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‘मैं1986 से परेशान हूं’-आरिफ मो. खान

11/07/2019

‘मैं1986 से परेशान हूं’-आरिफ मो. खान

सौरव राय

1986 में कट्टरपंथियों के आगे राजीव गांधी सरकार ने हथियार डालते हुए शाहबानो के मामले में दिये गये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। लेकिन सरकार के इस गलत फैसले को आईना दिखाते हुए जिस एक व्यक्ति ने मुखर विरोध किया और राजीव कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था, वह थे आरिफ मोहम्मद खान। वही आरिफ मो. खान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान के बाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हुए हैं। मुस्लिम समाज की कुरीतियों समेत देश-समाज से ताल्लुक रखने वाले सम सामयिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने वाले आरिफ मो. खान से सौरव राय की बातचीत के संपादित अंश:

प्रधानमंत्री ने संसद में एक बयान दिया और आप राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गये उस बयान के पीछे का परिदृश्य क्या था?
1986 में राजीव गांधी की सरकार थी। सुप्रीम कोर्ट से शाहबानो पर फैसला आ चुका था। बतौर केन्द्रीय मंत्री की हैसियत से मैंने संसद में उस फैसले का स्वागत किया था। लेकिन कुछ समय बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दबाव में सरकार ने संसद में यह मान लिया कि वह इस फैसले के विरोध में बिल लाएगी। जब यह बात मुझे पता चली मैंने एक इस्तीफा लिखा और उसे देकर मैं अपने दोस्त के घर चला गया। मुझे बुलाया गया और मुझपर इस्तीफा वापस लेने का दबाव बनाया गया। सबसे पहले अरुण नेहरु ने समझाया, जब मैं नहीं माना तो अंत में मेरे पास नरसिम्हा राव जी आये और समझाने के क्रम में उन्होंने मुझसे कहा कि अगर यह समाज (मुस्लिम) गटर में रहना चाहता है तो उसे रहने दो। हम राजनेता हैं समाज सेवी नहीं। मैं कई दफा इस बात का जिक्र कर चुका हूं। लेकिन उस वक्त किसी ने नोटिस नहीं किया। अब चूंकि प्रधानमंत्री ने ये बात कही तो यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। मैं आज भी अपनी सोच पर कायम हूं कि तीन तलाक गलत है और शाहबानो के केस को विधेयक के द्वारा पलटना एक गलत कदम था।

क्या अल्पसंख्यक तुष्टीकरण इस देश की राजनीतिक पार्टियों की परम्परा का हिस्सा हो गया है?
देखिये तुष्टीकरण मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हो रहा है, मुस्लिम समाज का नहीं। मैं आपको इसकी मिसाल दे सकता हूं। शाहबानो के फौरन बाद सलमान रुश्दी की किताब ‘ दी सैटेनिक वर्सेस’ को बैन किया गया। शहाबुद्दीन के खत पर उसे प्रधानमंत्री ने अगले ही दिन बैन कर दिया। न प्रधानमंत्री ने किताब पढ़ी थी और न ही शहाबुद्दीन ने। बैन करने का मतलब यह होता है कि किताब में कुछ ऐसा लिखा है जो पढ़ने देना नहीं चाहिए। ढाई महीने के बाद मैं खान मार्केट की किताब की दुकान पर गया। मैंने दुकानदार से पूछा कि अब तो यह किताब होगी नहीं, क्योंकि भारत वह पहला देश था जिसने इस किताब को बैन किया।
जवाब में उस दुकानदार ने कहा कि आप जितना चाहे उतनी मिलेगी, तो मैंने कहा यह तो बैन है। उसने कहा कि साहब बैन से पहले तो मैंने 7 कॉपी बेची थी। बैन के बाद 10 हजार कॉपियां बेची हैं। मैंने अगले दिन पार्लियामेंट में एक सवाल पूछा कि ‘दी सैटेनिक वर्सेज’ को कब और कितनी तारीख को प्रतिबंधित किया गया? और इसकी कितनी प्रतियां जब्त की गई? जवाब आया कि फला तारीख को प्रतिबंध लगाया गया और एक भी कॉपी जब्त नहीं की गई। अब आप बताइए किसका तुष्टिकरण इसे मानेंगे। यह पूरी तरह से धोखा है। अब सच्चर कमेटी की बात करते हैं। सच्चर कमेटी के अनुसार बंगाल में सबसे ज्यादा मुसलमानों का आंकड़ा खराब है और जहां तक गुजरात की बात है वहां सालों से बीजेपी की सरकार चल रही थी। लेकिन पूरे देश में मुसलमानों के सबसे सही और सबसे अच्छे आंकड़े वहीं हैं। यह फाइंडिंग सच्चर कमेटी की है। लेकिन अफसोस यह है कि कोई इसकी बात नहीं करता है।

