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कांग्रेस: वजूद बचाने की चुनौती

17/02/2020

कांग्रेस: वजूद बचाने की चुनौती

प्रेमांशु शेखर

कांग्रेस दिल्ली में अपनी वापसी के लिए हर हथकंडा अपनाने को तैयार है। लेकिन उसके लिए चुनौतियां कम नहीं हैं।

दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव में कांग्रेस के सामने अपने वजूद को बचाने की चुनौती है। वर्ष 2015 में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला था। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अगुवाई में लगातार 15 वर्ष तक सत्तासीन कांग्रेस आम आदमी पार्टी की सुनामी में उड़ गई थी। यह उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। इस बार दिल्ली चुनाव की कमान भाजपा से कांग्रेस में आए पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद और सुभाष चोपड़ा के हाथों में है। कांग्रेस चुनाव पूर्व और बाद भी आम आदमी पार्टी से किसी तरह के समझौते को साफ नकार रही है। यदि चुनावी नतीजा त्रिशंकु रहा तो फिर क्या?

गुटबाजी से जूझ रही है कांग्रेस
कांग्रेस हाईकमान की पसंद कीर्ति आजाद को हालांकि प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना था। लेकिन स्थानीय नेताओं के विरोध के कारण कीर्ति आजाद को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और सुभाष चोपड़ा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। हाल में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिस तरह भूपेंद्र सिंह हुड्डा और शैलजा की जोड़ी को चुनाव की कमान सौंपी थी, दिल्ली में वही फामूर्ला अपनाया गया। हरियाणा में चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हुड्डा सर्वेसर्वा थे, लेकिन दिल्ली में पिछले ढाई महीने से कीर्ति आजाद की लगातार अनदेखी से कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर असर पड़ना तय है। यह अलग बात है कि चुनाव की घोषणा के बाद सोनिया गांधी खुद लगातार बैठक कर गुटबाजी पर लगाम लगाने की कोशिश में जुटी है।

झारखंड के बाद हौसले हैं बुलंद
हरियाणा में भाजपा को सत्ता से लगभग बाहर कर चुकी कांग्रेस को महाराष्ट्र में शिवसेना को भाजपा से तोड़ने के बाद संजीवनी मिली। झारखंड में झामुमो और राजद के साथ सत्ता संभालने के बाद तो उसके हौसले बुलंद हैं। यही कारण है कि सुभाष चोपड़ा यह दावा करने से नहीं चूक रहे कि दिल्ली में कांग्रेस का प्रदर्शन हरियाणा से बेहतर होगा। कांग्रेस यह बात समझ चुकी है कि दिल्ली में पूर्वांचली वोट अब निर्णायक भूमिका में हैं। इसी कारण से पार्टी कीर्ति आजाद के चेहरे को आगे लेकर आई है। लेकिन 1993-98 तक दिल्ली में भाजपा के विधायक रह चुके कीर्ति आजाद पार्टी की अपेक्षाओं पर कितना खड़ा उतरते हैं, यह चुनाव नतीजा बताएगा।

जनाधार बढ़ाने की जुगत
कांग्रेस की कोशिश अल्पसंख्यक और दलित वोट को फिर से जोड़ने की है। इसलिए कांग्रेस ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर आक्रमक रुख अपनाया। जामिया-जेएनयू के साथ मुस्लिम बहुल इलाकों में जिस तरह से लोग सड़कों पर उतरे, उससे भी कांग्रेस उत्साहित है। अजय माकन की अगुवाई में कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र अभी सामने नहीं आया है। लेकिन 600 यूनिट तक मुμत बिजली। सभी प्रकार के पेंशन 5000 रुपए करने की बात कही जाने लगी है। 2015 के विधानसभा चुनाव में 9.7 वोट प्रतिशत के साथ कांग्रेस का खाता नहीं खुला था। लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में वह आम आदमी पार्टी को पछाड़कर भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरी थी। सात में से पांच सीटों पर कांग्रेस न केवल दूसरे नंबर पर रही बल्कि पार्टी का वोट प्रतिशत 9.7 से बढ़कर 22.46 प्रतिशत हो गया।

नए चेहरों पर दांव
लोकसभा चुनाव में अजय माकन, कपिल सिब्बल और संदीप दीक्षित ने चुनाव से किनारा कर लिया था। ऐसे में अरविंदर सिंह लवली और राजेश लिलोठिया जैसे मझोले कद के नेताओं को लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला था। पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस बार कांग्रेस हाईकमान अजय माकन, लवली, लिलोठिया और महाबल मिश्रा जैसे नेताओं को भी चुनाव मैदान में उतार सकती है। लगभग आधी सीटों पर पार्टी नए चेहरों पर दांव लगाएगी। इसमें महिला कांग्रेस, युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के नेता शामिल हो सकते हैं।

कच्ची-पक्की कॉलोनियों की लड़ाई
केंद्र की भाजपा सरकार ने जिस तरह राजधानी की कच्ची कॉलोनियों को पक्की किया है, कांग्रेस के लिए यह भी एक बड़ी चुनौती है। भाजपा का दावा है कि कच्ची कॉलोनी में रहने वाले 40 लाख लोगों को उनके मकान का मालिकाना हक दिलवा दिया है। इस पर मनमोहन सिंह सरकार में शहरी विकास राज्यमंत्री रहे अजय माकन दावा कर रहे हैं कि सबसे पहले वर्ष 2008 में नोटिफिकेशन आया था। इसके बाद 2012 और 15 में संशोधन भी किया गया। भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों जनता को बरगला रही हैं।


 
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