युगवार्ता

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क्रोध प्रबंधन की अहमियत

28/10/2019

क्रोध प्रबंधन की अहमियत

मिलन सिन्हा

गुस्सा स्वयं के साथसाथ रिश्तों और दिनचर्या के लिए भी नुकसानदायक होता है। इसलिए आसन प्राणायाम-ध्यान के नियमित अभ्यास से इस पर काबू कर जीवन को सहज बनाया जा सकता है।

हम सबको किसी-न-किसी बात पर कभी- न-कभी गुस्सा आता है, बेशक कम या ज्यादा। विद्यार्थियों में यह कुछ ज्यादा ही देखा जाता है। उम्र के इस पड़ाव में ऐसा होना असामान्य नहीं कहा जा सकता है। लिहाजा अपने रोजमर्रा की जिंदगी में हम सभी यहां-वहां विद्यार्थियों को बात-बेबात गुस्सा करते देखते हैं। गुस्सा कुछ ज्यादा हो तो अपशब्द कहते, वस्तुओं को तोड़ते-फोड़ते तथा खुद को नुकशान पहुंचाते हुए भी देखते हैं। गुस्से में बेकाबू विद्यार्थियों के विषय में ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। क्रोध के बारे में महात्मा बुद्ध का कहना है, ‘क्रोध को पकड़े या थामे रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के बराबर है।
इससे आप स्वयं जलते हैं।’ इसी बात को विश्व प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन इन शब्दों में कहते हैं, ‘क्रोध एक तेजाब की तरह है जो उस वर्तन को ज्यादा नुकसान पहुंचता है जिसमें उसे रखा जाता है, बजाए उसके जिस पर उसे डाला जाना है।’ क्रोधित होने का साफ मतलब है उत्तेजित और असंतुलित होना। अंदर जैसे कुछ भावनात्मक उबाल आ गया हो। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि गुस्से के वक्त हमारा मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह पाता है, फलत: चीखने-चिल्लाने के साथ हम अतार्किक एवं हिंसक भी हो जाते हैं।
मुंह ज्यादा काम करता है और आंख-कान बहुत कम। यहां विद्यार्थियों के लिए जानने-समझने योग्य बात यह भी है कि गुस्से की स्थिति में शरीर के एड्रिनल ग्रंथि से एड्रेनालाईन और कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन्स का स्राव शुरू हो जाता है। जिसकी अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अनियंत्रित क्रोध के कारण सिरदर्द, अपच, अनिद्रा, चिंता, तनाव, अवसाद, उच्च रक्तचाप, ब्रेन स्ट्रोक, ह्रदय रोग जैसे अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक समस्याएं होती हैं। तभी तो विख्यात दार्शनिक अल्फ्रेड अरमंड मोंटापर्ट कहते हैं कि हर बार जब आप क्रोधित होते हैं, तब आप अपने ही सिस्टम में जहर घोलते हैं। बहरहाल, मूल सवाल है कि गुस्सा आता क्यों है और जब चाहे-अनचाहे आ ही जाता है तो फिर गुस्से को काबू में कैसे रखा जाए जिससे कोई बड़ी दुर्घटना या अनहोनी न हो जाय? कहते हैं कि गुस्सा स्वभावत: अन्याय, अत्याचार, शोषण, असफलता, अतृप्त इच्छा, अक्षमता, अहंकार आदि से जुड़ा है और अधिकांश मामले में किसी न किसी रूप में प्रकट होता है। क्रोध जनित उत्तेजना में शारीरिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं।
देखा गया है कि आवेगवश छात्र-छात्राएं अमर्यादित, अवांछित तथा गैरकानूनी काम कर बैठते हैं। क्रोध आने पर उसे कैसे नियंत्रित किया जाय, इसके लिए कुछ जाने-पहचाने सिद्धांत और नुस्खें हैं। जिसका लाभ प्रयोग की दृढ़ता और निष्ठा पर निर्भर करता है। मसलन, गुस्से की स्थिति में उस स्थान विशेष से हट जाएं; कहीं खुले स्थान में बैठ जाएं और आंखें बंद कर दीर्घ श्वास लें तथा छोड़ें। धीरे-धीरे एक ग्लास पानी पीएं; एक से दस तक गिनती करें; हल्का एक्सरसाइज करें; पसंदीदा गाना सुनें; स्नान करें, सोने की कोशिश करें या फिर किसी अच्छे मित्र से बात करें। इससे शारीरिक रूप से स्थिर रहना और मानसिक रूप से शांत रहना आसान होगा।
जब बिलकुल स्थिर और शांत हो जाएं तब इस बात की थोड़ी विवेचना कर लें कि आखिर वे कौन-सी बातें या परिस्थिति हैं जब आप सामान्यत: क्रोधित होते हैं और उसका आपके अनुसार कारण क्या होता है। कारण जानेंगे तो समाधान तक पहुंचना आसान हो जाएगा। और फिर आप भविष्य में क्रोधित होने पर भी अपने व्यवहार को नियंत्रित और संतुलित रख पायेंगे। आप कतई क्रोध से बेकाबू नहीं होंगे। तमाम शोध तथा सर्वेक्षण बताते हैं कि इन छोटे प्रयासों से क्रोध को कंट्रोल और मैनेज करना एवं इसके एकाधिक दुष्प्रभावों से बचना संभव है। ऐसे, आसन-प्राणायाम-ध्यान के नियमित अभ्यास से भी गुस्से को काबू में रखना सहज हो जाता है। इससे छात्र-छात्राएं शांति और सकून से अपनी पढ़ाई-लिखाई कर बेहतर रिजल्ट के हकदार बनते हैं। बोनस के रूप में खुद और घर-परिवार के लोग स्वस्थ और सानंद भी रह पाते हैं।


 
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