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विभागों के पुनर्गठन पर चर्चा टालने का मतलब

07/07/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'
उत्तर प्रदेश में योगी मंत्रिमंडल में फेरबदल को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। बताया जा रहा है कि योगी मंत्रिमंडल में बदलाव तो इसी माह होगा लेकिन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और विभागों के पुनर्गठन के बाद। विभागीय अधिकारियों के जिस तरह ताबड़तोड़ तबादले हो रहे हैं। भ्रष्ट अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत्त किया जा रहा है। उन्हें कुछ इस तरह दंडित किया जा रहा है कि वे भविष्य में कभी भी प्रोन्नति आदि का लाभ न प्राप्त कर सकें। भ्रष्टाचार के खिलाफ इस तरह के कड़े और बड़े निर्णय बहुत पहले ही लिए जाने चाहिए थे लेकिन 'जब जागे तभी सबेरा।'
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद मंत्रिमंडल में जल्द फेरबदल के संकेत दिए थे। रीता बहुगुणा जोशी जैसे कुछ मंत्रियों के सांसद बन जाने के बाद यह जरूरी हो गया है कि उत्तर प्रदेश में जल्द मंत्रिमंडल का विस्तार हो लेकिन योगी की कैबिनेट ने जिस तरह विभागों के पुनर्गठन संबंधी प्रस्ताव पर अपनी असहमति जताई है, उससे इस प्रदेश के बौद्धिक तबके का चिंतित होना स्वाभाविक ही है। मंत्री विभागों के पुनर्गठन का विरोध कदाचित इसलिए भी कर रहे हैं कि अगर ऐसा होगा तो निश्चित रूप से उनके अधिकार कम होंगे और कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार घटते देखना बर्दाश्त नहीं कर पाता। यह मानव स्वभाव है। उत्तर प्रदेश के मंत्री इसका अपवाद कैसे हो सकते हैं? 
अभी प्रदेश में 95 विभाग हैं, जिन्हें घटाकर 57 किए जाने की बात बहुत पहले कही गई थी लेकिन योगी मंत्रिमंडल के समक्ष जो प्रस्ताव आया, उसमें विभागों की संख्या 44 होनी थी। यही वजह है कि चर्चा में इसे स्वीकृति नहीं मिल पाई। अब इसके लिए मुख्य सचिव या किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की अध्यक्षता में न केवल समिति गठित होगी बल्कि विभागों के पुनर्गठन प्रस्ताव को नये सिरे से पेश किया जाएगा। इस प्रस्ताव पर चर्चा जिन किन्हीं कारणों से न हो पाई हो लेकिन सम्मानित मंत्रियों को राजतंत्रीय व्यवस्था पर भी जरा गौर कर लेना चाहिए। किसी भी राजा का एक प्रधानमंत्री होता था। जिसे महामात्य कहा जाता था। इसके बाद 6 या 7 मंत्री होते थे, जिन्हें सचिव और अमात्य कहा जाता था। किसी-किसी राज्य में यह संख्या 11 तक होती थी लेकिन इससे अधिक नहीं होते थे। मगध राज्य बिहार से लेकर अफगानिस्तान तक फैला था लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन की व्यवस्था आज से खराब नहीं थी। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय की श्रेणी का एक शिक्षण संस्थान अगर भारतीय लोकतंत्र में नहीं है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? राजतंत्र में जब राजा न्याय करता था तो निर्णय अविलंब हो जाते थे। आज भारी भरकम फौज के बाद भी मामले वर्षों लटके रहते हैं, विचार तो इसपर भी किया जाना चाहिए।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने 10 मई, 2017 को अपने लखनऊ आगमन पर पुनर्गठन की सलाह दी थी। इसके बाद इस पर अमल करने के लिए स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह की अध्यक्षता में ज्वाइंट वर्किंग कमेटी बनाई गई थी। अपर मुख्य सचिव माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा संजय अग्रवाल की अध्यक्षता में गठित समिति ने सचिवालय स्तर पर राज्य सरकार के विभागों की संख्या को 95 से घटाकर 57 करने की सिफारिश की। समिति ने जहां 31 विभागों का स्वरूप यथावत बनाये रखने का सुझाव दिया है, वहीं महकमों के प्रस्तावित विलय के बाद 24 नए विभाग सृजित करने की संस्तुति की है। श्रम और खाद्य एवं रसद विभाग के क्षेत्राधिकार को कम करने की सिफारिश की गई है। समिति ने शासन स्तर पर शिक्षा आयुक्त, स्वास्थ्य आयुक्त और राजस्व संसाधन आयुक्त के तीन नए पद गठित करने का भी प्रस्ताव दिया है। अभी शासन स्तर पर समाज कल्याण आयुक्त, कृषि उत्पादन आयुक्त और अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त के पद सृजित हैं। बैठक में यह सुझाव भी आया कि बेसिक और माध्यमिक शिक्षा जैसे विभाग अलग-अलग ही रखे जाएं लेकिन फिर इन्हें एक छतरी के नीचे लाने पर सहमति बनी।
