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विभ्रम, विग्रह, संकल्प और सत्तारोहण

18/09/2019

विभ्रम, विग्रह, संकल्प और सत्तारोहण


म धारणा के विपरीत जवाहर लाल नेहरू का देश का पहला प्रधानमंत्री बनना एक चमत्कार से कम नहीं था। उनके पिता मोतीलाल नेहरू उन्हें देश का पहला प्रधानमंत्री देखना अवश्य चाहते थे। लेकिन 1929 में अचानक उनके कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने तक कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता था। उस समय देश में और कांग्रेस में अंग्रेजी पढ़ी-लिखी एक नई युवा पीढ़ी उभर रही थी। उनमें अनुभव और अनुशासन कम था, देश की स्वतंत्रता के लिए व्याकुलता अधिक थी। जवाहर लाल उसकी अगली पंक्ति में थे। गांधी जी इस पीढ़ी को नेतृत्व देकर उसे कुछ उत्तरदायी बनाना चाहते थे। लेकिन अध्यक्ष होते ही नेहरू ने कांग्रेस के अन्य सभी अनुभवी नेताओं की उपेक्षा करके अपनी अलग राह लेने की कोशिश की और पटेल, राजेंद्र बाबू तथा राजगापालाचारी जैसे नेताओं को विरोध में कांग्रेस कार्यसमिति से इस्तीफा देना पड़ा। तब से नेहरू के व्यक्तिगत प्रचार का काम सुनियोजित तरीके से शुरू हुआ।

नेहरू का अंग्रेजी पर अधिकार, ब्रिटिश अफसरों से निकटता और राजनैतिक चतुराई उन्हें अगली पंक्ति में बनाए रही थी। उनका गांधी जी के विचारों से कोई मेल नहीं था। वे न भारतीय सभ्यता को ठीक से समझते थे, न उनकी उसमें कोई निष्ठा थी। उन्होंने भारतीय गांव का उसी तिरस्कारपूर्वक उल्लेख किया है जैसा कार्लमार्क्स ने। फिर भी अपनी चतुराई के बल पर वे अगली पंक्ति में बने रहे। दूसरे महायुद्ध के बाद यूरोपीय शक्तियां कठिनाई में थीं। युद्ध में यूरोप का काफी विनाश हुआ था। यूरोप का नए सिरे से निर्माण करना था। यूरोपीय शक्तियां विध्वंस से उबरने के इस अभियान के लिए अपनी समूची शक्ति और साधन बचाकर रखना चाहती थीं। इसलिए यह धारणा बनी कि वे अपने उपनिवेशों को स्वतंत्र कर दें। भारत ही नहीं, 1947 से 1970 तक लगभग सभी उपनिवेश स्वतंत्र हो गए।

नेहरू के समय देश की राजनीति में उनके विचारों के कारण जो भटकाव शुरू हुआ था, वह अब दूर हो रहा है। भारतीय समाज की मूल आस्थाओं को फिर आदर से देखा जाने लगा है। यह अभी आरंभिक काल ही है। नरेंद्र मोदी ने अभी शासन का रास्ता बदला है, दिशा नहीं बदली। उसमें समय लगता है।

एटली भारतीय उपनिवेश को स्वतंत्र करने की इसी धारणा को लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने घोषणा की कि भारत अपना संविधान स्वयं बनाए। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिश सरकार अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना चाहती है, परंतु वे उन्हें भारत की प्रगति में बाधा नहीं डालने देंगे। यह घोषणा अब तक की ब्रिटिश नीति से भिन्न थी। पर एटली की इस मंशा की ब्रिटिश शासन के व्यवहार में कोई झलक दिखाई नहीं दे रही थी। इसलिए गांधी जी समेत कांग्रेस के किसी नेता को यह विश्वास नहीं था कि देश जल्दी ही स्वतंत्र होने वाला है। कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों से यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारत का विभाजन चाहती है। गांधी जी विभाजन के खिलाफ थे। उस समय मौलाना आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे। देश को एक रखने के लिए जिन्ना से फिर बातचीत की कोशिश शुरू हुई, लेकिन जिन्ना ने मौलाना आजाद को मुसलमानों का गद्दार बताते हुए उनसे बात करने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के नए अध्यक्ष का चुनाव होना था, उसके लिए वल्लभ भाई, पट्टाभि और कृपालानी के नाम आए। गांधी जी चाहते थे कि अंग्रेजों को विभाजन के बिना देश छोड़ने के लिए राजी कर लिया जाए।

