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कन्याओं के प्रति सम्मान भाव जगाये रखने की जरूरत

29/09/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'

प्रकृति का तृप्ति पर्व पितृपक्ष समाप्त हो गया। नवरात्र में दुर्गा पूजा की तैयारियां तेज हो गई हैं। दुर्गापूजा यानी नारी की शक्ति और पराक्रम का पर्व। इन नौ दिनों में हर तरफ देवी भाव होता है। नवरात्र में लोग नौ साल तक की उम्र वाली  कन्याओं का पूजन करते हैं। उनके पैर पखारते हैं। उन्हें वस्त्र और भोजन प्रदान करते हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस भाव की सराहना की जानी चाहिए। यही भाव लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। लेकिन यह भाव नवरात्र के नौ दिन ही नजर आता है। जब लोगों को नन्हीं बालिकाओं में मां दुर्गा की छवि नजर आती है। लेकिन साल के शेष दिनों में वही मासूम बच्चियां कुछ दरिंदों की हवस सामग्री बन जाती हैं। इसके मूल में जाने की जरूरत है।
 सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर जिले में पॉक्सो कोर्ट खोलने के निर्देश दिए हैं। उच्च न्यायालयों से कहा है कि वे फास्ट ट्रैक कोर्ट लगाकर बच्चियों के साथ होने वाली दरिंदगी की घटनाओं की त्वरित सुनवाई करें और दोषियों को सजा दिलाएं। केंद्र सरकार भी इससे सहमत है। जिन राज्यों में राजधानी स्तर पर ही पॉक्सो कोर्ट रही है, वे भी जिला स्तर पर पॉक्सो कोर्ट खोलने की मुनादी करने लगे हैं। अगर ऐसा होता है तो यह अच्छी पहल साबित होगी। कानून सख्त होना चाहिए। लेकिन इतने भर से बात नहीं बनती। मानव मन पवित्र कैसे बने, विकारमुक्त कैसे हो, मंथन तो इस पर होना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपने कार्यक्रम' मन की बात' में मासूम बच्चियों से दुष्कर्म की घटनाओं पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि बच्चियों के साथ दरिंदगी करने वालों को फांसी दी जानी चाहिए। उनकी अपील के बाद बच्चियों से दुष्कर्म के कुछ आरोपियों को फांसी की सजा तो सुनाई गई लेकिन उसका अनुपालन नहीं हो पाया। वजह चाहे जो भी हो। जब दरिंदों को फांसी दी जाने लगेगी तो उनके दिल में कार्रवाई का डर बैठेगा। अगर देश की अदालतें और पुलिस भय बनाने में कामयाब हो गई तो बच्चियों के यौन शोषण की घटनाओं में सहज ही कमी आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात मध्यप्रदेश के मंदसौर में हुई घटना के मद्देनजर की थी। उन्होंने कहा था कि मध्यप्रदेश में पॉक्सो एक्ट के तहत कुछ दिन की सुनवाई के बाद दुष्कर्म के आरोपियों को फांसी की सजा सुना दी गई। लेकिन इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि मध्यप्रदेश में अभी तक पॉक्सो के 10,950 मामले लंबित हैं जिनकी सुनवाई शुरू ही नहीं हो पाई है। देश में 90 हजार से ज्यादा मामले पॉक्सो एक्ट के तहत पंजीकृत हैं। जब तक अदालतों में लंबित पॉक्सो एक्ट के मामलों में कोर्ट से निर्णय आएंगे तब तक तो पीड़ित बच्चे बालिग भी हो जाएंगे।
 बचपन बचाओ आंदोलन के मुख्य कार्याधिकारी भुवन रिभु की मानें तो देश में बाल यौन शोषण के तकरीबन एक लाख मामले विशेष अदालतों में विचाराधीन हैं। देश में हर घंटे 40 बच्चियों का यौन शोषण हो रहा है, जिनमें से मात्र दस फीसद मामले ही पॉक्सो के तहत दर्ज होते हैं। पॉक्सो एक्ट में बदलाव हो जाने के बाद 12 साल उम्र तक की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को फांसी की सजा देने का प्रावधान है। अकेले गुजरात में ही पॉक्सो के तहत इतने केस दर्ज हैं कि अगर कोई नया मामला दर्ज न हो तो भी इन मामलों को 2071 से पहले निपटा पाना मुश्किल है। अरुणाचल प्रदेश में वर्ष 2117 तक और दिल्ली में 2029 तक ही सभी बच्चियों को न्याय मिल