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अजमाना होगा रहीम की राह को

06/08/2019

अजमाना होगा रहीम की राह को


देश में परंपरागत तकनीकों के बारे में काफी कुछ जानने को मिलता है। ऐसी ही एक तकनीक है बुरहानपुर में मौजूद कुंडी धारा। पानी की समस्या से जूझने वाले इस शहर को अब्दुर्रहीम खानखाना ने 400 साल पहले जल संरक्षण का ये नायाब तरीका दिया था। आज सिंगापुर के वैज्ञानकों को बुलाकर इसके पुनरुद्धार का काम कराया जा रहा है। सिंगापुर बहुत नया देश है और उसकी सबसे बड़ी चुनौती ही पानी थी। पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं था और वे मलेशिया जैसे देशों से पानी खरीद कर काम चलाता था। आज सिंगापुर पानी के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है। आत्मनिर्भर बनाने के मामले में नेशनल यूनिवर्सिटी आॅफ सिंगापुर के वैज्ञानिकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में 400 साल पहले जल सरंक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कार्य हुआ था। उसे प्रसिद्ध कवि रहीम ने कराया। बादशाह अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को बुरहानपुर का सुबेदार नियुक्त किया था और तभी का किया यह काम आज भी आदर्श बना हुआ है।

हम भाग्यशाली हैं कि हमारे पास पानी है और शायद यही वजह है कि हम उसका बेजां इस्तेमाल करने में भी सबसे आगे हैं। देश के कई हिस्से ऐसे भी हैं, जो बुरी तरह पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। मध्य प्रदेश का बुरहानपुर एक ऐसा ही शहर है। पानी के मामले में बुरहानपुर से भी बुरे हालात सिंगापुर के थे। बुरहानपुर को कभी दक्कन का द्वार कहा जाता था। दिल्ली के सुल्तान (कुंडी धारा के वक्त अकबर सुल्तान थे) इस जगह से दक्कन पर नियंत्रण के लिए यहां अपनी सेनाओं को रखते थे। अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को बुरहानपुर का सुबेदार नियुक्त किया। रहीम ने अपने बेहतरीन दोहों की रचना यहीं की, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है-

रहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती-मानस-चून।

दरअसल सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच बसे इस शहर में पेयजल की भारी किल्लत थी जिसे दूर करने के लिए रहीम ने शहर के आस-पास जल स्रोतों की तलाश शुरू कर दी। सतपुड़ा की तलहटी में रहीम को एक जल स्रोत मिला। मुझे कुंडी धारा जाने का सौभाग्य डॉ. शैलेश खर्कवाल के साथ मिला जो नेशनल यूनिवर्सिटी आॅफ सिंगापुर के प्रसिद्ध जल वैज्ञानिक हैं। उन्हें मध्य प्रदेश के आइएएस अफसर दीपक सिंह ने कुंडी धारा के निरीक्षण और पुनरुत्थान के सुझावों के लिए बुलाया था। डॉ. शैलेश भारत में भी आदर्श ग्राम या स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स में सिंगापुर मॉडल को शामिल करने पर जोर देते हैं, वहीं बुरहानपुर मॉडल को भी जल स्रोत संरक्षण का एक महत्वपूर्ण तकनीक बताते हैं।

सिंगापुर ने किए महत्वपूर्ण काम
सिंगापुर ने जल संरक्षण के कई प्रयोग किए और बीते 15 साल में डॉ. शैलेश इनमें से कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने भारत के लिहाज से जल संरक्षण को काफी जरूरी और बुरहानपुर मॉडल को कारगर बताया। हांलाकि पहाड़ों पर अब जल संरक्षण के लिए उपयुक्त वृक्षों की कमी और वृक्षों की कटाई पर उन्होंने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पेड़ नहीं होंगे तो पानी भी जमीन में नहीं रुक पाएगा। घरों में पानी के दबाव से लेकर वेस्ट वॉटर मैनेजमेंट तक, सिंगापुर ने बहुत काम किया है। स्कूल शिक्षा में ही जल संरक्षण के प्रति जागरूकता को शामिल कर लेना, बचपन से ही पानी के प्रति सम्मान को बढ़ा देता है। भारतीय वैदिक परंपरा में तो जल को देवता ही माना गया है। इस परंपरा को दोबारा समझने की जरूरत है।

दरअसल, बुरहानपुर के जल स्रोत में आसपास की पहाड़ियों से पानी रिस कर पहुंचता था। इन पहाड़ों पर कई ऐसे वृक्ष हैं, जिनकी जड़े पानी को सोखती है और फिर धीरे-धीरे रिसाव होते हुए ये पानी तलहटी में बने स्रोत तक पहुंचता है। रहीम ने इस जल को नगर तक पहुंचाने के लिए अभियांत्रिकी में कुशल अपने कारीगरों के जरिए सन 1612 ईं. में जमीन से 80 फीट नीचे घुमावदार सुरंग बनवाया। दो साल तक अनवरत चले खनन कार्य और पत्थरों से चिनाई के बाद तीन किलोमीटर लंबी सुरंग के जरिए शुद्ध पेयजल को पूरे शहर में पहुंचाया गया। आज भी यह स्रोत काफी हद तक बुरहानपुर की प्यास बुझाता है। आज जब दूसरे देशों के वैज्ञानिक बुरहानपुर आकर यहां के जल स्रोत का अवलोकन कर रहे हों, हमें इसके महत्व को समझाना होगा। बिना किसी प्राकृतिक स्रोत के यदि सिंगापुर जल सरंक्षण के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है तो हम क्यूं नहीं।


 
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