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किसानों के लिए मुसीबत बने जीएम बीज

06/06/2019

प्रमोद भार्गव 

दुनिया में शायद भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसमें नौकरशाही की लापरवाही और कंपनियों की मनमानी का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। हाल ही में हरियाणा के एक खेत में प्रतिबंधित बीटी बैंगन के 1300 पौधे लगाकर तैयार की गई फसल को नष्ट किया गया है। ये फसल हिसार के किसान जीवन सैनी ने तैयार की थी। उसने जब हिसार की सड़कों के किनारे बैंगन की इस पौध को खरीदा तो उसे पता नहीं था कि यह प्रतिबंधित है। जीवन ने सात रुपए की दर से पौधे खरीदे थे। उसने ही नहीं हिसार के फतेहाबाद डबवाली के अनेक किसानों ने भी ये पौधे खरीदे थे। ढाई एकड़ में लगी जब यह फसल पकने लग गई तब कृषि एवं बागवानी अधिकारियों ने फसल यह कहकर नष्ट करा दी कि यह प्रतिबंधित आनुवंशिक बीज से तैयार की गई है। इसे नष्ट करने की सिफारिश नेशनल ब्यूरो फाॅर प्लांट जैनेटिक रिसोर्स ने की थी। परीक्षण में दावा किया गया कि खेत से लिए नमूनों का आनुवंशिक रूप से संशोधित किया गया। जबकि इन अधिकारियों ने मूल रूप से बैंगन की पौध तैयार कर बेचने वाले कंपनियों पर कोई कार्रवाही नहीं की। उत्पादक किसान और उसके श्रम के साथ किया गया यह एक बड़ा अन्याय है। क्योंकि बाजार पर निर्भर किसान यह नहीं जान सकता कि उसे दी जा रही पौध या बीज आनुवंशिक रूप से परिवर्धित किए गए हैं। 
दरअसल जैव तकनीक बीज के डीएनए यानी जैविक संरचना में बदलाव कर उनमें ऐसी क्षमता भर देता है, जिससे उनपर कीटाणुओं, रोगों और विपरीत पर्यावरण का असर नहीं होता। बीटी की खेती और इससे पैदा फसलें मनुष्य और मवोशियों की सेहत के लिए कितनी खतरनाक हैं, इसकी जानकारी निरंतर आ रही है। बावजूद देश में सरकार को धता बताते हुए इनके बीज और पौधे तैयार किए जा रहे हैं। भारत में 2010 में केंद्र सरकार द्वारा केवल बीटी कपास की अनुमति दी गई है। इसके परिणाम भी खतरनाक साबित हुए हैं। एक जांच के मुताबिक जिन भेड़ो और मेमनो को बीटी कपास के बीज खिलाए गए, उनके शरीर पर रोंए कम आए और बालों का पर्याप्त विकास नहीं हुआ। इनके शरीर का भी संपूर्ण विकास नहीं हुआ। जिसका असर ऊन के उत्पादन पर पड़ा।  
बीटी बीजों का सबसे दुखद पहलू है कि ये बीज एकबार चलन में आ जाते हैं तो परंपगत बीजों का वजूद ही समाप्त कर देते हैं। बीटी कपास के बीज पिछले एक ड़ेढ़ दशक से चलन में है। जांचों से तय हुआ है कि कपास की 93 फीसदी परंपरागत खेती को कपास के ये बीटी बीज लील चुके हैं। सात फीसदी कपास की जो परंपरागत खेती बची भी है, तो वह उन दूरदराज के इलाकों में है, जहां बीटी कपास की अभी महामारी पहुंची नहीं है। नए परिक्षणों से यह आशंका बढ़ी है कि मनुष्य पर भी इसके बीजों से बनने वाला खाद्य तेल बुरा असर छोड़ रहा होगा। क्योंकि बतौर प्रयोग बीटी कपास के जो बीज जिन-जिन मवोशियों को चारे के रूप में खिलाए गए हैं, उनकी रक्त धमनियों में श्वेत व लाल काणिकाएं कम हो गई। जो दुधारू पशु इन फसलों को खाते हैं, उनके दूध का सेवन करने वाले मनुष्य का स्वास्थ भी खतरे में है। 
जिस बीटी बैंगन के बतौर प्रयोग उत्पादन की मंजूरी जीईएसी ने दी थी, उसे परिवर्धित कर नए रूप में लाने की शुरूआत कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय धारवाड़ में हुई थी। इसके तहत बीटी बैगन, यानी बोसिलस थुरिनजिनसिस जीन मिला हुआ बैंगन खेतों में बोया गया था। इसके प्रयोग के वक्त जीएम बीज निर्माता कंपनी माहिको ने दावा किया था कि जीएम बैंगन के अंकुरित होने के वक्त इसमें बीटी जीन इंजेक्शन प्रवेश कराएंगे तो बैंगन में जो कीड़ा होगा वह उसी के भीतर मर जाएगा। मसलन, जहर बैंगन के भीतर ही रहेगा और यह आहार बनाए जाने के साथ मनुष्य के पेट में चला जाएगा। बीटी जीन में एक हजार गुना बीटी कोशिकाओं की मात्रा अधिक है, जो मनुष्य या अन्य प्राणियों के शरीर में जाकर आहार तंत्र की प्रकृति को प्रभावित कर देती हैं। इसलिए इसकी मंजूरी से पहले स्वास्थ पर इसके असर का प्रभावी परीक्षण जरूरी था, लेकिन ऐसा  नहीं किया गया। 
राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद के प्रसिद्ध जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने करंट साइंस पत्रिका में लेख लिखकर चेतावनी दी थी कि बीटी बीज की वजह से यहां बैंगन की स्थानीय किस्म ‘मट्टुगुल्ला‘ बुरी तरह प्रभावित होकर लगभग सामप्त हो जाएगी। बैंगन के मट्टुगुल्ला बीज से पैदावार के प्रचलन की शुरूआत पन्द्रहवीं सदी में संत वदीराज के कहने पर मट्टू गांव के लोगों ने की थी। इसका बीज भी उन्हीं संत ने दिया था। कर्नाटक में मट्टू किस्म का उपयोग हर साल किया जाता है। लोक पर्वों पर इसे पूजा जाता है। इसके विशिष्ट स्वाद और पौष्टिक विलक्षण्ता के कारण हरे रंग के इस भटे को शाकाहार में श्रेष्ठ माना जाता है। खाली पेट इसे कच्चा खाने से यकृत और गुर्दे के विकार प्राकृतिक रूप से ठीक होते हैं। 
बीटी बैंगन की ही तरह गोपनीय ढंग से बिहार में बीटी मक्का का प्रयोग शुरू किया गया था। इसकी शुरूआत अमेरिकी बीज कंपनी मोंसेंटो ने की थी। लेकिन कंपनी द्वारा किसानों को दिए भरोसे के अनुरूप जब पैदावार नहीं हुई तो किसानों ने शर्तों के अनुसार मुआवजे की मांग की किंतु कंपनी ने अंगूठा दिखा दिया। जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस चोरी-छिपे किए जा रहे नाजायज प्रयोग का पता चला तो उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय की इस धोखे की कार्यप्रणाली पर सख्त ऐतराज जताया। नतीजतन बिहार में बीटी मक्का के प्रयोग पर रोक लग गई। लेकिन इतने बड़े देश में ये प्रयोग कहीं न कहीं चल ही रहे होंगे।  
यही हालात हरियाणा में देखने में आए हैं किंतु वहां के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर कंपनियों के विरुद्ध सख्ती दिखाने में नाकाम रहे।दरअसल, भारत के कृषि और डेयरी उद्योग को काबू में लेना अमेरिका की प्राथमिकताओं में शामिल है। जिससे यहां के बड़े और बुनियादी जरूरत वाले बाजार पर उसका कब्जा हो जाए। इसलिए जीएम प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां और धन के लालची चंद कृषि वैज्ञानिक भारत समेत दुनिया में बढ़ती आबादी का बहाना बनाकर इस तकनीक के मार्फत खाद्य सुरक्षा की गारंटी का भरोसा जताते हैं। परंतु इस परिप्रेक्ष्य में भारत को सोचने की जरूरत है कि बिना जीएम बीजों का इस्तेमाल किए ही पिछले दो दशक में हमारे खाद्यान्नों के उत्पादन में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है। मध्य प्रदेश में बिना जीएम बीजों के ही अनाज व फल-सब्जियों का उत्पादन बेतहाशा बढ़ा है। इसी वजह से मध्य प्रदेष को पिछले पांच साल से लगातार कृषि कर्मण सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है।  
जाहिर है, हमारे परंपरागत बीज उन्नत किस्म के हैं और वे भरपूर फसल पैदा करने में सक्षम हैं। इसीलिए अब कपास के परंपरागत बीजों से खेती करने के लिए किसानों को कहा जा रहा है। हमें भण्डारण की समुचित व्यवस्था दुरुस्त करने की जरूरत है। ऐसा न होने के कारण हर साल लाखों टन खाद्यान्न खुले में पड़ा रहने की वजह से सड़ जाता है। लिहाजा हमें संदिग्ध जीएम बीजों के प्रयोग से बचने की जरूरत है। इन सब तथ्यों को रेखांकित करते हुए डाॅ स्वामीनाथन ने कहा है कि तकनीक को अपनाने से पहले उसके नफा-नुकसान को ईमानदारी से आंकने की जरूरत है।  
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


 
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