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क्योंकि गंगा एक राजनीतिक नदी है!

22/10/2019

क्योंकि गंगा एक राजनीतिक नदी है!

अभय मिश्र

मा भारती ने काफी पहले यह घोषणा कर दी थी कि वे इस साल अक्टूबर से गंगा यात्रा करेंगी। लेकिन पार्टी ने अब तक उन्हे अनुमति नहीं दी। संभवत इसी बात से नाराज भारती हिमालय चली गई हैं। वे डेढ़ साल हिमालय में रहेंगी। हिमालय जाना उनकी नाराजगी जाहिर करने का पुराना तरीका है। हालांकि अब देश और दिशा दोनों काफी बदले हुए हैं। उमा भारती ने इससे पहले 2013 में गंगासागर से गंगोत्री तक यात्रा की थी, जिसमें उन्हे जनसमर्थन भी मिला था। इसके बाद हुए ऐतिहासिक चुनाव में बीजेपी को गंगापथ पर अच्छी-खासी सीटें मिली थी। लेकिन अब पार्टी नहीं चाहती कि उमा गंगा यात्रा करें। इस मनाही के तार प्रोफेसर जीडी अग्रवाल से भी जुड़े हैं। गंगा का अलग मंत्रालय बनाने का प्रयोग पूरी तरह फेल हुआ। अब गंगा मंत्रालय खत्म कर उसे जलशक्ति में समाहित कर दिया गया है, ताकि ना तो अलग से गंगा पर बात हो ना ही जीडी अग्रवाल पर। अग्रवाल यानी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के आंदोलन को ना संभाल पाने और अनशन करते हुए उनकी मौत हो जाने को संघ से जुड़े लोग सरकार की बड़ी नाकामी मानते हैं। संघ के वरिष्ठ नेता कृष्णगोपाल ही सरकार और अग्रवाल के बीच बातचीत का जरिया थे।

उमा भारती की पूरी कोशिश है कि गंगा का मुद्दा उबलता रहे। अब वे कह रहीं हैं कि लोहारीनाग पाला को दोबारा शुरू करने की कोशिशों का विरोध किया जाएगा। लोहारीनाग पाला गंगा के मुहाने पर बनने वाली 600 मेगावाट की परियोजना थी। उसे 2010 में जीडी अग्रवाल के एक लंबे अनशन के बाद मनमोहन सिंह सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया था।

वे अंत तक ईमानदार कोशिश करते रहे कि अग्रवाल का जीवन बच जाए। लेकिन अग्रवाल और सरकार के बीच समझौता न हो सका। इस नाकामी का दोषारोपण आज भी जारी है। तमाम उठापटक के बीच एक फोन लीक होने के चलते उमा भारती और तत्कालीन गंगा मंत्री नितिन गडकरी के बीच संदेह पैदा हो गया। दरअसल, हुआ यह था कि उमा से गंगा मंत्रालय छीन कर नितिन गडकरी को सौंप दिया गया था। अग्रवाल ने अपने आमरण अनशन की घोषणा गडकरी के कार्यभार संभालने के बाद ही की थी। अनशन के दौरान उमा भारती हरिद्वार मातृ सदन में पहुंचीं और सानंद की मांगों का समर्थन करते हुए उनकी बात गडकरी से कराई। सानंद खुद तो फोन रखते नहीं थे। इसलिए यह बात भारती ने अपने फोन से कराई । इस बातचीत में गडकरी ने उत्तेजित होकर सानंद से कहा- आपको जो करना है करिए। इसके कुछ ही दिन बाद सानंद चल बसे। बाद में यह बातचीत लीक हो गई जिससे गडकरी को काफी जलालत झेलनी पड़ी। इस ग्यारह अक्टूबर को सानंद की पहली पुण्यतिथि है। सरकार को डर है कि उमा की यात्रा से सानंद का भूत फिर से सामने ना आ जाए। एक सवाल उमा की गंगा यात्रा के तय समय पर भी उठता है।

वे यदि अक्टूबर की चार या पांच तारीख को गंगोत्री से यात्रा शुरू करतीं तो ग्यारह को हरिद्वार के आसपास पहुंचतींऔर माहौल गरमाने की पूरी आशंका होती। भारती की पूरी कोशिश है कि गंगा का मुद्दा उबलता रहे। अब वे कह रहीं हैं कि लोहारीनाग पाला को दोबारा शुरू करने की कोशिशों का विरोध किया जाएगा। लोहारीनाग पाला को भी जान लीजिए- यह गंगा के मुहाने पर बनने वाली 600 मेगावाट की परियोजना थी। जिसे 2010 में जीडी अग्रवाल के एक लंबे अनशन के बाद मनमोहन सिंह सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया था। 2014 में नई सरकार आने के बाद से इसे दोबारा प्रारंभ करने की कोशिशें हो रहीं हैं। पिछले दिनों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद इस पर आगे बढ़ने की उम्मीद बंधी हैं। इससे उत्साहित उत्तराखंड जल विधुत निगम ने केंद्र से परियोजना अपने हाथ लेने की अनुमति मांगी है। पहले यह परियोजना एनटीपीसी द्वारा बनाई जा रही थी। अपने मंत्रित्वकाल में उमा भारती ने लोहारीनाग पाला सहित किसी भी बांध का कोई विरोध नहीं किया।

बल्कि यह कहकर समर्थन किया था कि पहाड़ को रोजगार चाहिए और देश को बिजली, तो बांध बनाने ही होंगे। उमा भारती जब तक गंगा मंत्री रहीं, उन्होने कभी भी गंगा स्वच्छता को लेकर कोई समग्र नीति सामने नहीं रखी। गंगा एक्ट कभी सदन के पटल तक नहीं पहुंचा और ना ही कभी उन उद्योगों पर कोई कार्यवाई हुई, जो नदी में अपना वेस्टेज बहाते हैं। हां, इस पर बातें खूब हुईं। अपने कार्यकाल में तकरीबन 12 बार उमा भारती ने गंगा सफाई की नई तारीख दी, जिस पर कभी अमल नहीं हुआ। वे गंगा मंत्रालय में अपनी नाकामियों का दोष पीएमओ पर यह कहकर मढ़ती रहीं कि उन्हे काम ही नहीं करने दिया गया और उनकी फाइलों को जानबूझकर लटकाया जाता था। बहरहाल, हरिद्वार में उमा पार्टी की अनुमति का इंतजार कर रहीं हैं लेकिन शायद उनकी अपनी पार्टी ने ही अब मन बना लिया है।


 
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