गृह मंत्री कश्मीर का दौरा कर के आये है। अनुच्छेद 370 खत्म करने की भी बात की जा रही है। इस पर क्या कहेंगे?
यह अच्छी बात है। वह देश के गृह मंत्री हैं। उन्हें वहां जरूर जाना चाहिए। हालात को काबू करने के लिए जरूरी कदम भी उठाना चाहिए। जहां तक कश्मीर समस्या का हल है वह इंसानियत के दायरे में होना चाहिए। मैं तो यह कहता हूं की कश्मीरी खुद आगे आयें और समाज को लीड करें। खुद नेता बने और खुद ही अपनी समस्या का समाधान खोजें। जहां तक 370 का सवाल है मैं यह खुलकर हमेशा कश्मीरियों से कहता हूं कि यह तुम्हारे हक में नहीं है। यह अनुच्छेद आम आदमी की नहीं, सिर्फ कश्मीर के राजनैतिक और ब्यूरोक्रेटिक इस्टैब्लिशमेंट की रक्षा करता है। सारी समस्याओं की जड़ अनुच्छेद 370 है। मैं तो कहता हूं कि इसी से उनकी समस्याएं पैदा हुई हैं न कि यह सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन इन सब चीजों के लिए एक बड़े पैमाने पर सरकार को जागरुकता पैदा करनी होगी। क्योंकि उनके दिमाग में इतनी गंदगी भर दी गयी है भारत के खिलाफ कि वह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि सही क्या है और गलत क्या है।

कश्मीर समस्या की बुनियाद क्या है? यह इतने सालों से हल क्यों नहीं हो रहा?
पाकिस्तान बांग्लादेश को भूलने को तैयार नहीं है और साथ ही उन्हें एहसास है कि हिंदुस्तान से सीधी जंग नहीं लड़ सकते। इसलिए उसने गुरिल्ला युद्ध की नीति बनाई आज उसको टेररिज्म कहा जाता है। यह पाकिस्तान की आधिकारिक नीति है। जिसे ‘जिया उल हक’ ने मिलिट्री बेस में एलान किया था और यह बात सार्वजनिक भी हो गयी थी। उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान को इतने जख्म देने हैं कि वह घुट-घुट कर मरे। इसलिए मेरा यह मानना है कि जब समस्या अंदर है तब तो उससे निपटा जा सकता है। लेकिन जब चीजें बाहर से भेजी जा रही हों तो उस समस्या को नियंत्रित करने के लिए केंद्र का प्रभावी हस्तक्षेप जरूरी है। बाहरी अतिक्रमण को रोकने के साथ ही अपने लोगों का विश्वास भी जीतना जरूरी है। जैसे ही पाकिस्तान की उपस्थिति कश्मीर में कम होगी मुझे लगता है कि यह दो-तीन साल का मसला है जल्द ही हल हो जाएगा।

विपक्ष का कहना है कि बीजेपी की राजनीति एंटी मुस्लिम पिलर पर टिकी है, यह कहां तक सही है?
देखिए हमारे यहां तो नागरिक हैं ही नहीं। हमारे यहां तो हमेशा समुदाय की बात होती है। हम सिर्फ समुदाय की बात करते हैं। इसके पीछे का कारण भी साफ है। हमें किसी को अपना दुश्मन तो बनाना होगा। ताकि उस समुदाय का डर दिखाकर दूसरे समुदाय को अपनी बात मनवाई जाये। कुछ इसी तरह का काम आज की राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं। जहां तक आपका प्रश्न है यह सीधे तौर पर विपक्ष के द्वारा भय पैदा किया गया है। उन्होंने बीजेपी का डर दिखाकर बस अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी हैं। 2014 से पहले कोई साल ऐसा नहीं बीता जब कोई बड़ा दंगा न हुआ हो। लेकिन 5 सालों में कोई ऐसी घटना नहीं हुई है। जब लोग इस बात को देखेंगे समझेंगे तो इसी तरह से धीरे-धीरे उनमें विश्वास भी बढ़ेगा।

अनुच्छेद 370 आम आदमी का नहीं, सिर्फ कश्मीर के राजनैतिक और ब्यूरोक्रेटिक इस्टैब्लिशमेंट की रक्षा करता है। सारी समस्याओं की जड़ अनुच्छेद 370 है। मैं तो कहता हूं कि इसी से उनकी समस्याएं पैदा हुई हैं न कि यह सुरक्षा प्रदान करता है।

 मॉब लिंचिग के लिए बीजेपी की विचारधारा को दोषी ठहराया जा रहा है, इसमें कितनी सच्चाई है?
भारत सरकार में एडिशनल सेक्रेटरी रहे शम्सुर रहमान फारुकी ने एक लेख लिखा था। उसमें उन्होंने एक वाकये का जिक्र किया था। गोरखपुर में उनके पिता स्कूल आॅफ इंस्पेक्टर थे। एक बार जहां स्कूल की जांच करने गये थे, वहीं एक गाय के बछड़े के मरने की अफवाह पर लोगों ने उन्हें जमकर पीटा और मरा हुआ समझ कर चले गये। अब आप सोचिए उस समय के एमएलए जो उनके ससुर थे ने अपनी ही सरकार को खत लिखा कि उन्हें फील्ड से हटाकर आॅफिस की ड्यूटी दे दी जाये। लेकिन जवाब में किसी ने एक हमदर्दी का खत भी नहीं लिखा। सवाल है कि उस समय तो बीजेपी नहीं थी। पावर में कांग्रेस थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जो आज हो रहा है मैं उसका बचाव कर रहा हूं। जो आज हो रहा है वह भी गलत है और जो कल हुआ वह भी गलत था। वैसे इन घटनाओं की नींव 86 में ही पड़ गई थीं जब कट्टरपंथियों के आगे झुककर कांग्रेस ने देश को फिर से 1947 में ढकेल दिया था। इसलिए मुझे यह कहने का अधिकार है कि आप आज परेशान हो और मैं 1986 से ही परेशान हूं।


 
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