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संसद भवन का पुनर्निर्माण ही हो!

28/08/2019

संसद भवन का पुनर्निर्माण ही हो!

 बनवारी

नया संसद भवन भारतीय वास्तु शिल्प के अनुरूप हो, सुंदर हो, देश के लोगों को आत्मीय दिखे और वह शासकों का नहीं जनप्रतिनिधियों का स्थान दिखे, यह सब सुनिश्चित करना होगा। तभी नए निर्माण का कोई औचित्य सिद्ध होगा।

इस बार केंद्रीय सरकार संसद भवन को लेकर अधिक गंभीर दिखाई दे रही है। संसद भवन को बने 92 वर्ष हो चुके हैं। अब तक अनेक बार यह बात सामने आई है कि वह आज की आवश्यकताओं को देखते हुए अपर्याप्त है। उसमें स्थान की कमी है। वह संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को सुविधाजनक स्थान उपलब्ध करवाने की स्थिति में नहीं है। सांसदों को अपने विधायी कार्य के लिए जिस तरह का सहायक स्टाफ और सुविधाएं चाहिए, वे संसद भवन के सीमित स्थान में प्रदान नहीं की जा सकतीं। उसमें कुछ संरचनागत कमियों की तरफ भी ध्यान खींचा जाता रहा है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए जब मीरा कुमार लोकसभा की अध्यक्ष थीं, तो एक समिति बनाई गई थी।
तब से यह विचार होता रहा है कि संसद के वर्तमान भवन का विस्तार करके उसे आज की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए या संसद भवन का पुनर्निर्माण किया जाए। संसद भवन का विस्तार हो या पुनर्निर्माण, इसके बारे में सभी लोगों का अपना-अपना मत है। अब तक की सरकारें इस प्रश्न को हल करने के बजाय टालती ही रहीं। पांच अगस्त को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान खींचते हुए संसद के लिए एक नए भवन के निर्माण का सुझाव दिया। उसके बाद लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इसकी आवश्यकता रेखांकित की।
इस सबके बाद प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि सरकार जल्दी ही यह निर्णय कर लेगी कि संसद भवन का विस्तार किया जाए या पुनर्निर्माण। उन्होंने कहा है कि जो भी निर्णय होगा, उस पर स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरा होने के समारोह से पहले अमल हो जाएगा। 2022 में स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। संसद का वर्तमान भवन बनाए जाने का निर्णय पिछली शताब्दी के आरंभिक दशक में ब्रिटिश सरकार ने किया था। 1912-13 में हाउस आॅफ पार्लियामेंट का नक्शा बनाने का काम एडविन लुटियन और हर्बट बेकर को सौंपा गया था। उन्हें दरअसल ब्रिटिश भारत के प्रशासकीय केंद्र के रूप में एक नई राजधानी बनानी थी। उनके द्वारा बनाए गए नक्शे के आधार पर इस संसद भवन का निर्माण 1921 में आरंभ किया गया था। 1927 में जाकर उसके निर्माण का काम पूरा हो पाया।
उस समय के वाइसराय लॉर्ड इरविन ने 18 जनवरी 1927 को इसका उद्घाटन किया था। 19 जनवरी 1927 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के तीसरे सत्र की बैठक इस भवन में आरंभ हुई थी। उस समय इस भवन का उपयोग चेंबर आॅफ प्रिंसेज, स्टेट काउंसिल और सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली की बैठकों के लिए किया जाता था। आज चेंबर आॅफ प्रिंसेज को पुस्तकालय भवन में परिणत कर दिया गया है। स्टेट काउंसिल के स्थान पर राज्यसभा की बैठकें होती हैं। सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली का स्थान लोकसभा की कार्यवाही के लिए नियत है। ब्रिटिश शासन की आवश्यकताओं को देखते हुए जो व्यवस्थाएं हुईं थी वे आज की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकतीं। लेकिन हम सभी ब्रिटिश परंपराओं को ढोते चले जाने के ऐसे आदी हो गए हैं कि कोई नया निर्णय नहीं कर पाते। अब मोदी सरकार ने यह आशा जगाई है कि जल्द ही कोई उपयुक्त निर्णय हो जाएगा। अब तक संसद भवन की आकृति को लेकर अनेक अनुमान लगाये जाते रहे हैं। उसकी आकृति काफी कुछ चौसठ योगनियों के मंदिर से मिलतीजुलती है।
चौसठ योगनियों के मंदिर में एक केंद्रीय स्थान होता है। उसकी गोलाकार परिधि में चौसठ योगनियों के मंदिर होते हैं। अगर चौसठ योगनियों के मंदिर के स्वरूप का संसद भवन से मिलान किया जाए तो यह सचमुच लगता है कि संसद भवन के आकार की प्रेरणा उन्हीं से ली गई होगी। देश में चौसठ योगनियों के चार मंदिर हैं। उनमें से दो मध्य प्रदेश में हैं और दो ओडिशा में है। मध्य प्रदेश का एक मंदिर ग्वालियर के निकट है और दूसरा जबलपुर के। लेकिन इस बात का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता कि संसद भवन की प्रेरणा चौसठ योगनियों के मंदिर से ली गई होगी। ब्रिटेन में भी गोलाकार परिधि वाला वास्तु शिल्प रहा है। लंदन का पिकाडिली सर्कस एक समय तक ऐसा ही था। दिल्ली में कनॉट प्लेस भी उसी तरह की इमारत है। लेकिन संसद भवन और चौसठ योगनियों के मंदिर में जो साम्य है वह इन अन्य उदाहरणों में दिखाई नहीं पड़ता। संसद भवन के आकार की तुलना अशोक चक्र से भी की जाती रही है। लेकिन एडविन लुटियन और हर्बट बेकर ने संसद भवन की आकृति के लिए मूल प्रेरणा कहां से ली थी, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता।
