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जारी है चीन की हेकड़ी

09/10/2019

जारी है चीन की हेकड़ी

डॉ. प्रभात ओझा

हांगकांग के मामले में चीन दुनिया में किसी की सुनने को तैयार नहीं है। हांगकांग के लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जवाब में उन पर अत्याचार जारी है। मसला इतना गंभीर हो चुका है कि दुनिया के प्रमुख देश आम नागरिकों पर कार्रवाई को मानवता के खिलाफ बता रहे हैं। उधर, चीन है कि जरा भी परवाह नहीं कर रहा। चीन के इस रुख को हम सबसे करीब अपने ही यहां चीन के राजदूत के बयान और एक अखबार में लिखे लेख से भी समझ सकते हैं। हाल में राजदूत सन वेइदोंग ने कहा कि हांगकांग चीन का आंतरिक मामला है। कुछ बाहरी शक्तियां हमारे आंतरिक मामले में दखल दे रही हैं।

चीन हमेशा से अपनी ही करने के लिए पहचाना जाता है। डेढ़ सौ साल ब्रिटेन का हिस्सा रहा हांगकांग आज जब एक समझौते के तहत चीन के पास है, वह समझौते की सारी शर्तें दरकिनार कर, वहां अपनी ही वाली करने पर उतारू है। गजब है कि जो चीन, कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ दिखता है, हांगकांग पर दुनिया की आवाज को दरकिनार करने पर लगा है।

राजदूत का कहना है कि हांगकांग में हिंसक अपराधों को ये बाहरी ताकतें जानबूझकर शांतिपूर्ण विरोध बता रही हैं। हांग काग की हालत और भारत में चीन के राजदूत के बयान के संदर्भ में पहले हम वहां के हाल जान लें। अभी तो हांगकांग की प्रशासक कैरी लैम ने चार सितंबर को विवादित प्रत्यर्पण विधेयक को वापस लेने की घोषणा कर दी। उन्होंने बताया कि जल्द ही इसके लिए औपचारिक कार्यवाही की जायेगी। इस विधेयक के खिलाफ जून से ही चीन प्रशासित इस शहर में अशांति का माहौल है। विधेयक के मुताबिक किसी अपराध के आरोपित को चीन की मुख्य भूमि में प्रत्यर्पित किए जाने की व्यवस्था है। दरअसल, एक समझौते के तहत ब्रिटेन ने डेढ़ सौ साल से अधिक समय तक अपने अधिकार में रहे हांगकांग को 1997 में चीन के हवाले कर दिया था। तब से हांगकांग को चीन की ‘एक देश, दो शासन प्रणाली’ वाली व्यवस्था के तहत अर्ध स्वायत्तता हसिल है। इसी आधार पर हांगकांग के लोगों को लगता है कि प्रस्तावित विधेयक उनकी स्वतंत्रता का हनन है।

हांगकांग दुनियाभर में व्यापार के प्रमुख केंद्र और पर्यटन के नजरिए से एक खूबसूरत शहर माना जाता है। अप्रैल में जब से इस विधेयक के प्रारूप पर विवाद शुरू हुआ, धीरे-धीरे वहां की शांति तिरोहित होती चली गयी। जून से जारी हिंसक आंदोलन का यह आलम है कि प्रदर्शनों के दौरान वहां एक हजार से ज्यादा लोगों को गिरμतार कर लिया गया है। आंदोलनरत लोगों पर पुलिस कार्रवाई के फलस्वरूप हिंसा में सैकड़ों लोग घायल हो चुके हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल भी हांगकांग के हालात से चिंतित है। इस संस्था का कहना है कि बिल को वापस लेने का स्वागत है, पर प्रदर्शनकारियों पर जिस तरह से पुलिस ने बल प्रयोग किया है, उसकी जांच भी होनी चाहिए। इधर, कैरी लैम के विवादित विधेयक वापस लेने की घोषणा पर लोगों को भरोसा नहीं हो रहा। नागरिक स्वतंत्रता से संबंधित कुछ और मांगें हैं, जिन पर प्रदर्शनकारी अड़े हुए हैं।

थ्येनआनमन की याद!

