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देश की प्रगति और आपातकाल के लिए याद रहेंगी इंदिरा

29/10/2019

(पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि, 31 अक्टूबर पर विशेष)

अरविन्द नाथ तिवारी
इंदिरा गांधी देश की प्रगति और आपातकाल के लिए याद रहेंगी 31 अक्टूबर 1984 का दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन के लिए अंतिम दिन साबित हुआ था। उन्होंने स्वयं के प्राण रक्षा के लिए जिस ढाल को कवच बनायी थी, वही जानलेवा साबित हुई। उड़ीसा में जनसभा करने के दौरान उनको अपनी मृत्यु का एहसास हो चुका था। वो बोल चुकी थीं - 'मेरे रक्त का एक-एक कतरा देश के लिए काम आएगा' और यह चरितार्थ भी मौत के दिन हो गया।
इंदिराजी के पद ग्रहण करने के समय देश कठिन दौर से गुजर रहा था। उनके कई निर्णय देश के उत्थान के तरफ ले गया, तो कई ऐसे निर्णय उनके व्यक्तित्व के लिए विवाद के रूप में जन्म दे दिया। देश आज भी आपातकाल लागू करने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने, देश को महाजनी व्यवस्था से छुटकारा दिलाने, 1971 में भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में 93000 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को सरेंडर करवाने, देश में नसबंदी लागू करने के लिए विशेष तौर पर इंदिरा गांधी को याद करता है। फिर भी इंदिराजी को एक लौह महिला प्रधानमंत्री के रूप में आज भी याद किया जाता है। इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री मार्गेट थ्रेचर की साहसिकता और इंदिरा गांधी की साहसिकता समकालीन थी। जब देश अन्न की कमी से जूझ रहा था, उस समय उनकी हरित क्रांति ने देश को अन्न की कमी से उबारा।
इंदिरा जी की साहसिकता बचपन से ही लोगों को दिखाई पड़नी शुरू हो गयी थी। इंदिराजी के बाल्यकाल के समय जवाहरलाल नेहरू का प्रवेश स्वतन्त्रता आन्दोलन में महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुआ था। उस समय इन्दिराजी ने युवा लड़के-लड़कियों के साथ वानर सेना बनाकर अपने साहस और हिम्मत का परिचय दिया था। आजादी की लड़ाई में वानर सेना की उल्लेखनीय भूमिका आज भी याद की जाती है। प्रधानमंत्री बनने पर उन्होंने साहसिकता का परिचय देते हुए देश के सभी बैंकों का जुलाई 1969 में राष्ट्रीयकरण किया, क्योंकि देश उस समय महाजनी व्यवस्था से कराह रहा था। लोग महाजनी व्यवस्था से छुटकारा पाना चाहते थे। बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना बड़ी चुनौती थी। इंदिराजी की तीसरी साहसिकता बांग्लादेश की स्वतंत्रता घोषणा पर पाकिस्तान की विरुद्ध भारतीय सेना की कार्यवाही करना था। चटगांव की भूमि पर भारतीय सेना के सामने 93000 पाकिस्तानी सेना को आत्म समर्पण करना पड़ा। विश्व के सैन्य इतिहास में शत्रु सेना का आत्म समर्पण करना पहली ऐतिहासिक बड़ी घटना थी। जिसका सारा श्रेय इंदिरा गांधी को मिलता है। इंदिरा की साहसिकता के कई आयाम दिखाई पड़ते हैं, जिनमें कुछ आयाम तो देशहित के लिए रहा, परन्तु कुछ उनके व्यक्तित्व लिए विवाद को जन्म दे दिया और कुछ उनकी मौत का कारण बना।
इंदिराजी प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद कांग्रेस अध्यक्ष कामराज के सहयोग से देश की प्रधानमंत्री बनीं। उस समय देश अनाज की कमी से जूझ रहा था। गरीबी चरम सीमा पर थी। उन्होंने गरीबी समाप्त करने के लिए देशभर में अभियान चलाया। इसकी बदौलत उन्होंने सत्ता में दोबारा वापसी की। लेकिन वहीं से उनका गुरूर जाग गया। जो आखिर में उनके पतन का कारण बना। गरीबी तो दूर हुई नहीं, इंदिरा ने अपने विरोधियों का सफाया शुरू कर दिया। राज्यों से विरोधी दलों की सरकारें बर्खास्त की जाने लगीं। इस बीच, राज नारायण जो बार-बार रायबरेली संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ते और हार जाते थे, उनके द्वारा दायर एक चुनाव याचिका में कथित तौर पर कदाचार के आरोपों के आधार पर 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन्दिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद्द घोषित कर दिया। हालांकि इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन वहां भी राहत नहीं मिलने पर उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से 26 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित करा दिया। आपातकाल लागू करने के साथ कुछ ही महीने के भीतर दो विपक्षी दल शासित राज्य गुजरात और तमिलनाडु पर राष्ट्रपति शासन लागू करके पूरे देश को प्रत्यक्ष केन्द्रीय शासन के अधीन कर लिया। इससे पहले जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी नेता लामबंद हो चुके थे। इंदिरा ने मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जार्ज फर्नांडीस समेत विपक्ष के हजारों नेताओं को जेल में बंद कर दिया। जयप्रकाश की अगुवाई में जनता पार्टी का गठन किया गया। 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा और उनकी कांग्रेस जनता पार्टी से बुरी तरह पराजित हो गई। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और नीलम संजीव रेड्डी देश के राष्ट्रपति बनाये गए। हालांकि जनता पार्टी की सरकार अपने अंतर्विरोधों से अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1980 में इंदिरा ने दोबारा सत्ता में वापसी कर ली। 
इंदिरा के सत्ता में लौटकर आने के बाद पंजाब में अलग खालिस्तान देश के लिए आंदोलन शुरू हो गया। विश्लेषकों का मानना है कि उस आंदोलन को शुरू में इंदिरा गांधी ने ही हवा दी थी। बाद में वह आंदोलन इंदिरा के लिए ही सिरदर्द बन गया। सितम्बर 1981 में जरनैल सिंह भिंडरावाले का अलगाववादी सिख आतंकवादी समूह सिख धर्म के पवित्रतम तीर्थ, हरिमन्दिर साहिब परिसर के भीतर घुसपैठ कर गया। स्वर्ण मंदिर परिसर में हजारों नागरिकों की उपस्थिति के बावजूद इंदिरा ने आतंकवादियों का सफाया करने के लिए सेना को स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने का आदेश दिया। सेना की फायरिंग में कई लोग हताहत हुए। इससे सिखों में इंदिरा के प्रति नफरत फैल गई। अंतत: 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा के दो अंगरक्षकों सतवंत सिंह और बेअन्त सिंह ने सरकारी हथियारों से 1, सफदरजंग रोड, नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री निवास में इन्दिरा को गोली मार दी। उन्हें एम्स अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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