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महर्षि अरविंद की शिक्षा दृष्टि

30/05/2019

राकेश राणा
श्रीअरविन्द आधुनिक भारत में एक ऐसे शिक्षाविद हुए जिनके व्यक्तित्व में योगी, कवि और दार्शनिक, तीनों का संतुलित समन्वय दिखता है। महर्षि अरविन्द की चिन्तन दृष्टि में शिक्षा केन्द्रीय महत्व रखती है। उनकी दृढ़ मान्यता है कि मानव सांसारिक जीवन जीते हुए भी दैवीय क्षमता प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए अन्य मानव बन्धुओं की सेवा करते हुए अपने मानस को अतिमानस तथा स्वयं को अतिमानव में परिवर्तित कर सकता है। श्री अरविन्द के दर्शन का लक्ष्य उद्दात सत्य का ज्ञान है, जो समग्र जीवन दृष्टि से ही प्राप्त होता है। इस समग्रता का सानिध्य मानव ब्रह्म में लीन होकर ही प्राप्त कर पाता है। समग्र जीवन दृष्टि की राह के लिए श्री अरविन्द ने योग को माध्यम माना। योग से मानसिक शांति एवं संतोष प्राप्त होता है। योग का अर्थ जीवन को त्यागना नहीं है। श्री अरविन्द के अनुसार योग का अर्थ दिव्य शक्ति पर विश्वास रखते हुए जीवन संघर्षों से समायोजन कर आगे बढ़ते जाना है। इस दिशा में शिक्षा मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। अतिमानस की स्थिति तक शनैः-शनैः शिक्षा मनुष्य को पहुंचाती है। महर्षि अरविन्द की चिंतन पद्धति में भारतीय प्रतिभा के तीन गुण हैं। पहला आत्मज्ञान, दूसरा सर्जनात्मकता और तीसरा बुद्धिमता। ये तीनों मिलकर आध्यात्मिक आभा से मानव को सुसज्जित करते हैं। श्री अरविन्द ने इन्हीं आध्यात्मिक शक्तियों के विकास करने पर जोर दिया। भारतीय पुनर्जागरण के लिए भी इन्हीं आध्यात्मिक अस्त्रों से भारतीयों को प्रशिक्षित किया। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण कर मानव अतिमानव बन जाता है अर्थात मानव सत, रज व तम की प्रवृत्ति से ऊपर उठ जाता है। अतिमानव की इस स्थिति में मानव सभी प्राणियों में अपना रूप देखता है। श्री अरविन्द ने इन्हीं आध्यात्मिक शक्तियों के विकास के बल पर भारतीय पुनर्जागरण करना चाहा। शिक्षा को पुनर्जागरण का जरिया बनाया। उनकी यह दृढ़ मान्यता थी कि पुनर्जागरण को इन्हीं तीन दिशाओं की ओर उन्मुख होना है। तभी भारत सच्ची स्वतंत्रता की ओर बढ़ेगा।
जब हम भारतीय चिंतन दृष्टि से ओतप्रोत आधुनिक चिंतकों पर दृष्टि डालते हैं तो महर्षि अरविन्द उन सब में अग्रणी दिखते हैं जो शिक्षा को समाज और राष्ट्र के लिए केन्द्रीय महत्व का मुददा मानते हैं। जब हम महर्षि अरविन्द की शिक्षा दृष्टि को गहराई से समझने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि उनकी चिंतन दृष्टि भारतीय चिंतन परम्परा का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है। वह शिक्षा को भारतीयों में भारतीयता भरने का संसाधन बनाना चाहते हैं। इसलिए शिक्षा में उन भारतीय मूल्यों का समावेशन चाहते हैं जो भारत राष्ट्र की विशेषताओं और क्षमताओं को न सिर्फ अक्षुण्य बनाये रखे, बल्कि निरन्तर उनका संरक्षण और संवर्द्धन करे। महर्षि अरविन्द का शिक्षा-दर्शन लक्ष्य की दृष्टि से आदर्शवादी है। उपागम की दृष्टि से पूरी तरह यथार्थवादी है क्रिया की दृष्टि से प्रयोजनवादी तथा महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से मानवतावादी है। श्री अरविन्द की यह शिक्षा दृष्टि एक देशज किस्म का शिक्षा दर्शन देने में सक्षम है।