पाएगा। दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे के मुताबिक पॉक्सो एक्ट के तहत साल 2012 से 2015 तक 5217 केस दर्ज किए गए, जिनमें से केवल 575 मामलों का ही निबटारा हुआ। निपटारे की गति यथावत रही तो केरल में वर्ष 2039, पश्चिमी बंगाल में साल 2035, महाराष्ट्र में साल 2032 और बिहार में 2029 तक ही बच्चियों के साथ हुए यौन शोषण के अब तक दर्ज मामले निपट पाएंगे। न्याय का देर से मिलना भी किसी अन्याय से कम नहीं है। हर जिले में पॉक्सो कोर्ट की स्थापना का विचार शायद इसी चिंता की परिणति है। सच तो यह है कि पॉक्सो मामलों का निपटारा करने के लिए देशभर में मात्र 620 विशेष अदालतें ही हैं। 
 जिस समय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से देश के हर जिले में पॉक्सो कोर्ट गठित करने की बात कही थी, उसी दिन कोर्ट मित्र ने अदालत को बताया था कि हर जिले में मासूम बच्चियों से दुष्कर्म के 250 से अधिक मामले दर्ज हैं। एक जनवरी 2019 से 30 जून 2019 के बीच भारत में बच्चियों के साथ बलात्कार के 24,212 मामले दर्ज हुए हैं। मतलब एक दिन में 130 और हर पांच मिनट में एक बलात्कार की घटना दर्ज होती है। यह सब हाईकोर्ट के आंकड़े हैं जो उनकी तरफ से सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हैं। 2012 में पॉक्सो एक्ट बना था। इसके तहत बच्चों के साथ बलात्कार के मामले को एक निश्चित समय सीमा के भीतर फैसला देने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन सात साल बाद भी हम इस स्थिति में नहीं आ सके हैं कि जल्द हर बलात्कार पीड़ित बालिका के दोषियों को सजा दे सकें। यह सच है कि इन 24,212 मामलों में से मात्र 911 मामलों में ही सजा हुई है। 11,981 मामलों में जांच चल रही है। 4871 मामलों में पुलिस ने अदालत को रिपोर्ट सौंपी है।
   उत्तर प्रदेश में बच्चियों बलात्कार के 3457 मामले दर्ज हुए हैं। 51 प्रतिशत मामलों में जांच ही चल रही है। पुलिस सिर्फ 336 मामलों में जांच रिपोर्ट अदालत को सौंप पाई है। 115 मामलों का ही निस्तारण हुआ है। मध्य प्रदेश में छह महीने में 2389 बच्चियों के बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं। 56 प्रतिशत मामलों में यानी 1337 मामलों में ट्रायल शुरू है मगर केस लंबित है। 247 मामलों में फैसला आया है।
 राज्यसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि बच्चियों के खिलाफ यौन अपराध और बलात्कार के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए केन्द्र सरकार ने 1023 विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें गठित करने को मंजूरी दी है। उन्होंने कहा था कि अभी तक 18 राज्यों ने ऐसी अदालतों की स्थापना के लिए सहमति जताई है। 1023 विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन के लिए कुल 767 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसमें से केन्द्र 474 करोड़ रुपये का योगदान देगा।
कड़े कानून और अदालतों की सख्ती के बाद भी बच्चियों से दरिंदगी कम नहीं हो रही है। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस बाबत मौन हैं। सरकार इस तरह के अपराधियों का आंकड़ा तैयार कर रही है लेकिन चिंतन का विषय तो यह है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' की भावभूमि वाले देश में इस तरह की दुष्प्रवृत्ति परवान क्यों चढ़ रही है? इसका निदान क्या है? कानून सख्त करना या अदालतों का बढ़ाना अस्थायी समाधान है। हमें स्थायी समाधान तलाशना होगा। क्या हम इस नवरात्र में बच्चियों और महिलाओं के सम्मान को अक्षुण्ण बनाये रखने का संकल्प ले सकते हैं और अपने संकल्प को पूर्ण करने की राह पर चल सकते हैं?  
 (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)  


 
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