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जलवायु आपातकाल घोषित कर इंग्लैंड ने दिखाई नई राह

04/08/2019

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा 
र्यावरण प्रदूषण को लेकर आज सारी दुनिया चिंतित है। दुनियाभर में बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं। एक जाजम पर बैठकर चिंता तो खूब जताई जाती है पर अपने हितों को देखते हुए एक देश का दूसरे देश पर ही खास कदम नहीं उठाने का आरोप-प्रत्यारोप होता रहता है। ऐसे में इंग्लैंड की सरकार द्वारा अपने देश में जलवायु आपातकाल घोषित करने को शुद्ध हवा के झोंके के रुप में देखा जाना चाहिए। हालांकि इसके लिए इंग्लैंड के नागरिकों को लगातार 11 दिन तक विरोध प्रदर्शन करने पड़े थे। यह भी सही है कि इंग्लैंड में ही जलवायु आपातकाल घोषित होने का श्रेय लेने की होड़ मच चुकी है। इंग्लैंड की लेबर पार्टी का दावा है कि सरकार पर उनके दल द्वारा लगातार दबाव बनाए जाने का ही परिणाम है जलवायु आपातकाल। दावे-प्रतिदावे चाहे कुछ भी हों पर इंग्लैंड की सरकार ने दुनिया के देशों को एक संदेश दे दिया है। यह संदेश आज की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण इतना खतरनाक हो चुका है कि अब अगर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हालात विस्फोटक हो जाएंगे। 
दुनिया के देश बीजिंग की स्थिति देख चुके हैं। हमारे देश में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना व अन्य बड़े शहरों की स्थिति कम चिंतनीय नहीं है। यह स्थिति दुनिया के अधिकांश देशों में आम होती जा रही है। जंगल कटते जा रहे हैं। उनका दायरा कम होता जा रहा है। जीवन शैली में बदलाव के चलते इलेक्ट्रोनिक उत्पादों का उपयोग इस कदर बढ़ गया है कि उनके द्वारा उत्सर्जित कार्बन पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित करने लगा है। पेट्रोकेमिकल उत्पादों का उपयोग इस कदर बढ़ गया है कि पीछे जाना मुश्किल होता जा रहा है। पानी की स्रोत नदियां चिंतनीय स्तर पर प्रदूषित हो गई हैं। गगनचुंबी इमारतें, वातावरण के प्रतिकूल लोहे और कंकरीट के जंजाल तापमान को प्रभावित कर रहे हैं। खेत की मिट्टी रसायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों के प्रभाव से प्रदूषित होने के साथ ही उर्वरा शक्ति खोती जा रही है। उसे खाने का प्रतिकूल असर स्वास्थ्य पर दिखाई देने लगा है। प्रदूषण के कारण जानलेवा बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। प्रकृति से विकृति के दुष्परिणाम दिखने लगे हैं। साधनों की अत्यधिकता और सहज पहुंच का परिणाम है कि शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, स्वास्थ्यवर्द्धक खाद्य सामग्री आज बीते जमाने की बात हो चुकी है। अब तो स्थिति यह होती जा रही है कि हमारे द्वारा उपयोग में ली जाने वाली अधिकांश वस्तुएं सीधे-सीधे पर्यावरण को प्रभावित करने लगी हैं। एक ही घर में एक से अधिक वाहन, यहां तक कि लक्जरियस वाहनों और उत्पादों की होड़ पर्यावरण को प्रभावित कर रही है। प्लास्टिक का दुष्परिणाम दुनिया के सामने आ चुका है। इस पर सख्ती से रोक लगाने की जरूरत  है। 
दरअसल, प्रकृति से खिलवाड़ या यों कहें कि छेड़छाड़ का ही परिणाम है कि मौसम प्रभावित होने लगा है। सर्दी निकलने के बाद सर्दी का असर, आए दिन भंयकर तूफानों से सामना, अतिवृष्टि व अनावृष्टि का प्रकोप, बेमौसम की बाढ़ तो दूसरी ओर सूखा हमारे सामने है। गर्मियों में तापमान में अत्यधिक बढ़ोतरी होने लगी है। मौसम चक्र अपनी निर्धारित अवधि से कम-ज्यादा और देर-सबेर होने लगा है। पिछले दो तीन सालों से आने वाले समुद्री तूफानों और सुनामियों में बढ़ोतरी हुई है। ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। नदियों के उद्गम स्थल मीलों पीछे जा रहे हैं। अधिकांश बड़ी नदियां बरसाती नदियों में बदलती जा रही हैं। इनके पाट छोटे होते जा रहे हैं। प्रदूषण को लेकर सारी दुनिया चिंतित है। उससे निपटने के उपायों पर भी चिंतन-मनन होने लगा है। इलेक्ट्रिक वाहनों पर ध्यान दिया जाने लगा है। लेकिन इसके लिए जो सबसे जरूरी है पर्यावरण संरक्षण का प्रयास करना, पौधे लगाना, उसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इसलिए यह सब नाकाफी ही माना जाएगा। ऐसे में इंग्लैंड सरकार द्वारा जलवायु आपातकाल की घोषणा करना दुनिया देशों के लिए नई राह है।
इंग्लैंड की सरकार ने जलवायु आपातकाल घोषित करने के साथ ही रोडमैप भी तय किया है। कार्बन उत्सर्जन की इस तरह की नीति बनाकर कर क्रियान्वित किया जा रहा है जिससे 2050 तक इसका स्तर शून्य तक आ जाए। 2035 तक इंग्लैंड में सभी कारें बिजली से चलेंगी। इसके लिए वाहनों को चार्ज करने की आधारभूत सुविधा विकसित की जा रही है। खेती और इससे जुड़ी नीतियों में बदलाव लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। वन क्षेत्र को बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। अच्छी बात यह है कि जनसाधारण की भागीदारी भी तय करने की योजना बनाई जा रही है। इसके लिए लोगों को आने-जाने के लिए वाहनों को साझा करने या सार्वजनिक वाहनों के उपयोग पर जोर देना होगा, हरी सब्जियों और खाद्यान्नों की तरफ लौटना होगा। खाने की बर्बादी को शून्य स्तर पर लाना होगा। घरों में एलईडी के उपयोग, पांच सितारा रेटिंग वाले उपकरणों का उपयोग आदि पर खास ध्यान देना होगा। यह उपयोग सीधे-सीधे आम आदमी और उसके व्यवहार से जुड़े हैं। ऐसे में आम आदमी की सहभागिता जरूरी हो जाती है। दुनिया के दूसरे देश भले ही अभी जलवायु आपातकाल की घोषणा न करें पर यह रोडमैप ऐसा है जिसे आसानी से अपनाया जा सकता है। आम नागरिक अपने दैनंदिन के कामों में इन रास्तों को अपनाना शुरु करें तो पर्यावरण को प्रदूषित होने से काफी हद तक बचाया जा सकता है। संतोषजनक बात यह है कि भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। परिणाम आने बाकी हैं। बहरहाल, इंग्लैंड ने दुनिया के देशों को जो राह दिखाई है, उस राह को दुनिया को देशों को अपनाने की पहल देर-सबेर करनी ही होगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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