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सोचिए कि भूमि बंजर क्यों हो रही है

15/10/2019

सोचिए कि भूमि बंजर क्यों हो रही है


वाब है पहले उस जमीन को खोदा जाएगा, चूंकि वह बंजर है इसलिए ज्यादा खोदना पड़ेगा, शायद कार्बन लेयर से भी नीचे, फिर भूमिगत जल से उसे हराभरा किया जाएगा। वैसे कितना भी गहरा खोद लें पानी मिलने की संभावना क्षीण है क्योंकि जमीन के नीचे पानी होता तो यह जगह बंजर ही क्यों होती। ज्यादा संभावना वाला उपाय यह है कि किसी नदी से नहर लाकर इस बंजर भूमि को उपजाऊ बनाए जाए। लेकिन नदी, नहर हो या कुंआ पानी अकेले सफर नहीं करता। उसके साथ एक पूरा पर्यावरणीय चक्र होता है और उसकी अपनी एक संस्कृति होती है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधिता और भूमि क्षरण जैसी विकराल समस्याओं को तब तक नहीं समझा जा सकता जबतक बहते पानी की संस्कृति समझ ना आए। अबतक सरकारें गंगा की संस्कृति को ही नहीं समझ सकी तो किसी नहर की संस्कृति को क्या समझेंगी।

जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और भूमि क्षरण जैसी विकराल समस्याओं को तब तक नहीं समझा जा सकता जबतक बहते पानी की संस्कृति समझ ना आए। अबतक सरकारें गंगा की संस्कृति को ही नहीं समझ सकी तो किसी नहर की संस्कृति को क्या समझेंगी।

गंगा एक उथली हुई नदी है और तेजी से जमीन को काट रही है। यानी जमीन लगातार नदी का हिस्सा बन रही है, इसका कारण है फरक्का और उसके जैसे दूसरे बैराज और तटबंध। बैराज के कारण गाद आगे नहीं बढ़ पाती और थम जाती है जिससे नदी की गहराई कम होती है और पानी किनारों की तरफ भागता है और खेतों को लील लेता है। विडंबना देखिए जो गाद अब तक खेतों में नई जान फूंक देती थी वही गाद अब कटाव का कारण बन रही है। बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने की कोशिश ठीक है लेकिन एक नजर उन कारणों पर भी डाली जानी चाहिए जिनकी वजह से उपजाऊ भूमि बंजर होती जा रही है। सरदार सरोवर के बैक वाटर वाले हिस्से ने कितनी ही उपजाऊ जमीन को लील लिया और जहां-जहां नहरे टूटी हैं वहां की जमीन लगातार दलदली होती जा रही है। बांध, बैक वाटर, नहर और दलदल यह एक लंबी चेन है जो देश के तकरीबन हर इलाके में देखी जा सकती है।

बानगी देखिए – पचास के दशक में हिमालय के पानी को राजस्थान के मरुस्थल तक लाने की योजना बनी। कमाल की इंजीनियरिंग थी और राजस्थान नहर (इंदिरा गांधी की मौत के बाद इस नहर का नाम इंदिरा गांधी नहर कर दिया गया) का निर्माण तेजी से हो रहा था। तब तालाब के रूप में पानी को सहजने की समझ रखने वाले अनुभवी लोगों ने सरकार से कहा कि गोचर भूमि (पालतु पशुओं का सार्वजनिक चारागाह) को अलग रखा जाए क्योंकि गोचर भूमि बंजर भूमि नहीं होती, साथ ही पशु और खेत को अलग करने नहीं देखा जा सकता। उन्होने यह भी कहा कि नहर के रास्ते में यह भी देखा जाना चाहिए कि जमीन पानी को सोख क्यों नहीं रही। लेकिन जैसा कि होता है, अनुभव पर यकीन डिग्री का अपमान है। गोचर भूमि को खत्म कर उसके ऊपर ही इस विशाल नहर का निर्माण किया गया।

वर्तमान में हालात यह है कि नहर के किनारे कई जगह खेती पनप नहीं पा रही। और पेड़ जले हुए साफ नजर आते हैं (रावतसर हनुमानगढ़, सूरतगढ़)। हुआ ये कि जिन जगहों से नहर निकाली गई उनमें कई स्थानों पर जमीन के नीचे जिप्सम की चट्टानें थी जिससे पानी नीचे की ओर रिस नहीं पाया और जिप्सम के साथ रसायनिक क्रिया कर आसपास की जमीन और वनस्पति को पूरी तरह जला दिया। यह बताने का उद्देश्य इंदिरा गांधी नहर की आलोचना करना कतई नहीं है, इसमें कोई शक नहीं कि नहर ने राजस्थान के सुदूर क्षेत्रों का जीवन बदला है। राजीव गांधी ने देश का परिचय यूकेलिप्टस से कराया। वन महोत्सव के नाम पर लाखों -करोड़ों यूकेलिप्टस रोपे गए। इन पेड़ों ने इतना पानी सोखा कि आसपास की भूमि को बंजर ही बना दिया। इसी तरह सभी प्रधानमंत्रियों ने गन्ने की खेती को हतोत्साहित करने के बजाए उसे वोटों के लिए बढ़ावा ही दिया।

गन्ना वास्तव में दलदली इलाके में होने वाली फसल है। जिसमें पानी बहुत ज्यादा लगता है। प्रधानमंत्री मोदी ने सैकड़ो तलाबों को पुनर्जीवित करने का प्रण दोहराया है। लेकिन क्या इसकी शुरुआत दिल्ली से की जा सकती है। क्योंकि दिल्ली की जमीन तेजी से बंजर हो रही है। पड़ोसी राज्य हरियाणा अरावली को नंगा कर रहा है जिससे धूल और रेतीली भरी आंधियां दिल्ली में दस्तक दे रही हैं। यही कारण है कि दिल्ली में बारिश भी कम हो रही है और मिट्टी की नमी गायब हो रही है। मरुस्थलीकरण की चुनौती सीएससी यानी सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट के आंकड़े से साफ नजर आती है- पिछले साल सिर्फ अप्रैल और मई में करीब 50 धूल भरी आंधियां चली जिसमें तकरीबन 500 लोगों की जाने गई।


 
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