 श्री अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। राष्ट्रीय आन्दोलन में लगे हुए विद्यार्थियों को शैक्षिक सुविधाएं प्रदान करने हेतु कलकत्ता में एक राष्ट्रीय महाविद्यालय स्थापित किया। श्री अरविन्द को 150 रुपये प्रति माह के वेतन पर इस कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया। इस अवसर का लाभ उठाते हुए श्री अरविन्द ने 'राष्ट्रीय शिक्षा' की संकल्पना का विकास किया तथा एक भारतीय किस्म के शिक्षा-दर्शन की आधारशिला रखने की दिशा में काम किया। श्री अरविन्द की दृष्टि में देश की संकल्पना भी आध्यात्मिक ढंग की थी। उनके लिए भारतवर्ष देश का टुकड़ा, पर्वत, खेत, जंगल, और नदियों का नाम नहीं है। भारत उनकी दृष्टि में मां है। यही विचार श्री अरविन्द के शिक्षा दर्शन का केन्द्रीय तत्व है। वह देश के लिए ऐसी शिक्षा पद्धति चाहते थे जो मानव स्मृति, निर्णयशक्ति एवं सर्जनात्मक क्षमता का निरन्तर विकास करे। यह भी दृढ़ मान्यता थी कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही हो और शिक्षा पद्धति भारतीय परम्पराओं को पुष्ट करने वाली हो। महर्षि अरविन्द मानव की तरह राष्ट्र की भी आत्मा है, इस विचार में दृढ़ विश्वास रखते थे। वे इस चिन्तन इृष्टि के साथ भारतीय जनमानस का विकास चाहते थे और इसी को केन्द्र में रखकर स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति।
श्री अरविन्द का शिक्षा दर्शन प्राचीन आर्य शिक्षा प्रणाली को ध्यान में रखकर आधुनिक भारत में ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहते थे जो बह्मचर्य, आध्यात्मिक एकता, आत्मप्रयास एवं मानवीय मूल्यों को समाज के ढांचे में ढाले। वह एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति का विकास करना चाहते थे जो भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओें के अनुरूप हो। सच्ची राष्ट्रीय शिक्षा का लक्ष्य सत्य और ज्ञान की अवहेलना करना न हो बल्कि हमारी जड़ों को मजबूत करना हो, हमारे विश्वास, मानस और आत्मा को पुष्ट करना हो। श्री अरविन्द संकुचित राष्ट्रीयता में विश्वास नहीं करते थे बल्कि वह पूर्ण रूप से मानवतावादी दृष्टि से आप्लावित राष्ट्रीय शिक्षा को व्यापक रूप प्रदान करके अन्तराष्ट्रीय शिक्षा को सार्वभौमिक मूल्यों से मौलिक दिशा देना चाहते थे। श्री अरविन्द का विचार था कि विश्व के सभी मनुष्य राष्ट्रों में अलग-अलग रहते हुए भी विश्व से अलग नहीं हैं। इसलिए वे राष्ट्रीय शिक्षा को वैश्विक एकता के साथ जोड़कर आध्यात्मिक पुट वाला शिक्षा-दर्शन विकसित करने के हिमायती थे। उनके शिक्षा-दर्शन के केन्द्र में समर्पण भाव है और प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था के महान आदर्श पर आधारित है। जिसमें गुरू-शिष्य परम्परा है। अध्ययन और अध्यापन दोनों ही मौद्रिक क्रियाएं नहीं हो सकती हैं। यह उनका प्राचीन भारतीय आदर्शों के प्रति कोई पुनरुत्थानवादी आग्रह नहीं है। न ही पाश्चात्य संस्कृति से कोई विमोह है। श्री अरविन्द का शिक्षा दर्शन दोनों ही विचार पद्धतियों का समन्वय है। आज हमारी शिक्षा प्रणाली में इसी समन्वयात्मक विचार को अपनाने की आवश्यकता है। जिसे श्री अरविन्द पूर्व की आध्यात्मिकता और पश्चिम की भौतिकता कहते थे। ये दोनों मिलकर विश्व कल्याण की दिशा में काम करे। इसी युक्ति का समन्वय महर्षि भारतीय शिक्षा दर्शन में चाहते थे जो भारत को एक मजबूत और सशक्त राष्ट्र बनाए। 

(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं।)


 
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