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सुनो जायरा, अभिनय से प्रभावित नहीं होते धर्म-ईमान

04/07/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'
र्म और कर्म एक दूसरे से जुड़े हैं। वे अलग-अलग दिखते जरूर हैं लेकिन हैं नहीं। धर्म निभाना है तो कर्म करना पड़ता है। कर्म करना है तो धर्म का विचार करना पड़ता है। काम ठीक है या नहीं, इसका विचार ही धर्म है। 'दंगल गर्ल' जायरा वसीम ने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने का फैसला कर पूरे देश को अनचाहे वैचारिक और मजहबी दंगल में उलझा दिया है। 18 साल की इस अभिनेत्री का तर्क है कि फिल्म जगत में काम करने से उन्हें शोहरत तो खूब मिली, मगर उन्हें लगता है कि वे अपने ईमान से भटक रही हैं। फिल्में उनके धर्म के मार्ग में बाधक बन रही है। धर्म और ईमान दरअसल व्यक्ति के आंतरिक मामले हैं। धर्म दिखावा नहीं है। वह प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। धर्म को जानने की पहली शर्त है परिपक्वता और सम्यक विचार। 18 साल में परिपक्वता नहीं आती। कुछ लोग तो बुजुर्ग होने के बाद भी परिपक्व नहीं हो पाते। जायरा वसीम को इस तरह की टिप्पणी करने से पहले इस बात का भी विचार करना चाहिए था कि फिल्म जगत ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। उनकी जैसी बहुत सारी युवतियां फिल्म जगत में काम कर रही हैं या काम पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। फिल्म जगत में बहुत सारी मुस्लिम अभिनेत्रियां रही हैं, जिन्होंने अपने नाम बदल लिए। उनके नाम से पता ही नहीं चलता कि वे मुस्लिम रही होंगी। उन्होंने शादी भी हिंदुओं से की। माना शेट्टी बॉलीवुड अभिनेता सुनील शेट्टी की पत्नी हैं। 1991 में दोनों ने शादी की थी। माना शेट्टी पहले माना कादरी हुआ करती थीं। पहली बार फिल्म गंगाजल में आइटम सॉन्ग कर चर्चा में आई संजय दत्त की पत्नी मान्यता दत्त का असली नाम दिलनवाज शेख है। बॉलीवुड की रंगीन दुनिया में आने के पहले उन्होंने अपना नाम दिलनवाज से मान्यता रख लिया था। बालीवुड में वे भले ही बहुत नाम नहीं कमा सकीं लेकिन उनके काम में कभी उनका धर्म, उनका ईमान आड़े नहीं आया। अपने दौर की मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने 38 साल की उम्र में 92 फिल्मों में अभिनय किया। अपने अभिनय की बदौलत वे दर्शकों के दिलों पर राज करती रहीं। मीना कुमारी ने भी बॉलीवुड में आने से पहले अपना नाम बदल लिया था। पहले उनका नाम महजबी बानो हुआ करता था। मशहूर अभिनेत्री तब्बू यानी तबस्सुम फातिमा हाशमी के अभिनय के दुनियाभर में दीवाने हैं। अपने दौर की सबसे खूबसूरत और मशहूर अभिनेत्री मधुबाला मूल रूप से मुस्लिम परिवार से संबंध रखती थीं। आलिया भट्ट महेश भट्ट की बेटी हैं और शिरीन मोहम्मद अली की पोती। फिल्मों में अभिनय के अलावा निर्देशक और राइटर के तौर पर भी अपना दमखम दिखाने वाली फातिमा बेग किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उनकी विरासत को उनकी बेटी जुबेदा ने मूक फिल्म स्टार के अलावा, भारत की पहली टॉकी फिल्म 'आलम आरा' में काम करके आगे बढ़ाया। 12 साल की उम्र में बालीवुड में पैर रखने वाली जुबैदा ने 77-78 साल की उम्र तक फिल्मों में काम किया। उन्हें तो नहीं लगा कि वे अपने ईमान से भटक रही हैं या धर्म उनके काम में रोड़े डाल रहा है। उन्होंने कोहिनूर, कल्याण, खजीना, काला चोर, देवदासी और देश का दुश्मन, बुलबुल-ए-परिस्तान, लैला मजनूं, ननद-भौजाई, वीर अभिमन्यु, मेरी जान, जरीना और देवदास जैसी फिल्मों में जोरदार अभिनय किया। संजय दत्त की मां नरगिस मुस्लिम थीं लेकिन उन्होंने हिंदू सुनील दत्त से शादी की।   