चीन के थ्येनआनमन चौक पर ठीक तीन दशक पहले जून,1989 में एक ऐसी घटना हुई थी, जिसे वहां की कम्युनिस्ट सरकार बहस में लाने से बचना चाहती है। और तो और, चीन के अंदर स्कूलों के पाठ्यक्रम आदि में भी इसे आने नहीं दिया जाता। तब पांच जून,1989 को राजधानी वीजिंग के थ्येनआनमन चौक पर लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर चीनी सेना ने कहर ढा दिया था। तब चीन में तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत एलन डोनाल्ड ने अपने देश भेजे संदेश में कहा था कि प्रदर्शनकारियों पर टैंकों का भी इस्तेमाल किया गया और कम से कम 10 हजार लोग मारे गये हैं। एनल डोनाल्ड का वह टेलीग्राम नरसंहार के 28 साल बाद 2017 में ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्ज में लोगों के लिए सुलभ हो पाया। याद किया जाता है कि 1989 में मारे गये लोगों की संख्या दो हजार से भी कम बतायी गयी थी। चीनी सरकार ने तो मारे गये आम नागरिकों की संख्या सिर्फ 200 बतायी थी। हुआ यूं था कि अप्रैल 1989 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव और सुधारवादी नेता हू याओबांग को सत्ता से हटा दिया गया था। तभी उनकी मौत हो गयी और इससे गुस्साये छात्रों ने उनकी याद में मार्च आयोजित किया था। करीब सात सप्ताह से डेरा जमाये छात्रों के समर्थन में तीन और चार जून, 1989 को सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुए। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने लोगों का निर्दयतापूर्ण दमन किया। इसके लिए सेना ने बंदूकों और टैंकों तक का प्रयोग किया था।

ब्रिटिश उपनिवेश रहा हांगकांग कुछ शर्तों के साथ चीन को दिया गया था। शर्तों के मुताबिक, नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार बनाये रखने के लिए चीन ने हांगकांग को स्वायत्तता दी। समझौते में यह स्थिति 50 साल तक बनाये रखने की व्यवस्था है। इसके बावजूद, चीन ने हांगकांग के नागरिक अधिकारों में धीरे-धीरे कटौती शुरू कर दी। लोग डर गये कि जल्द ही उनकी हालत चीन के बाकी स्थानों की तरह हो जायेगी, जहां को हालात के बारे में बाहर कोई जानकारी तक नहीं मिलती। कुछ मीडिया संस्थानों के मुताबिक, लोकतंत्र समर्थक नेता वु ची.वाई का कहना है कि पुलिस को अपनी बर्बरता पूर्ण कार्रवाई को रोकना होगा, नहीं तो यह प्रदर्शन ऐसे ही जारी रहेगा।

लोकतंत्र समर्थक जोशुआ वोंग कहते हैं कि बिल को वापस लेना बहुत देर से लिया गया फैसला है। यह तो अब छोटा मसला रह गया है। चीन की केंद्रीय सत्ता जिस तरह हांगकांग पर जुल्म ढा रही है, अब चिंता भविष्य की है। लोकतंत्र समर्थक गिरμतार किए गये सभी लोगों को बिना शर्त रिहा करने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी अपने लिए प्रयोग किए गये ‘दंगाई’ शब्द को वापस लेने, सभी को आम माफी देने, स्वतंत्र जांच कराने और अलग निर्वाचन अधिकार देने की मांग कर रहे हैं। उनकी मांगों में सीधे अपना नेता चुनने का अधिकार भी शामिल है। असल में कैरी लैम अभी तक चीन की व्यवस्था के मुताबिक एक तरह से मनोनीत प्रशासक ही हैं। कैरी लैम का एक नाटकीय आॅडियो भी इस बीच लोगों को उकसा रहा है।