विभाजन को वे भारत की पवित्र सीमाओं के साथ पाप समझते थे और विभाजन रोकने के लिए दस वर्ष और आंदोलन जारी रखने के लिए तैयार थे। ऐसी कठिन घड़ी में अंग्रेजों से बात करने के लिए उन्होंने नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने का सुझाव दिया। नेहरू अध्यक्ष बने और विभाजन के लिए तुरंत मान गए। कांग्रेस महासमिति में गांधी जी ने इसके लिए उनकी भर्त्सना की, लेकिन यह कहते हुए विवशता भी जताई कि इस परिपक्व आयु में अब वे कोई नया नेतृत्व पैदा नहीं कर सकते। कांग्रेस का अध्यक्ष होने और ब्रिटिश प्रशासन की निकटता के कारण जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री हुए। 1964 में अपनी मृत्यु तक वे देश के प्रधानमंत्री रहे। उनके शासन के 17 वर्ष विभ्रम के वर्ष हैं।

गांधी जी के अनोखे आंदोलन के कारण और प्राचीन उपलब्धियों के कारण भारत की दुनियाभर में जो प्रतिष्ठा थी, उसका लाभ उठाकर हम सभी विश्व शक्तियों से बराबर के स्तर पर संबंध जोड़ सकते थे। उस काल खंड में जो देश अपना तेज विकास करने में सफल हो गए, उन्हें विश्व शक्तियों का सहयोग प्राप्त था। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाकर भारत को सबसे अलग कर दिया। उन्होंने चीन का तिब्बत पर आसानी से नियंत्रण होने दिया और भारत की सुरक्षा खतरे में डाल दी। उन्होंने भारत की सामरिक तैयारी की पूर्ण उपेक्षा यह कहते हुए की कि भारत एक शांतिप्रिय देश है, उसे किसी से खतरा नहीं है। सामरिक तैयारी के लिए जो वैज्ञानिक संस्थान खड़े किए जाने थे, उनमें ढील-ढाल होती रही। रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान 1958 में गठित हो पाया। न उसे पर्याप्त प्रयोगशालाएं मिलीं, न वैज्ञानिक, न साधन। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की पहल 1962 में हुई और वह 1969 तक गठित हो पाया। महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज्य की बात की थी। कांग्रेस के नेताओं ने ग्राम को कृषि में सीमित कर दिया।

पहली पंचवर्षीय योजना केवल कृषि को ध्यान में रखकर बनी। दूसरी योजना उस गलती को सुधारने के लिए उद्योगों पर केंद्रित हो गई। कृषि और उद्योग एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, यह परंपरागत भारत में सबको मालूम था। अंग्रेजों के आने से पहले भारत कृषि और उद्योग दोनों में ही संसार का सबसे उन्नत देश था। नेहरू इस परस्पर निर्भरता को नहीं जानते थे। क्योंकि मध्यकालीन यूरोप में केवल कृषि थी, उद्योग नहीं थे। नेहरू के जीवन काल में आर्थिक प्रगति धीमी रही। सुनियोजित रूप से तैयार किया गया उनका प्रभामंडल भी 1962 में चीन से मिली पराजय से क्षीण हो गया। अपने शासनकाल में नेहरू ने राष्ट्रीय आंदोलन के पुण्य का भोग भर किया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का विभ्रम काल था। जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद भारतीय राजनीति में विग्रह काल आरंभ हो गया। नेहरू की नीतियों के कारण शासन की दिशा लोक विमुख हो गई थी।