एक्ट्रेस जायरा वसीम  बॉलीवुड में रहें या न रहें, यह उनका नजरिया है, लेकिन फिल्में न करने के उनके तर्क से दिल दुखता है। बॉलीवुड की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। उनके तर्क से उनके साथी भी सहमत नहीं हैं। एकाध ने तो उन्हें ड्रामा गर्ल भी कहा है। उनका मानना है कि यह सब जायरा वसीम का पब्लिसिटी स्टंट है। बकौल जायरा, वे पांच साल से बॉलीवुड में हैं, लेकिन वे इस फील्ड में खुश नहीं थीं और इस प्रोफेशन के चलते कहीं न कहीं अपनी धार्मिक आस्था के साथ सहज नहीं थीं।
 जायरा अकेली ऐसी अभिनेत्री नहीं हैं, जिन्होंने अचानक फिल्म जगत को छोड़ने का फैसला लिया हो। आयशा कपूर ने फिल्म ब्लैक में रानी मुखर्जी के बचपन का किरदार निभाया था और खूब शोहरत पाई थी। उन्होंने सिर्फ दो फिल्मों के बाद ही बॉलीवुड छोड़ दिया था। आयशा टाकिया ने सलमान खान के साथ फिल्म वॉन्टेड में काम किया था। फिल्म डोर में उनके अभिनय को दर्शकों की खूब सराहना मिली थी। लेकिन सपा नेता के बेटे फरहान आजमी से शादी के बाद उन्होंने  एक्टिंग को अलविदा कह दिया था। मयूरी कांगो, ममता कुलकर्णी ने भी फिल्मों से अलग होने का निर्णय लेकर अपने दर्शकों को चौंका दिया था। जायरा को सोचना होगा कि फिल्म में वे अकेली मुस्लिम अभिनेत्री तो हैं नहीं। हम कुरैशी, जरीन खान के अभिनय किसी से छिपे नहीं है। भारत ही नहीं, विदेशों में भी मुस्लिम अभिनेत्रियों के अभिनय के जादू दर्शकों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिर खान, सऊदी अरब की अमीरा अल तवील, फलस्तीन की नसरीन तफेश, कुवैत की हलीमा वोलेंड, दुबई की मून अबुसुलेमान, लेबनान की सिरिन अब्देलनार का नाम और काम भी किसी से छिपा नहीं है। धर्म किसी के भी काम में रोड़ा नहीं बनता। जब तक व्यक्ति स्वविवेक  से निर्णय नहीं लेता। जायरा वसीम ने अपनी टिप्पणी से अपने धर्म के कट्टरपंथ का ही संदेश दिया है। उनके इस बयान को कुछ मुस्लिम मौलाना उचित ठहराते हैं। आचार्य चक्रपाणि तो जायरा के निर्णय को सही ठहराने तक ही नहीं रुकते। वे सभी हिन्दू अभिनेत्रियों से जायरा वसीम से प्रेरणा लेने की अपील करते हैं। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस की नवनिर्वाचित सांसद और अभिनेत्री नुसरत जहां ने सिंदूर लगाकर, मंगलसूत्र पहनकर लोकसभा में शपथ ग्रहण किया था। इसके खिलाफ कुछ मौलानाओं ने उनकी आलोचना भी की थी। यह भी कहा था कि मुस्लिम केवल मुस्लिम के साथ ही शादी कर सकता है। उन्होंने उनके पहनावे पर भी ऐतराज जताया था। इस पर नुसरत जहां ने प्रतिक्रिया दी थी कि किसी को इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए कि वह क्या पहनती हैं, क्योंकि 'धर्म कपड़ों से परे होता है।' अभिनेत्री ने कट्टरपंथी मौलवियों की भी मुखालफत की, जिन्होंने उनके सिंदूर लगाने और मंगलसूत्र पहनने की आलोचना की है। देवबंद के मौलवियों के एक धड़े ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद के खिलाफ कथित तौर पर 'फतवा' भी जारी किया था। शपथ लेने के बाद नुसरत ने 'वंदे मातरम' कहा। शायद इसका ज्यादा मलाल देवबंद के मुस्लिम धर्म गुरुओं को रहा होगा। उनके दावे तो इस बात की पुष्टि भी करते हैं। जामिया शेख उल हिंद के मुफ्ती असद कासमी ने दावा किया, 'मुस्लिमों की शादी मुस्लिमों में ही हो सकती है और वे केवल अल्लाह के सामने झुक सकते हैं। इस्लाम में वंदे मातरम, मंगलसूत्र और सिंदूर के लिए कोई जगह नहीं है और ये चीजें धर्म के खिलाफ हैं।' ऐसे लोगों के लिए अगर यह कहा जाए कि 'चुटकीभर सिंदूर का मतलब तुम क्या जानो फतवा बाबू' तो कदाचित गलत नहीं होगा। इस तरह के चिंतन से सर्व धर्म समभाव और सबका साथ-सबका विकास की सोच कमजोर होती है। धर्म जोड़ता है। तोड़ता बिल्कुल नहीं। लेकिन विडंबना इस बात की है कि हम तोड़क धर्म को ही असली मान बैठे हैं। इस स्थिति से उबरने में ही सबका कल्याण है
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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