लैम की घोषणा के पहले उनका यह आॅडियो लीक हो गया था। आॅडियो में कैरी दुखी होकर हांगकांग के हालात के लिए खुद को जिम्मेदार बता रही हैं और अपने इस्तीफे तक की बात कह रही हैं। बाद में कैरी लैम ने एक वीडियो मैसेज में संघर्ष की जगह बातचीत की अपील की है। उन्होंने इस मसले पर विशेषज्ञों से सलाह लेने की बात भी कही है। हालांकि, साथ ही हांगकांग प्रशासन ने आंदोलनकारियों को आम माफी देने, उनके लिए दंगाई की संज्ञा वापस लेने, उच्च स्तरीय जांच और उन्हें अलग निर्वाचन अधिकार देने जैसी मांगे मानने से इंकार कर दिया। इस बयान के बाद हांगकांग में जल्द शांति लौटने की संभावना नहीं दिख रही है। अब हाल यह है कि 8 सितंबर को हजारों लोगों ने सामूहिक रूप से अमेरिकी राष्ट्रगान गाते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मदद की गुहार लगाई। पुलिस ने रोका तो महानगर में कई जगहों पर फिर हिंसा शुरू हो गई। लोगों की अमेरिका से गुहार का कारण साफ है कि अमेरिका ने चीन से हांगकांग मामले में संयम की अपील की है। दूसरी ओर चीन, अमेरिका और ब्रिटेन को हांगकांग की अशांति के लिए जिम्मेदार मानता है।

ब्रिटेन के साथ अमेरिका से चीन कुछ ज्यादा ही खफा है। उसे लगता है कि अमेरिकी पहल पर ही फ्रांस में विकसित देशों के समूह जी-7 के सम्मेलन में हांगकांग पर प्रस्ताव लाया गया था। प्रस्ताव में जी-7 देशों ने चीन को 1984 में हुए ब्रिटेन-चीन समझौते की जिम्मेदारियों की याद दिलाई। सम्मेलन ने अपने प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा कि जी-7 के देश वर्ष 1984 में हांग काग पर चीन-ब्रिटेन के बीच समझौते के महत्व को मानते हैं और हिंसा से बचने की अपील करते हैं। अमेरिका और ब्रिटेन के साथ बाकी पांच देश कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान ने भी प्रस्ताव को समर्थन दिया। दरअसल, हांगकांग के मसले पर चीन इस समय भारी दबाव में है। भारत भी जी- 7 में आमंत्रित सदस्य है। हमारा देश चीन का पड़ोसी भी है। पिछले कुछ समय से चीन पाक अधिकृत कश्मीर में जो कॉरिडोर विकसित कर रहा है,उसे लेकर भी उसे भारत के विरोध का सामना करना पड़ा है। इसीलिए उसने जम्मू-कश्मीर को स्वायत्त राज्य की जगह दो केंद्र शासित राज्य बनाये जाने के भारत के कदम पर कुछ हलके ढंग से ही सही, पाकिस्तान के सुर से सुर मिलाया था।

बहरहाल, स्वार्थवश दो-तीन देशों के पाकिस्तान के साथ होने के अलावा भारत ने दुनिया को यह समझा लिया है कि जम्मू- कश्मीर मसला सिर्फ और सिर्फ भारत का आंतरिक मामला है। दूसरी ओर हांगकांग में बढ़ती हिंसा के कारण दुनिया चीन में 30 साल पहले के उस थ्येनआनमन चौक की घटना को याद कर रही है, जब चीनी टैंकों के जरिए हजारों आंदोलनकारी मौत की नींद सुला दिए गये थे। चीन लाख हेकड़ी दिखाए, वह दूसरी ऐसी वारदात से अपनी मानवता विरोधी छवि को दोहराने से जरूर बचना चाहता है।


 
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