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विकास बनाम जलवायु परिवर्तन

27/09/2019

रामकृष्ण जायसवाल

ई पीढ़ी दुनिया के देशों से यही प्रश्न कर रही है कि 'आपने हमारे सपने, हमारा बचपन, अपने खोखले वादों से क्यों छीन लिया? ऐसा करने की आपकी हिम्मत कैसे हुई?' आज समूचा विश्व इस जलवायु संकट को झेल रहा है। मनुष्य तथा जीव-जन्तु मर रहे हैं। पूरा ईको सिस्टम बर्बाद हो रहा है। ऐसे में नई पीढ़ी की नाराजगी गैरवाजिब नहीं है। सच है कि नई पीढ़ी के जीवन को हमने अपनी उपभोक्तावादी नीतियों के कारण संकट में डाल दिया है। युवा जान गया है कि उसे विकास के नाम पर छला जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र ध्वस्त हो चुका है। इसीलिए युवाओं की आंखें विकसित देशों पर टिकी हैं। उनका कहना है कि 'अगर विकसित देशों ने हमें फिर असफल किया तो हम आपको कभी माफ नहीं करेंगे'। उधर, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि 'हम आज सामूहिक विलुप्ति की कगार पर हैं और विकसित देश अपनी पूंजीवादी नीति तथा आर्थिक विकास की काल्पनिक कथाओं के बारे में बातें करते दिख रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के कार्य में उदासीनता दिखा रहे हैं। 
जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती से निपटने के लिए ही पिछले दिनों न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ था। उसमें पूरी दुनिया को एक साथ आने का आह्वान किया गया है। सभी देशों को संदेश दिया गया कि जल्द से जल्द अपने लक्ष्य को प्राप्त कर जलवायु संकट को कम करने का प्रयास करें। कहा गया कि इस गंभीर मुद्दे पर अब बात करने का समय नहीं, काम करने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हमें अपनी जीवनशैली से लेकर विकास की अवधारणा तक को बदलनी होगी। भारत ने गैर-परंपरागत ईंधन (नॉन फॉसिल फ्यूल) से बिजली पैदा करने के लक्ष्य को दोगुना से भी ज्यादा बढ़ाकर 450 गीगावाट करने का संकल्प लिया। भारत गैर परंपरागत ईंधन से 175 गीगावाट बिजली पैदा करने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। भारत ने हमेशा माना है कि प्रकृति का सम्मान और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना हमारी परंपरा और मौजूदा नीति का हिस्सा रहा है। भारत आज अपना गैर-परंपरागत ईंधन का हिस्सा बढ़ा रहा है। पेट्रोल-डीजल में बायोफ्यूल की मिक्सिंग और परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ाने पर जोर दे रहा है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत ने पेरिस समझौते को भी अपनाया है। सम्मिलित प्रयास से पृथ्वी के बढ़ते तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक स्थिर करना है। भारत ने 2030 तक 30 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य बनाया है। इसके लिए पुरजोर कोशिश की जा रही है। 
ताजा रिपोर्ट से पता चला है कि भारत ने इसके प्रभाव को 25 फीसदी कम करने में सफलता प्राप्त की है। नेशनल एक्शन प्लान फॉर क्लाइमेट चेंज के अंतर्गत विभिन्न मंत्रालयों में आठ अलग-अलग मिशन पर काम किया जा रहा है। वर्ष 2030 तक भारत में स्थापित ऊर्जा उत्पादन क्षमता का 40 प्रतिशत हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन से आएगा। लॉसेंट काउंट डाउन की 2018 रिपोर्ट के आंकड़े बता रहे हैं कि दुनिया में कार्बन निर्भरता को कम किए बिना जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचा नहीं जा सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार निम्न और मध्यम आय के देशों के 97 प्रतिशत प्रमुख शहरों में साफ हवा की गुणवत्ता बनाए रखने की दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। शोध में ये भी पता चला है कि पूरी दुनिया में हर साल करीब 30 लाख लोग असामयिक काल के गाल में समा जाते हैं। हाल ही के एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हमारे महासागर 5 वर्ष पूर्व के अनुमान के विपरीत 40 प्रतिशत अधिक तेजी से ग्लोबल वार्मिंग की तरफ बढ़ रहे हैं। वर्ष 2018 को चौथे सबसे गर्म वर्ष के रूप में रिकॉर्ड किया गया है। वर्ष 1990 से 2016 के बीच भारत की एक तिहाई तटीय रेखा भूस्खलन का शिकार हो गई है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अध्ययन के अनुसार ऊर्जा उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता को घटाने के लिए गैर जीवाश्म ईंधन को बढ़ावा देना अत्यावश्यक हो गया है। आईईईएफए का अनुमान है कि भारत एक दशक पहले ही 40 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य प्राप्त कर लेगा। मार्च 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में थर्मल पावर क्षमता 226 गीगावाट होगी जो देश की कुल 360 गीगावाट क्षमता का 63 प्रतिशत होगी। आईईईएफए का मानना है कि 2019 के अंत तक भारत गैर-जीवाश्म ईंधन के क्षेत्र में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोत्तरी का 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना कोई बड़ी बात नहीं रह जाएगी। अध्ययन से यह भी साफ हुआ है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग न हो रही होती तो देश इस समय 30 फीसदी अधिक अमीर होता। लेकिन प्रश्न यह है कि यहां तापमान की बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने में विकसित देश  उदासीन क्यों हैं? क्या प्रकृति और पर्यावरण को दरकिनार कर विकास संभव हो सकेगा? ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन की उपलब्धता अनिवार्य है। इसके लिए विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को दी जाने वाली हरित कोष की सहायता राशि में बढ़ोतरी करनी चाहिए। लेकिन यहां पर भी विकासशील देशों को निराशा ही हाथ लगी है। हरित कोष की न्यायोचित राशि प्रदान करने से गरीब और विकासशील देश अपने लक्ष्य को समय रहते हासिल कर सकेंगे। अतः हरित कोष में विकसित देशों की सहायता की विशेष दरकार है। वर्ष 1992 में ब्राजील के शहर रियो-डी -जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन में 172 राष्ट्रों ने एक मंच पर आकर तापमान वृद्धि और जैव विविधता के संरक्षण पर प्रतिबद्धता दिखाई थी। लेकिन वैश्विक स्तर पर विकसित देश अपनी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ दिखाई दे रहे हैं।
आज दुनिया में कार्बन निर्भरता को कम करने की दरकार है। कोयले के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से खत्म करना ही होगा, क्योंकि कोयले के उपयोग के कारण पैदा होने वाले बेहद महीन कणों की वजह से हुए प्रदूषण से दुनियाभर में करीब 16 प्रतिशत लोगों की मौत हो चुकी है। सवाल यह कि जीवन जरूरी है अथवा विकास? निश्चित रूप से जीवन, लेकिन इसके लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है। इस अहम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के बीच एक मंच तैयार किया जाना चाहिए जिसमें नीति निर्माण हो तथा मूल्यांकन के साथ निर्णय लेने की भागीदारी होनी चाहिए। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के चलते तबाही मचाने वाली आपदाएं लगातार आ रही हैं। जलवायु परिवर्तन हमारे समय की प्रतीक्षा नहीं कर रहा है। अगर हमने उसके साथ कदम नहीं मिलाया तो इसका दुष्प्रभाव जनमानस पर अवश्य पड़ेगा।
(लेखक अध्यापक हैं।)


 
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