नीति आयोग की पहल पर शुरू हुई विभागों के पुनर्गठन की इस कवायद पर निचले स्तर के राज्य कर्मचारियों से लेकर सरकार के मंत्रियों तक की निगाहें लगी हैं। सरकार भी इस मामले में बेहद गोपनीयता बरत रही है। चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास, सहकारिता, सिंचाई एवं जल संसाधन, राजस्व, भूतत्व एवं खनिकर्म, लोक निर्माण, परिवहन, बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण, समाज कल्याण, आयुष, चिकित्सा शिक्षा, पिछड़ा वर्ग कल्याण, दिव्यांगजन सशक्तीकरण, अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ, वित्त, स्टांप एवं पंजीकरण, सूचना, आबकारी, सतर्कता, सार्वजनिक उद्यम, कारागार प्रशासन एवं सुधार, निर्वाचन, सचिवालय प्रशासन, न्याय, संसदीय कार्य, विधायी, विधान परिषद सचिवालय, विधान सभा सचिवालय, मुख्यमंत्री कार्यालय को यथावत रखने की संस्तुति की गई है। जबकि श्रम विभाग से सेवायोजन को अलग करते हुए व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास में शामिल करने की संस्तुति की गई है। खाद्य एवं रसद विभाग से उपभोक्ता संरक्षण तथा बाट एवं माप को पृथक कर खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में समाहित करने की सिफारिश की गई है।
विलय की वजह से प्रस्तावित 24 नए विभागों में कृषि, कृषि विपणन एवं कृषि विदेश व्यापार, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान और समन्वय को रखा गया है। उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण, रेशम विकास के कार्य की प्रकृति को देखते हुए उनके परस्पर विलय का प्रस्ताव दिया गया है। लघु सिंचाई एवं भूगर्भ जल, परती भूमि विकास विभाग एक-दूसरे से परस्पर मिलते हैं इसलिए उन्हें अलग-अलग विभाग बने रहने देने का वैसे भी कोई औचित्य नहीं है। पशुधन, मत्स्य, दुग्ध विकास और वन एवं वन्य जीव, पर्यावरण विभाग की कार्य संस्कृति भी एक जैसी है। ऐसे में अलग-अलग रूप में इन्हें बने रहने देने पर सरकार पर अनावश्यक व्यय भार बढ़ता है। ग्राम्य विकास, समग्र ग्राम्य विकास, ग्रामीण अभियंत्रण सेवा, पंचायती राज देखा जाए तो इनकी अलग-अलग जरूरत नहीं थी लेकिन अपनों को उपकृत करने के लिए इन्हें अलग-अलग रखा गया। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग तथा निर्यात प्रोत्साहन, खादी एवं ग्रामोद्योग, हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग ये सभी उद्योग से संबद्ध हैं, ऐसे में इन्हें एक विभाग में तब्दील करने का निर्णय उचित ही है।
अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास, निजी पूंजी निवेश, एनआरआई, मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग में शब्दों का हेरफेर हो सकता है लेकिन उनकी कार्य संस्कृति और प्रकृति इस बात की इजाजत नहीं देती कि इन्हें अलग-अलग रखा जाए। आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को एक विभाग बहुत पहले बना दिया जाना चाहिए था। यही हालत ऊर्जा, अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत विभाग की है। राज्य संपत्ति, नागरिक उड्डयन व प्रोटोकॉल विभाग को एक करने का निर्णय सराहनीय है। नगर विकास, नगरीय रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन, आवास एवं शहरी नियोजन परस्पर मिलते-जुलते विभाग हैं, इनके विलय पर किसी भी तरह की आपत्ति का औचित्य समझ से परे हैं। खेलकूद, युवा कल्याण, व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास, उच्च शिक्षा, प्राविधिक शिक्षा, सेवायोजन ही नहीं, पर्यटन, संस्कृति, भाषा, धर्मार्थ कार्य विभाग को एक कर बेहतर कार्य किया जा सकता है।
