सांगीतिक सफरनामे की कहानी


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सांगीतिक सफरनामे की कहानी

मनोज मोहन

हिंदी में फिल्मी हस्तियों की जीवनियों की कमी है। विशेषत: वैसी हस्तियों की जिनकी स्टार वैल्यू थोड़ी कम हो। दास्तान-ए-नौशाद संगीतकार नौशाद की आत्मकथा है, जिसमें उनकी जीवन-यात्रा और उनके सांगीतिक सफरनामा की रोचक जानकारी है। उन्होंने भारतीय संगीत को हिंदी फिल्म संगीत के लोकप्रिय दायरे में कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। लंदन के मशहूर मनोवैज्ञानिक रहे डॉ. निकोल कहते हैं कि हिंदुस्तानी संगीतकारों से ही पश्चिम के संगीतकारों को यह हासिल है कि वे अपना मानसिक यानी दिमागी संतुलन बनाए रखते हुए अपना मानसिक स्वास्थ्य को बचाकर ख्याति और कीर्ति के शिखर पर टिके रहें। यह दुर्भाग्य का विषय है कि भारत में मृत्यु के बाद भले भारतीय संगीतकारों की यादों में स्मारक बनवा दिए जायें, लेकिन उनके संगीत का मानस पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस बारे में कोई गहन परीक्षण कभी संभव नहीं हो सका है।

एक मजहबी परिवार में जनमें नौशाद को बचपन से ही संगीत में रुचि रही। अपने मामा के साथ वारिस शाह के उर्स में जाने के बाद संगीत के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता ही चला गया। पिता के विरोध के बावजूद संगीत का सफर जारी रहा। हारमोनियम बजाने की चाह में उन्होंने एक दुकान पर नौकरी कर ली थी, जहां पर वे दुकान के वाद्ययंत्रों की साफ-सफाई करते और फिर एक हारमोनियम पर धुन की रियाज करने लग जाते। एक दिन उस्ताद की नजर पड़ी तो उनकी तल्लीनता देख वह हारमोनियम उन्हें उपहार में दे दिया। आगे जाकर उस्ताद बब्बन खां से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की तालीम ली। अंतत: अहमदाबाद के आदिल साहब के यह कहने पर कि तुम्हें संगीत की दुनिया में अपना नाम कमाना है, तो तुम मुंबई जाओ, और वे मुंबई आ गए। मुंबई में भी काफी  संघर्ष करने के बाद उनको प्रेमनगर फिल्म में पार्श्व संगीत देने का मौका मिला। यह उनकी पहली फिल्म थी। उस पहली फिल्म में संगीत देने के 64 साल बाद तक वे अपने साज का जादू बिखेरते रहने के बावजूद न केवल 67 फिल्मों में ही संगीत दिया। उनका कौशल इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि गुणवत्ता संख्याबल पर भारी है।

पुस्तक: दास्तान-ए-नौशाद

लेखक: शशिकांत किणीकर

अनुवादक: शशि निघोजकर 

प्रकाशन: अनन्य प्रकाशन, नवीन शाहदरा, दिल्ली

मूल्य: 300 रुपये

दास्तान-ए-नौशाद में के.एल. सहगल के बारे में नौशाद साहब कहते हैं कि वे बड़े गायक और फनकार तो थे ही, साथ ही बहुत अच्छे इंसान भी थे। सहगल साहब बिना काली पॉच लिए शाहजहां फिल्म में  गाना गाया थादृ जब दिल ही टूट गया। हम जी के क्या करेंगे। इस गाने के बारे में खुद सहगल साहब ने अपनी वसीयत में लिखा था कि यह गाना उनके जनाजे में बजाया जाए। और ऐसा किया भी गया। फिल्मी दुनिया में मुगले आजम और के. आसिफ के कई किस्से किंवदंती की तरह मशहूर रहे है। नौशाद साहब के आसिफ के बारे में फिल्म के फाइनेंसर शापूर सेठ की राय दर्ज करते हैं- वह बहुत ईमानदार आदमी है। उसके हाथों फिल्म पर एक करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। लेकिन उसने सारा पैसा फिल्म में ही लगाया। उसकी जगह और कोई दूसरा होता तो दस-बीस लाख रुपये आसानी से दबा जाता, लेकिन वह खुद चटाई पर सोता है… मैंने उसकी डायरेक्शन का मेहनताना दिया तो उसने जरूरतमंद दोस्तों में बांट दिया। ऐसे कई सच्चे वाकयात आत्मकथा में दर्ज हैं।

इस आत्मकथा की एक और खूबी है कि नौशाद खुद को जज्बाती होने से बचा ले गए हैं। इस किताब पर दिलीप कुमार ने मेरे अजीज…नौशाद साहब शीर्षक भूमिका में मानते हैं कि तारीफ-ए-काबिल बात तो यह है कि शशिकांत किणीकर ने मराठी में यह पहली किताब लिखी है और उसका हिंदी में तजुर्मा शशि निघोजकर ने किया है। मेरे ख्याल से यह भी राष्ट्रीय एकात्मकता की एक नजीर है, जो न कभी देखी-सुनी जाती है और उसका जानबूझकर भी प्रचार नहीं किया जाता है। लखनऊ में जनमें नौशाद साहब अपनी कर्मभूमि मुंबई को तरजीह देते हुए कहते हैं कि अल्लाह की मेहरबानी से ही मेरे दिल में संगीत के लिए दिलचस्पी पैदा हुई और मुझे संगीत का दीवाना बना दिया। मुझे मेरी मंजिल की राह बताई और लखनऊ से सैकड़ों मील दूर महाराष्ट्र में आने का हौसला अता फरमाया। और इसी मुंबई का कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने अंतिम दिनों में नौशाद अकादमी ऑफ हिंदुस्तानी संगीत स्थापित किया। ४४४



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