उनकी प्रेरणा जो भी रही हो, संसद भवन का वास्तु शिल्प भारतीय नहीं है। इसलिए इन तुलनाओं को अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि लुटियन की नई दिल्ली की सभी इमारतें एक औपनिवेशिक सत्ता का भय पैदा करने के लिए बनाई गई थीं। स्वतंत्र भारत से उनकी कोई संगति नहीं बैठती। यह प्रश्न सबसे पहले राजेंद्र बाबू ने उठाया था। वे कांग्रेस महासमिति के आग्रह और सरदार पटेल के सहयोग के कारण जवाहर लाल नेहरू के विरोध के बावजूद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने थे। राजेंद्र बाबू का राजनैतिक संस्कार महात्मा गांधी के राजनीतिक आंदोलन से बना था। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि स्वतंत्र भारत का राष्ट्रपति लोक प्रतिनिधि है। उसे औपनिवेशिक सत्ता द्वारा अपने वायसराय के लिए बनवाए गए विशाल भवन में नहीं रहना चाहिए। उसे एक ऐसे स्थान में रहना चाहिए, जो देश के जनसामान्य के लिए अधिक आत्मीय हो और उसकी पहुंच में हो। लेकिन जवाहर लाल नेहरू इससे सहमत नहीं हुए।
उन्होंने कहा कि राजेंद्र प्रसाद राजकीय आवश्यकताओं से अनभिज्ञ हैं। राज पुरुषों को अपने समकक्ष दूसरे देशों के राज पुरुषों से मिलना-जुलना और संबंध रखना होता है। उन्हें उसके अनुरूप स्थानों में ही रहना चाहिए। जवाहर लाल नेहरू को ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की प्रतिनिधि लुटियन की दिल्ली में ही भव्यता दिखाई देती थी। इसलिए यह सब इमारतें अपनी सब असुविधाओं और अपर्याप्तताओं के बावजूद आज ज्यों की त्यों खड़ी हैं। हम पिछले सात दशक में अपने लोगों की सौंदर्य दृष्टि, स्वभाव और आवश्यकताओं के अनुरूप एक राजधानी तक नहीं बना पाए। यह ध्यान दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे लोकतांत्रिक शासक जिस तरह के दर्पपूर्ण भवनों और तामझाम में रह रहे हैं, उस तरह के तामझाम में सर्वसंपन्न यूरोप या अमेरिका के राज पुरुष भी नहीं रहते। लुटियन की दिल्ली शासन को आम लोगों से दूर रखने के लिए बनी थी।
आज हमारे शासक भी आम लोगों से दूर रहने के लिए ही अपना सारा तामझाम खड़ा करते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद भवन के विस्तार या पुनर्निर्माण के लिए जो समय-सीमा तय की है, उसे देखते हुए यह नहीं लगता कि केंद्र सरकार इस संसद भवन की जगह एक नए संसद भवन के निर्माण का निर्णय ले पाएगी। 15 अगस्त 2022 में अब अधिक समय नहीं बचा है और अगर नए संसद भवन का निर्माण इसी कालावधि के बीच होना है तो उसके स्वरूप के बारे में कोई गंभीर सोच-विचार नहीं हो पाएगा। वह भारतीय वास्तु शिल्प के अनुरूप हो, सुंदर हो, देश के लोगों को आत्मीय दिखे और वह शासकों का नहीं जनप्रतिनिधियों का स्थान दिखे, यह सब सुनिश्चित करना होगा। इस सबके अनुरूप एक नया संसद भवन 15 अगस्त 2022 तक बनना कठिन दिख रहा हो, तो समय-सीमा भूल जानी चाहिए। वह पांच वर्ष बाद भी बनकर तैयार हुआ तो इसमें कोई अनौचित्य नहीं होगा।
वर्तमान संसद भवन के विस्तार से थोड़ी-बहुत पच्चीकारी भले हो जाए, समस्याएं बनी रहेंगी। इस सारी बहस में यह सुझाव भी आया है कि संसद भवन का पुनर्निर्माण हो तो वर्तमान संसद भवन की एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में रक्षा की जानी चाहिए। किसी पुरानी इमारत को ऐतिहासिक इमारत बताकर संरक्षित रखना एक यूरोपीय विचार है। यह आधुनिक काल में इसलिए आया कि महायुद्धों के दौरान पुराना यूरोप ध्वस्त हो गया था। जो नया यूरोप खड़ा हो रहा था, उसका ढांचा परंपरागत ढांचे से बिल्कुल बेमेल था।
पुराने की स्मृति बनी रहे, यह सोचकर ऐतिहासिक धरोहर का विचार सामने आया। हमारे यहां वास्तु में निरंतरता रही है और पुराने की जगह जब नया बनाया गया है, तो यह ध्यान रखा जाता रहा है कि वह परंपरा बाह्य न हो। इसलिए पुरानी इमारतों को संभालने के असाध्य काम से बचना चाहिए। इस संसद भवन की स्मृति एक विस्तृत वृत्तचित्र बनाकर रखी जा सकती है। लेकिन एक ऐसी इमारत के रूप में जिसका उपयोग न हो रहा हो और वह केवल धरोहर मानकर संरक्षित की जाए, उसे बनाए नहीं रखना चाहिए। वह राष्ट्रीय साधनों का अपव्यय होगा।


 
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