यथावत

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गंगा मंत्री जी इस बार कुछ कर डालिए!

19/06/2019

प्रचंडबहुमत वाली नई सरकार सामने है और जल्दी ही हम उस नए चेहरे से मिलेगें जिसके कंधों पर नमामि गंगे को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी होगी। यहां हम गंगा सफाई की दिशा में उठाए जाने वाले उन दस कदमों की बात कर रहे हैं, जिन्हे सरकार ने या यूं कहिए सरकारी बाबुओं ने कभी समझा ही नहीं। जहां पैसा इनवाल्व नहीं होता वहां बाबुओं का इंटरेस्ट भी नहीं होता। तो फिर किया क्या जाए? पहले कदम के रूप में व्यक्तिगत और इंडस्ट्रीज के नालों को बंद करने का कदम उठाना चाहिए। पूरे गंगा पथ पर इनकी संख्या हजारों में है। दूसरा कदम यह होना चाहिए कि कानपुर टिनरीज को तुरंत वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई जाए। जाजामऊ की तीन सौ से ज्यादा टिनरीज को मौखिक आदेश से बंद कराया गया था। अब ये टिनरीज कोर्ट चली गई है।

सरकार के पास यह अच्छा मौका है कि चमड़ा उद्योगों को दूसरी जगह स्थानांतरित कर दें। तीसरा कदम रिवर पुलिसिंग का है, हर दो किलोमीटर पर एक गंगा चौकी हो, जिसमें रिवर पुलिस की व्यवस्था हो। जिसमें स्थानीय मछुआरों को रोजगार दिया जाए, रिवर पुलिस लोगों को गंगा में कचरा डालने से रोकेगी। अर्थदंड लगाने जैसे अधिकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे। इसलिए रिवर पुलिस जागरूकता फैलाने और स्थानीय प्रशासन के बीच सेतू का काम करने वाला होना चाहिए। यह रिवर पुलिस गंगा भक्त परिषद के तहत काम करेगी, जिसकी मांग प्रो. जीडी अग्रवाल ने की थी।

इंडस्ट्रीज को कहा जाए कि अपना कचरा फैक्ट्री के पीछे नहीं आगे की ओर छोड़ें। बस इस आदेश को सख्ती
से लागू करके देखिए वेस्टेज का ट्रीटमेंट भी हो जाएगा और सही उपयोग भी।

गंगा संरक्षण की दिशा में चौथा उपाय मोटर से चलने वाली छोटी नाव पर रोक के रूप में होना चाहिए। रोजगार के नाम पर लाखों की संख्या में डीजल आधारित मोटर वोट गंगा में चलती है। अत्यधिक पुरानी होने के कारण इनसे काला धुंआ और तेल की परत निकलती है। जिसमें मछलियां और उनके अंडे जीवित नहीं रह पाते। इन नावों में डीजल की जगह केरोसिन का उपयोग होता है। पांचवा कदम, गंगा पथ पर बसे घरों की समस्या यह है कि वे पूजा के फूलों व पूजन सामग्री का क्या करें। उपाय यह है कि हर रोज नगर निगम इस पूजन सामग्री को लोगों के घरों से इक्ट्ठा करे। पूजन सामग्री का उपयोग खाद बनाने में हो सकता है। छठवां कदम है मूर्ति विसर्जन पर तत्काल प्रभाव से रोक। यह समझने की जरूरत है कि पीओपी से बनी एक मूर्ति किसी जानवर की लाश से ज्यादा प्रदूषण फैलाती है। सातवें कदम पर मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अपनी पूर्ण क्षमता से काम करें। वाराणसी में हर रोज पैदा होने वाले 40 करोड़ लीटर एमएलडी सीवेज में से मात्र 150 एमएलडी साफ हो पाता है। बाकी सारा गंगा को भेंट हो जाता है।

प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित दीनापुर प्लांट भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहा। आंठवें कदम के रूप में हरिद्वार और ऋषिकेश के आश्रमों को नोटिस देना चाहिए कि वे एक समयसीमा के भीतर अपने सीवेज का वैकल्पिक इंतजाम कर लें। बड़ी चालाकी से ये प्रचारित किया जाता रहा है कि गंगा को गंदा बनाने में इनका योगदान ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, लेकिन इनके लाखों-करोड़ों आस्थावान भक्तों पर गंगा निर्मल रखने की आश्रमों की अपील का असर तब पड़ेगा, जब वे लोग खुद इस पर अमल करेंगे। नौवां कदम में देखना होगा कि गंगा पर बने हर बैराज के पहले कई किलोमीटर तक भारी गाद जमा हो गई है। फरक्का बैराज के पहले जमा गाद ने गंगा की सहायक नदियों पर भी भारी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। इनके निराकरण की प्रक्रिया निरंतर जारी रहनी चाहिए। दसवां और अंतिम कदम गंगा में गंदगी डालने को कार्बन क्रेडिट जैसा मामला नहीं बनाना चाहिए। हर हाल में यह पक्का करना चाहिए कि गंदगी ना डाली जाए, जुर्माने वाली व्यवस्था से सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

कई बड़े उधोग जुर्माने को अपनी मलबा निपटान की लागत में जोड़ कर चलते है। अफसोस कि सरकारों को यह प्रयास व्यवहारिक नहीं लगते। उनके लिए करोड़ों की लागत से बनने वाले ट्रीटमेंट प्लांट, स्कीमर, घाट निर्माण, मंदिर निर्माण, बंदरगाह निर्माण ज्यादा माकूल लगते हैं। उम्मीद है नई मूड की सरकार समझेगी कि प्रकृति के घाव कंक्रीट से नहीं भरे जा सकते।


 
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