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हमें नदियों को बचाना है या खुद को?

04/07/2019

हमें नदियों को बचाना है या खुद को?

 युगवार्ता डेस्क

देश में पानी के लिए हाहाकार है। संसद में पानी पर बात हो रही है। पानी की समस्या को लेकर नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट दी है। हालांकि जाने-माने पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पानी पर कही गई उनकी बातें आज भी प्रासंगिक है। बात 2 जून, 2015 की है। अनुपम मिश्र से डॉ. अरुण मिश्र ने गंगा की बात छेड़ी, तो उन्होंने बोलना शुरू किया। उस दिन जो बातचीत हुई उसका संक्षिप्त अंश

मैं गंगा पर बात नहीं करता। करना भी नहीं चाहता। बात करने से बचता हूं। वैसे किसी भी नदियों पर बातचीत करने से पहले हमें नदियों के कैलेंडर, प्रकृति के कैलेंडर के बारे में जानना चाहिए। उनका कैलेंडर करोड़ों साल का है और हमारा कैलेंडर कुछ हजार साल का। हम 12 पन्ने पलटते हैं, साल बदल जाता है। उनका 12 लाख पन्ना पलट लो, साल नहीं बदलता। उस कैलेंडर को हम ध्यान में नहीं रखते लेकिन नदियों की व्याख्या अपने अनुसार करते हैं। अच्छी बात है कि हम सब गंगा को और कुछ और नदियों को बचाने की बात करते हैं।
करनी ही चाहिए। हमने ही गंदा किया है। लेकिन तब यह तय कर लेना चाहिए कि हमें नदियों को बचाना है या खुद को बचाना है? ऐसा नहीं है कि राजनीतिज्ञों की ओर से नदियों पर आज बात हो रही है। लोहियाजी तो बहुत पहले से यह बात कर रहे थे। उनके पहले मालवीयजी कर रहे थे। लेकिन तब और अब बात करने में थोड़ा फर्क है। तब हम नदियों को गंदा करने की उतनी ताकत नहीं रखते थे। अब तो नयी तकनीक, नयी बसावट, नयी आदतें सब हैं हमारे पास। अब भी जब हम नदियों की और उसमें भी विशेषकर गंगा की चिंता कर रहे हैं तो कुछ पुरानी बातों पर ध्यान देना होगा। पानी का जो पुराना इंतजाम था शहरों में, उसे नष्ट कर दिया हमने। अब शहर को दूसरी जगहों से पानी देते हैं। नदियों से लेते हैं। नदियों की बनावट देखिए। वे नीचे रहती हैं।
ऊपर से आनेवाले पानी को नदी लेती थी। नदी से ऊपर पानी पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं था हमारे पास। शहर में रहनेवालों के लिए अपना इंतजाम था। तालाबों का, कुएं का। उस व्यवस्था से भूजल का भी स्तर बना रहता था। जो पानी आता था बरसात का, सब ऊपर ही तालाबों में रह जाता था। थोड़ी-बहुत गंदगी नीचे आती थी तो नदी में उतनी क्षमता होती थी कि वह उसे साफ कर ले। लेकिन हमने पुरानी व्यवस्था को नष्ट कर दिया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली को लीजिए। आज यहां 200-300 किलोमीटर दूरी से पानी लाया जाता है। पहले यमुना से ले लिये, फिर गंगा से लिये। दोनों से काम नहीं चला तो भागीरथी से लिये। लेकिन वह