से स्थापित बौद्धिक-शक्ति के आधिपत्य का स्वीकार्य है। किसी व्यक्ति, स्थान एवं संस्कृति की अपनी मूल्य-मान्यताएं हैं। अपने संदर्भ हैं। ज्ञान की राजनीति इसकी अवहेलना की ओट लेकर अपने हितों और उददेश्यों के इर्द-गिर्द ही विश्व-समाज को गढ़ती, परिभाषित करती रही है। यही दुनिया में सांस्कृतिक-उपनिवेश बनाने की शैली है।

आधुनिकता ने जिस तात्विक समानता के सिद्धान्त को खड़ा किया, वास्तव में वह अभिजात्य वर्ग के हितों को सुरक्षित और संरक्षित करने में बड़ा काम आया है। समाज में असली चीज शक्ति ही है। जिसके पास शक्ति के स्रोत हैं, वही निर्णायक भूमिका में है। ये शक्ति स्रोत ही समाज के रूवरूप का निर्धारण करते हैं। समाज का स्वरुप ही व्यक्ति की पहचान और उन सांस्कृतिक तत्वों को प्रश्रय देता है जो समाज की भावी दिशा तय करते हैं। गांधी दुनिया को बहुत पहले से यह कहते और समझाते रहे थे कि मानवीय विकास ही किसी सभ्यता का अंतिम लक्ष्य हो।

गांधी-विचार आधुनिकता का खंडन सामाजिक पुनर्निर्माण के अहिंसक आग्रह के साथ करता है। गांधी प्रेम, विश्वास, दया, करूणा और श्रद्धा सरीखे मनोभावों को ही व्यक्ति की पहचान और व्यक्तित्व का आधार मानते हैं। उनका मानना है कि मन और मस्तिष्क, नैतिकता और बौद्धिकता में कोई स्पष्ट पारदर्शी विभाजन संभव नहीं है। बुद्धि तार्किक विचारों के माध्यम से असत्य को भी प्रमाणित कर सकती है, परन्तु सत्य को प्रतिष्ठित करने हेतु अतार्किक आत्मीय मनोभावों की ही आवश्यकता होती है। गांधी-विचार वैश्विक संस्कृति के उस अतिक्रमण को गलत मानता है जो मानसिक गुलामी के साथ वैयक्तिक सृजन क्षमताओं को कुंद करता है।

स्थानीयता का अपना महत्व है। प्रत्येक जाति, धर्म, सम्प्रदाय, समुदाय और वर्ग की अपनी संस्कृति एवं सभ्यता है। इसी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में किसी व्यक्ति, समूह, समुदाय और राष्ट्र की पहचान बनती है। परन्तु, यह पहचान पूर्ण सत्य का एक अंश मात्र ही है। इस आंशिक सत्य को असत्य कहना भी गलत होगा और निरपेक्ष सत्य मान लेना भी अनुचित। गांधी-दर्शन में व्यक्ति की महत्ता है और व्यक्तिवाद का नकार। गांधी के लिए मानव के व्यक्तित्व के अस्तित्व का औचित्य समाज की परिधि में है। सामूहिकता के सृजन और संवरण की संस्कृति में है।

 गांधी-दर्शन किसी भी सार्वभौमिक सत्य को तीन कसौटियों पर कसता है। पहला तात्विक, दूसरा धार्मिक और तीसरा नैतिक। तात्विक स्वरूप सत्य के दर्शन से सम्बन्धित है। जिसकी प्रबल स्थापना यही है कि सत्य ही असली सत्ता है। उसका अस्तित्व ही वास्तविक है। शेष सब मिथ्या है। गांधी-विचार सत्यान्वेषण के लिए आत्म-विश्लेषण एवं आत्मशुद्धि पर बल देता है। गांधी की आदर्श विश्व समाज-व्यवस्था की अर्थनीति की अवधारणा विकेन्द्रीकरण के तीव्र आग्रहों पर टिकी हुई है। जिसमें सभी के लिए स्थान है, समान समाजार्थिक स्तर की पर्याप्त संभावनाएं हैं। आधुनिक औद्योगिक समाज को मानवीय मूल्यों से आप्लावित रखना ही गांधी-दर्शन का सर्वोच्च आर्थिक उद्देश्य रहा है।