खाद्य एवं औषधि प्रशासन, उपभोक्ता संरक्षण तथा बांट एवं माप, महिला कल्याण, बाल विकास एवं पुष्टाहार, संस्थागत वित्त एवं बैंकिंग, वाह्य सहायतित परियोजना, कर एवं निबंधन, मनोरंजन कर एवं बाजीकर, वाणिज्य कर को क्रमश: एक करने से न केवल विभागीय खर्च घटेगा बल्कि उसकी उचित निगरानी भी हो सकेगी। सोचने वाली बात यह है कि गृह और गोपन विभाग को अलग-अलग क्यों रखा जाए? होमगार्ड्स तथा नागरिक सुरक्षा, राजनीतिक पेंशन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रकोष्ठ पर भी कमोवेश यही नियम लागू होता है। सामान्य प्रशासन, उत्तर प्रदेश पुनर्गठन समन्वय, प्रशासनिक सुधार, लोक सेवा प्रबंधन, राष्ट्रीय एकीकरण के नेचर एक से हैं, ऐसे में उनके विलय का प्रस्ताव उचित ही है। कार्मिक, नियुक्ति को बहुत पहले एक करना चाहिए था। नियोजन, कार्यक्रम कार्यान्वयन का विलय भी सही निर्णय है। जिन तीन आयुक्तों की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया गया हैं, उनमें क्रमश: शिक्षा आयुक्त को बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, खेलकूद एवं युवा कल्याण, व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास, उच्च शिक्षा, प्राविधिक शिक्षा, सेवायोजन, स्वास्थ्य आयुक्त को चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, उपभोक्ता संरक्षण तथा बांट एवं माप, आयुष, महिला कल्याण, बाल विकास एवं पुष्टाहार तथा राजस्व संसाधन आयुक्त को भूतत्व एवं खनिकर्म, परिवहन, संस्थागत वित्त/बैंकिंग, वाह्य सहायतित परियोजना, कर एवं निबंधन, मनोरंजन कर एवं बाजीकर,वाणिज्य कर, आबकारी विभाग की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव है। सरकार के इन प्रस्तावों पर अगर अमल होता है तो विभागीय जवाबदेही इन तीन आयुक्तों पर तय होगी। पहले से सृजित आयुक्त पदों पर विराजित अधिकारियों पर होगी। इससे शासन में जहां सुधार दिखेगा, वहीं सरकारी जन हितकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी तेजी आएगी।
गौरतलब है कि दो साल से इस तरह की पहल हो रही है और अभी तक अंजाम तक नहीं पहुंच पाई। अभी वह केवल प्रस्ताव की शक्ल ले पाई है। विभागों की पुनर्गठन समिति तो गत वर्ष ही मुख्यमंत्री को अपनी संस्तुतियां सौंप चुकी थी। सीएम ने अब इस पर अमल का निर्देश दिया है। प्रस्तावित पुनर्गठन केवल सचिवालय स्तर तक सीमित रहेगा। निदेशालय व फील्ड में सेवा संवर्गों की अलग-अलग समस्याएं होती हैं। पुनर्गठन से वहां कुछ विसंगतियां आ सकती हैं। ऐसे में शासन स्तर पर विभागों के पुनर्गठन के बाद विभागाध्यक्ष व फील्ड स्तर पर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद ही अग्रिम कार्यवाही मुमकिन है।
शासन स्तर पर आयुक्त प्रणाली लागू करने का सुझाव काबिले तारीफ है। उत्तर प्रदेश में सरकारी विभागों के पुनर्गठन और समान कार्य प्रकृति वाले विभागों के परस्पर का विचार पुराना है लेकिन उस पर अमल अब होने की नौबत आई है। उन विभागों के लिए सचिवालय, निदेशालय और कर्मचारियों, अधिकारियों पर निरर्थक रूप से कितना व्यय होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। पुलिस महकमे में ही दर्जन भर विभाग बन गए हैं, इस विसंगति से यथाशीघ्र उबरे जाने की जरूरत है। एक दौर ऐसा भी आया कि उत्तर प्रदेश में मंत्रियों की संख्या 100 से ऊपर हो गई थी। उन्हें काम मिले, हस्ताक्षर करने को मिले, इस लिहाज से विभागों में तोड़-फोड़कर ढेर सारे विभाग सृजित किए गए। इससे सरकारी धन की बर्बादी तो हुई ही, काम का माहौल भी खराब हुआ। विकास कार्यों की शुचिता और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हुए। जंबो मंत्रिमंडल से अगर कार्य में सहूलियत होती हो, प्रशासनिक ढांचा मजबूत होता हो तो बात कुछ और है लेकिन यहां तो हालात बिगड़े ही नजर आते हैं।
नीति भी कहती है कि जिस मठ में ज्यादा साधु होते हैं, उस मठ की व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। जनता की खून-पसीने की कमाई का महत्व समझा जाना चाहिए और उसका बेवजह दुरुपयोग न हो, इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए। समान प्रकृति वाले विभागों से जुड़े निगमों आदि को भंग किया जाना चाहिए और विलय हुए विभागों के कर्मचारियों का ऐसी जगह समायोजन किया जाना चाहिए जहां वे लोकहित के काम आ सकें। प्रदेश के लिए, विभाग के लिए प्रभावी एसेट बन सकें। मंत्रियों के व्यक्तिगत हित से ऊपर है देशहित, जबतक इस पर गौर नहीं होगा, देश की अर्थव्यवस्था को घुन लगता रहेगा।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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