राष्ट्रीय

Blog single photo

शबर आदिवासी बच्चों का भविष्य संवार रहे कॉन्स्टेबल अरूप मुखर्जी

18/06/2019

ओम प्रकाश
कोलकाता, 18 जून (हि.स.)। कहते हैं कि जिसने इस धरती पर जन्म लिया और मानवता के लिए कुछ नहीं किया, उसका जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। इसी भावना को लेकर कोलकाता पुलिस के साउथ ट्रैफिक गार्ड में कॉन्स्टेबल के पद पर तैनात अरुप मुखर्जी पुरुलिया जिले में अछूत माने जाने वाले शबर आदिवासी जाति के बच्चों की शिक्षा और नौकरी को लेकर अलख जगाने का काम कर रहे हैं।
यह शबर जाति त्रेता युग की शबरी से जुड़ी हुई है, जिसने भगवान राम को जूठे बेर खिलाए थे। प्रभु राम ने तो उसे अपना लिया, लेकिन यह जाति वर्तमान में भी छुआछूत की शिकार है। गरीबी और अशिक्षा की वजह से इस वर्ग के बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं चोरी आदि जैसी आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल रहते हैं। ब्रिटिश हुकूमत ने शबर समुदाय को 'क्रिमिनल ट्राइब' (अपराधी जनजाति) नाम दिया था।
इससे प्रेरित होकर मूल रूप से पुरुलिया के ही निवासी अरुप ने 10 से 12 वर्ष की आयु में ही इस समुदाय के भविष्य को बदलने की ठान ली। वे आज इसी जाति के नौनिहालों के भविष्य को संवारने में जी जान से जुटे हुए हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत 1999 में कोलकाता पुलिस में भर्ती होने के बाद से कर दी थी, लेकिन 2010 में उन्होंने बच्चों के लिए स्कूल बनाने की शुरुआत की थी।
अरुप ने अथक प्रयास करके इन बच्चों के लिए पूंचा नवोदिता मॉडल स्कूल की स्थापना कर दी है, जिसमें शबर समुदाय के 120 बच्चे पढ़ते हैं। इसमें 60 छात्र और 60 छात्राएं हैं। 'हिन्दुस्थान समाचार' से विशेष बातचीत में अरुप मुखर्जी ने बताया कि 1999 में कॉन्स्टेबल के तौर पर नौकरी लगने के बाद से ही उन्होंने बच्चों को पढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी थी।
उन्होंने डेढ़ लाख रुपये लोन लेकर 2010 में स्कूल बनाने की शुरुआत की। इसके लिए 50 हजार रुपये अपनी मां से कर्ज लिया और बाकी 2.5 लाख अपने पास से मिलाकर उन्होंने स्कूल की नींव रख दी। धीरे-धीरे एक वर्ष के अन्दर स्कूल बनकर तैयार हो गया और बच्चों का भविष्य भी संवरने लगा है। उनके इस कार्य को देखते हुए पुरुलिया जिले के पूंचा गांव के खिरोदासी मुखर्जी ने उन्हें स्कूल बनाने के लिए मुफ्त में अपनी जमीन दे दी थी। वर्ष 2011 में मात्र 20 बच्चों को लेकर उन्होंने पठन-पाठन की शुरुआत की। वर्तमान में यह संख्या 120 पर पहुंच गई है।

परिवार से मिली प्रेरणा:
अरूप ने बताया कि उनके पिता ने उन्हें आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए काम करने की प्रेरणा दी थी। जिले में कहीं भी चोरी, लूट और डकैती आदि होने पर शबर समुदाय के लोगों को पकड़ लिया जाता था। तब वह बच्चे थे। उन्होंने अपने पिता से पूछा था कि इस समुदाय के लोग इस तरह से चोरी डकैती क्यों करते हैं ? तब उनके पिता ने बताया था कि या तो भूख या अशिक्षा की वजह से ही ये लोग चोरी करते हैं।
उनके पिता भी पुलिस में दारोगा थे। इसलिए अरूप के दिमाग में उनकी बातें बहुत अच्छी तरह से बस गई थीं। उनकी दादी रात को चोरी छिपे शबर समुदाय के घर जाती थीं और उन्हें खाने के लिए भोजन देकर आती थी। यह तमाम चीजें उन्हें समुदाय के बच्चों के लिए काम करने को प्रेरित करती रही, जिसे उन्होंने साकार किया है।
मुखर्जी ने कहा कि उनका मानना है कि इस दुनिया में आने वाला हर एक शख्स किसी ना किसी मकसद से भेजा गया है। मुझे इस धरती पर इस समुदाय के बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए ही भेजा गया है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष पहली बार ऐसा हुआ है कि समुदाय की एक लड़की मैट्रिक की परीक्षा पास करने में सफल हुई है। स्कूल के बारे में मुखर्जी ने बताया कि कुछ लोग महीने में कुछ हजार रुपये की मदद‌ जरूर कर देते हैं, लेकिन स्कूल का अधिकतर खर्च वह स्वयं वहन करते हैं।
कॉन्स्टेबल के तौर पर उन्हें लगभग 36,000 रुपये मिलते हैं, जिसमें से अधिकतर वह बच्चों की पढ़ाई और उनका भविष्य संवारने में खर्च कर देते हैं। हालांकि, उनके स्कूल को किसी भी तरह से कोई सरकारी मदद नहीं मिलती है।

कई बार हुए हैं सम्मानित
अपने बेहतर कार्य की वजह से अरूप मुखर्जी को देशभर के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। वर्ष 2017 में उन्हें बेंगलुरु में सर्वश्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता का सम्मान मिला था। इसके अलावा 2018 में राजस्थान के उदयपुर में भी उन्हें शिक्षा वीर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
 इस वर्ष गत 15 जून को ही मुंबई के आईआईटी कॉलेज में उन्हें सी टॉक संस्था की ओर से प्रेरणा स्रोत के तौर पर आमंत्रित किया गया था। वहां अरूप को 'लगन हो तो कुछ भी संभव है' की थीम का चेहरा बनाया गया था। वहां भी उन्हें सम्मानित किया गया है। कुल मिलाकर कहा जाए तो अरूप मुखर्जी पूर्व के समाजसेवियों की परम्परा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

हिन्दुस्थान समाचार


 
Top