गांधी-विचार धर्म को केन्द्रीय स्थान देता है। गांधी के लिए धर्म एक ऊर्जा स्त्रोत है, जो मनुष्य की प्रकृति को ही बदल दे। जो अन्ततः मनुष्य को सत्य से बांध दे और निरन्तर उसे स्वयं के और समाज के शुद्धिकरण की सेवा में तत्पर रखे। गांधी-दर्शन में धर्म जीवन की एक ऐसी रचनात्मक शक्ति है जो समाज के पुनर्निर्माण और परिष्कार में मददगार है।

गांधी-विचार का तीसरा केन्द्रीय तत्व नैतिकता है। गांधी-दर्शन नैतिक तत्व को ही एक स्वस्थ समाज का आधार मानता है। गांधी राजनीति में भी नैतिक सिद्धांतों को जरूरी मानते हैं। गांधी की राजनीति का स्वरूप व्यक्ति के नैतिक विकास में सहायक है। उनके अनुसार राज्य की बढ़ती शक्ति व्यक्ति के उत्थान में बड़ी बाधा है। उसके नैतिक विकास में बाधक है। गांधी-दर्शन राज्य के निम्नतम हस्तक्षेप वाले समाज में ही आदर्श समाज की स्थापना की दिशा में नैतिक अभ्यासों के साथ सशक्त समाज की संभावनाएं देखता है।

गांधी के विचार में सत्य मनुष्य का ध्येय है। उसे प्राप्त करने का एकमात्र तरीका अहिंसा है और अहिंसा पर चलने की ऊर्जा का स्रोत धर्म के सिवा कोई नहीं है। धर्म नैतिक नियमों की एक आदर्श व्यवस्था है। जो मानवीय लक्ष्यों को पाने की पूर्व-आवश्यकता है। गांधी की सत्य, अहिंसा और धर्म जैसे महान मानवीय मूल्यों में गहरी आस्था है।

वैचारिक आग्रहों-दुराग्रहों को लेकर गांधी-विचार की प्रबल मान्यता यह है कि किसी नई विचारधारा का प्रादुर्भाव अपने से पूर्ववर्ती विचारधारा का विरोध नहीं है। वरन पूर्व वैचारिक व्यवस्थाओं को और व्यवस्थित करने के आग्रह ही उसके मूल में होते हैं। इसीलिए गांधी-दर्शन असहमति तक ही नकार की नीति को महत्व देता है। गांधी चिन्तन मानव-मानव की एकता को सार्वभौमिक एकता मानता है। यही वैश्विक मानव संस्कृति की सार्वभौमिकता एक आदर्श सत्य है।

मौजूदा समाज व्यवस्था में गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, असमानता, अन्याय, भेदभाव और शोषण सब सामाजिक प्रगति के गहरे अवरोध हैं। इस दृष्टि से समाज के सामाजिक-आर्थिक विकास में गांधी का विचार आज पहले से भी कहीं ज्यादा अपनी उपादेयता रखता है। गांधी-दर्शन अपनी प्रासंगिकता के साथ आज भी समाज सुधारकों, समाजसेवियों और सामाजिक चिंतकों को किसी न किसी रुप में अपने इर्द-गिर्द खड़ा रखने को प्रेरित रखने की क्षमता रखता है। यही गांधी-विचार की असली प्रभावशीलता है। समकालीन समाज में बढ़ती असमानता, गरीबी, बेकारी, पर्यावरणीय समस्याएं और मौजूदा विकास के संकटों के समाधान की दिशा में गांधी-दर्शन एक सशक्त हस्तक्षेप की क्षमता रखता है। यदि समाज गांधी-विचार की प्रासंगिकता से साक्षात होना चाहता है तो उसे बौद्धिक बहसों से बाहर आकर गांधी-दर्शन के वास्तविक दर्शन करने होंगे, विचारों को व्यावहारिक धरातल पर उतारना होगा। वर्तमान गंभीर संकटों को देखते हुए नये विकल्प के सूत्र खोजने होंगे। गांधी की समाज नीति के केन्द्र में व्यक्ति है। उनकी अर्थनीति ‘नीति’ द्वारा ही अभिप्रेरित हैं। गांधी दृष्टि में राजनीति को नैतिकता के आधार पर करना ही एक सभ्य, समृद्ध और समरस न्यायपूर्ण समाज की दिशा में बढ़ा सकता है। जिसकी आज महती आवश्यकता है। यही गांधी-दर्शन का मूल तत्व है और भाव भी।


(लेखक समाजशास्त्री हैं।)


 
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