भारतीय समाज की सभी मूल आस्थाओं को अवमानना के भाव से देखा जा रहा था। शासन के भीतर और बाहर वामपंथी विचारधारा को ही बढ़ावा मिल रहा था। शासन और जनता के बीच बढ़ती हुई खाई ने कांग्रेस को कमजोर किया। नेहरू की नीतियों के कारण भारत विरोधी अमेरिका, पाकिस्तान और चीन की एक धुरी बन गई। 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। सेना के शौर्य और लाल बहादुर शास्त्री के संकल्पशील नेतृत्व के कारण हम जीते, लेकिन सफल पंच बनने के लिए डाले गए रूस के दबाव के कारण हमें जीते हुए क्षेत्र लौटाने पड़े। इस काल में एक तरफ नेहरू काल का विभ्रम बना हुआ था, दूसरी तरफ भारतीय समाज अपनी आस्थाओं की ओर लौटकर अपनी जीवनी शक्ति पाने की कोशिश कर रहा था। गौ भक्ति भारतीय समाज की मूल आस्थाओं में से एक है।

1955 में सेठ गोविंददास ने गौहत्या निषेध का एक कानून बनवाने की कोशिश की थी, नेहरू ने अपने इस्तीफे की धमकी देकर यह कानून बनने से रोक दिया था। 1966 में गौहत्या निषेध को लेकर दिल्ली में अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ। कई लाख लोग दिल्ली पहुंचे। यह अफवाह उड़ी कि साधु संसद को घेरने की तैयारी कर रहे हैं। इंदिरा गांधी ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए। यह घटना भारतीय राजनीति के लिए प्रस्थान बिंदु बनी। इस घटना ने कांग्रेस का विग्रह तेज कर दिया। 1967 के चुनाव में अनेक राज्यों से कांग्रेस की सरकारें समाप्त हो गईं। इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान का विभाजन करवाते हुए बांग्लादेश बनवाकर कांग्रेस की खोई हुई प्रतिष्ठा लौटाने की कोशिश की। लेकिन 1974 आते-आते बिहार और गुजरात में कांग्रेस के शासन के विरुद्ध जनांदोलन शुरू हो गए। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में इस आंदोलन ने देशव्यापी स्वरूप ले लिया।

1975 में इंदिरा गांधी ने आपात स्थिति लगाई। 1977 के चुनाव में देश की जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। भारतीय राजनीति का यह विग्रह काल लंबा चला। कांग्रेस की जगह जो दल और नेता सत्ता में पहुंचे वे भी कमोबेश कांग्रेस से छिटककर बाहर आए थे या नेहरू जैसे वामपंथी विचारों वाले ही थे। शक्ति के इस बिखराव को रोकने के लिए और भारतीय आत्मा को जगाने के लिए फिर से एक अभियान की आवश्यकता पड़ी। यह अभियान 1990 से राम जन्मभूमि आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। इसके बाद देश में एक नई राजनैतिक ऊर्जा पैदा हुई। यह भारतीय राजनीति का संकल्प काल था। राम जन्मभूमि आंदोन में अग्रणी होने के कारण इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला। 1996 में इस नई ऊर्जा के सहारे अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में पहुंचे। यह संक्रमण की अवधि थी। तेरह महीने बाद उन्हें फिर से चुनाव में उतरना पड़ा। 1999 से 2004 तक उन्हें पूरे पांच वर्ष सत्ता में रहने का अवसर मिला।

अटल जी सत्ता प्रतिष्ठान को बहुत नहीं बदल पाए। उनकी इस असफलता ने सत्ता में कांग्रेस की वापसी की। देश पर फिर कांग्रेस का ढुलमुल शासन हो गया। इसने भारतीय समाज को फिर से एक नए नेतृत्व की खोज में लगाया। यह खोज ही नरेंद्र मोदी के सत्ता में पहुंचने का आधार बनी है। नरेंद्र मोदी का काल भारतीय आत्मा के सत्तारोहण का काल है। अब शासक बदल जाए तो भी देश की दिशा नहीं बदलने वाली। स्वतंत्रता के पिछले 72 वर्षों को हम विभ्रम, विग्रह, संकल्प और सत्तारोहण काल में बांटकर अब तक के इतिहास को अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं।


 
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