भी कम पड़ रहा है। बात चल रही है कि अब हिमाचल के रेणुका नदी से दिल्ली के लिए पानी लाया जाएगा। दिल्ली की बात है इसलिए राजनीतिक इच्छाशक्ति भी है, तभी तो पानी चुराकर दिल्ली ला रहे हैं। किसी इलाके का हक मारकर ही तो ला रहे हैं। लेकिन इसके बाद क्या? इसके बाद दिल्ली को पानी कहां से? कोई ताकतवर पीएम आये तो भी कुछ सालों बाद कहां से लायेगा पानी दिल्ली के लिए! दिल्ली में आबादी बढ़ती रहे, इसकी जिम्मेवारी नदियों की थोड़ी ना है!
यह बहुत साधारण आंकड़ा है कि 1911 में जब दिल्ली राजधानी बन रही थी, उस समय कोई 800 तालाब दिल्ली में थे। अब दिखावे के लिए दो-तीन हैं। वह तालाब थे, तो उनका मतलब था। खैर! दूसरी बात। नदी के एक दूसरे पक्ष पर बात कीजिए। विशेषकर गंगा की ही बात कीजिए। बढ़ती हुई आबादी को पानी इससे ही चाहिए। शहरों में। उद्योग को भी पानी इससे ही चाहिए, तभी विकास होगा और खेती को तो पानी चाहिए ही। तीनों को पानी नदी से चाहिए, और तीनों नदी को देते क्या हैं? शहर नाला का कचरा देता है, उद्योग अपनी विषैली गंदगी देता है और खेती भी तो अब पुरानीवाली रही नहीं, जहरीली कीटनाशक व उर्वरक की वजह से खेतों से भी जो पानी आता है, वह जहर ही होता है। अब इन तीन बड़ी प्रक्रियाओं से गंदगी और जहर देने के बाद दुनिया की कोई ताकत नहीं, जो साफ-सफाई कर दे। राजनीति दिखाती रहेगी कि उसकी इच्छाशक्ति है लेकिन नदी की शक्ति, राजनीतिक शक्ति से बड़ी होती है। जिस दिन चाहेगी उद्योग-शहर को बर्बाद कर देगी। वह पिछले दिनों बता चुकी है कि यह काम कभी भी कर सकती है।
इतने सालों से गंगा की सफाई कैसे की जा रही है। यंत्र-तंत्र और मंत्र से। सिर्फ सफाई ही नहीं, पूजा भी। लेकिन पूजा किसकी हो रही है, नाले की। अविरल शब्द आया पहले, बाद में निर्मल आया और अब नमामि। शब्द किसी भाषा से आये, यंत्र-तंत्र-मंत्र चाहे जितना लग जाये, गंगा बचने वाली नहीं है इस रास्ते। हां घाट कुछ सुधर जाएंगे, संगमरमर लग जाएगा, खंभे लग जाएंगे, लाउडस्पीकर लग जाएगा, फिल्मी धुनों पर भजन बजेंगे और यह सब कुछ भी कुछ और दिनों तक ही देख सकते हैं। अब अगर कुछ दशकों से सोच-समझकर पैसा खर्च कर रहे हैं और आश्वासन दे रहे हैं कि साफ हो जाएगी गंगा तो इनके लिए कह जा सकता है कि या तो बहुत भोले हैं या फिर बहुत मूर्ख हैं। शर्म आती है, ऐसे शब्दों के प्रयोग में लेकिन टेंडर, टेक्निक, बिजनेस यही सब तो हो रहा है गंगा के नाम पर सिर्फ। आज कुछ न करे कोई, जितने नाले आते हैं, उतने को मिलाकर एक अलग से नदी बना ले और उसे बहा ले गंगा के समानांतर, वह गंगा से बड़ी नदी हो जाएगी। और फिर उसका नाम गंगा-2 रख दें। राजीव गांधी ने अपने जमाने में पैसे खर्च किये। मनमोहन सिंह ने भी खर्च किये। विश्व बैंक का भी पैसा लगा गंगा के नाम पर। सारे पैसे बाजार में गये।

तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ाया जाता रहा है जलचक्र। कैसे तालाबों से पानी नदियों में जाता है, फिर नदी से समुद्र में, फिर समुद्र से वापस हमारे पास आता है। बस इसी व्यवस्था को बनाये रखो ना!
लोग कहेंगे कि मैं तो निराशावादी बातें ही सिर्फ कर रहा हूं। स्थिति ही ऐसी है तो क्या कहा जाए। लेकिन ऐसा नहीं कि सारी संभावनाएं खत्म हो गयी हैं। गंगा तो फिर साफ हो जाएगी। उद्योग, खेत और शहर के लिए पानी का इंतजाम पारंपरिक तरीके से, पहले तालाब से कर दो। इतना इंतजाम कर दो कि उन्हें नदी की ज्यादा जरूरत ही नहीं पड़े। आखिर धरती एक गुल्लक ही तो है, जो ऊपर से गिरनेवाले पानी को जमा करती रही है। लेकिन हमने वह गुल्लक ही खत्म कर दिया है। जो ऊपर से पानी आएगा, वह रुक जाएगा गुल्लक में तो उससे भूजल का स्तर भी ठीक होगा और उसे साफ कर पानी का दूसरा इस्तेमाल भी हो सकता है। रही बात थोड़ी-बहुत गंदगी की तो गंगा में इतनी क्षमता है कि वह खुद को फिर से साफ कर लेगी। इसलिए जरूरत है कि गंदगी फैलाने की योजनाएं पहले बंद हो। एक दूसरा पक्ष भी है। याद रखना चाहिए। इंद्र का एक दूसरा नाम पुरंदर भी है।
पुरों को तोड़नेवाला। पुर यानी बसावट को। एक कथा कृष्ण की भी याद रखनी चाहिए। जब तेज बारिश शुरू हुई तो कृष्ण ने गोवर्धन को उठा लिया। सबको बुलाया, सबने मिलकर गोवर्धन को थाम लिया। पानी के प्रलय से बच गये। लेकिन वही कृष्ण अपने द्वारका को नहीं बचा सके। द्वारका तो डूब गयी। इतने उद्धरण तो भरे पड़े हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि सब नदी को साफ करने की बात करते हैं, जरूरत अपने दिमाग को साफ करने की है। तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ाया जाता रहा है जलचक्र। कैसे तालाबों से पानी नदियों में जाता है, फिर नदी से समुद्र में, फिर समुद्र से वापस हमारे पास आता है। बस इसी व्यवस्था को बनाये रखो ना! लेकिन नहीं, जानकार लोग कहते हैं कि भाई समुद्र में तो पानी बर्बाद हो रहा है। नदियों को जोड़ देंगे। जोड़ाÞे। जोड़ो सभी नदियों को, एक नदी को रोककर देख लो।
नहीं जाने दो समुद्र में। देख लो कि तटीय इलाके में कहीं पीने का पानी मीठा बचता भी है क्या? तीसरी-चौथी कक्षा की बातों को भी समझ नहीं पा रहे। तकनीक पर जोर है। नर्मदा पर बांध बनाकर रोका गया है न, जाकर पता कर लो, भरूच के इलाके में पेयजल खारे हो गये। एक और उदाहरण है। मध्य प्रदेश में नर्मदा और क्षिप्रा नदी में एक नया रिश्ता बनाया गया है। क्षिप्रा ऊपर में है, नर्मदा नीचे। दोनों के बहाव की प्रक्रिया अलग, लेकिन आजकल क्षिप्रा में नर्मदा से रोजाना पानी पहुंचाया जा रहा है। मालूम हुआ है कि 16 लाख रुपये की बिजली रोज लग रही है नर्मदा से क्षिप्रा को जल देने में। क्षिप्रा का पानी कहां गया, कोई बताये? और नर्मदा कब तक पानी देगी, यह भी बताये। कितनी बात की जाए गंगा पर, नदियों पर। नदी में गतिविधियां भी अवैज्ञानिक, अधार्मिक, असांस्कृतिक तरीके से चल रही हैं और उसे बचाने की योजना भी उसी तरह से बन रही है। हमें वापस मुड़कर देखना होगा। तालाब ही बचायेंगे गंगा को, दूसरी नदियों को भी। पटना में 35 इंच तक पानी होता है, क्या हो रहा है उस पानी का। कहीं रखने का इंतजाम है। दिल्ली में 40 इंच तक होता है। कोई इंतजाम है क्या? नहीं है।

तो बस जैसे मुंबई के लोगों को उनके यहां आये बाढ़ के दिन याद हैं। तारीख के साथ। कश्मीर के लोगों को याद है। सूरत के लोगों को याद है। वैसे ही दिल्ली वाले को भी जल्द ही याद होनेवाला है। पटना वाले को भी। चेन्नई, बेंगलूर और दूसरे शहरवाले को भी। तब तक अभी कुछ दिन मौका है, गंगाजी के किनारे और दूसरे नदियों के किनारे नारियल फोड़ते रहिए और आरती करते रहिए।


 
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