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कठिन है कांग्रेस की डगर

05/10/2019

कठिन है कांग्रेस की डगर

संजय वर्मा

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। यहां सत्ता पक्ष भारतीय जनता पार्टी जहां पूरे उत्साह में है, वहीं विपक्षी पार्टियां फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं।

निर्वाचन आयोग ने हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित कर दी है। 21 अक्टूबर को दोनों ही राज्यों में चुनाव होंगे और 24 अक्टूबर को मतगणना होगी। चुनावों में जिस तरह से कुछ दिनों के अंदर ही माहौल बदल जाता है, उसके मद्देनजर अभी से ही विजेता की घोषणा करना जल्दबाजी होगी। इन दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस ने बहुत लंबे समय तक राज किया है, लेकिन 2014 के बाद से पार्टी लगातार ही कमजोर होती गई। हरियाणा में इसकी वजह प्रदेश के नेताओं के आपसी हितों का टकराव रहा है जबकि महाराष्ट्र में कांग्रेस को लगातार ही अपने प्रमुख नेताओं के पार्टी छोड़ने से मिलने वाले झटकों का सामना करना पड़ा है।
यही कारण है कि कांग्रेस इन भाजपा शासित प्रदेशों में आमतौर पर नजर आने वाले एंटी इंकंबेंसी फैक्टर का लाभ लेने में विफल प्रतीत हो रही है। 2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद से हरियाणा में कांग्रेस लगातार ही नेताओं के आपसी झगड़े की शिकार रही है। इस घरेलू संघर्ष के मुख्य खिलाड़ी पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंद्र सिंह हुड्डा रहे हैं। 2014 विधानसभा चुनाव के टिकट आवंटन के समय से ही तंवर के साथ हुड्डा की खटपट शुरू हो गई थी। दिल्ली की किसान रैली में तंवर के साथ हुई मारपीट ने आग में घी डालने का काम किया था।
इसके बाद तंवर हुड्डा के धुर विरोधी हो गए। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री वंशीलाल की पुत्रवधु किरण चौधरी विधानसभा चुनावों के बाद विधायक दल की नेता बनने में कामयाब रही थीं। लेकिन उनकी भी हुड्डा से कभी नहीं बनी। इसकी एक वजह ये थी अधिकतर कांग्रेसी विधायक हुड्डा के ही समर्थक थे और उन्होंने किरण चौधरी को कभी भी अपना ेता नहीं माना और हुड्डा के प्रति ही वफादार बने रहे।
उनके समर्थन के बूते ही हुड्डा आलाकमान को अपनी शर्तों के आगे झुका पाने में सफल रहे। एक बार तो हालात कुछ ऐसे बन गए थे कि लगा हुड्डा पार्टी ही छोड़ देंगे। उन्होंने रोहतक में एक विशाल रैली का आयोजन कर अपनी ताकत दिखाई और अनुच्छे 370 के मुद्दे पर अपनी ही पार्टी के खिलाफ जमकर हमला बोला। लेकिन इसके पीछे का मकसद यही था कि वह प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को कुर्सी से हटा सके और किरण चौधरी के स्थान पर खुद विधायक दल के नेता बनना चाहते थे। राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने और सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने का भी हुड्डा को फायदा मिला। सोनिया गांधी की एक और करीबी कुमारी शैलजा का अशोक तंवर के स्थान पर प्रदेश अध्यक्ष बनना और खुद हुड्डा का विधायक दल का नेता बनना जाहिरतौर पर उनकी जीत है।


अब यह तय हो गया है कि विधानसभा चुनाव उनके इर्द-गिर्द ही लड़े जाएंगे। अब समस्या यह है कि चुनाव से ठीक पहले संगठन में हुए इस बड़े बदलाव को अगर हुड्डा विरोधी खेमे ने अंदरखाने स्वीकार नहीं किया तो कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भितरघात का सामना करना पड़ सकता है। तंवर और किरण चौधरी को बदले जाने से जाहिर तौर पर उनके समर्थकों में निराशा है। ऐसे में तंवर व किरण चौधरी खेमे को चुनाव में पूरे उत्साह के साथ उतारना कुमारी शैलजा और हाईकमान के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
कांग्रेस नेतृत्व ने राज्य की जनता के समक्ष दलित नेता के तौर पर कुमारी शैलजा और जाट नेता के तौर पर हुड्डा को पेश किया है। दरअसल हरियाणा में पहले 2014 के लोकसभा चुनाव, फिर विधानसभा चुनाव और अब 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली है। इन पांच सालों में राज्य के बदले जातीय समीकरणों के बीच पार्टी जाट-दलित मतों के मेल को विधानसभा चुनाव में जीतने की कुंजी मान रही है। हाल ही में बसपा और भारतीय राष्ट्रीय लोक दल (आईएनएलडी) से अलग होकर दुष्यंत चौटाला की अगुआई में बने जननायक जनता पार्टी (जजपा) के बीच के चुनाव पूर्व गठबंधन के टूट जाने के बाद हुड्डा की मायावती के साथ बंद कमरे में एक बैठक भी हुई थी जिसमें कुमारी शैलजा भी उपस्थित थीं।
जाहिर तौर पर इसके पीछे दलित मतों में विभाजन रोकने का मकसद ही है। उधर महाराष्ट्र में कांग्रेस और वर्षों से उसकी सहयोगी रही राकांपा की बुरी हालत है और दोनों ही दल बड़े पैमाने पर हुए दलबदल के झटकों से उबर नहीं पाए हैं। इतनी तादाद में ऐसा पलायन महाराष्ट्र में कभी नहीं हुआ। सवाल यह है कि क्या पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे फिर से महाराष्ट्र के चुनाव में भी दोहराए जाएंगे या फिर कांग्रेस और एनसीपी, बीजेपी और शिवसेना के सामने कोई चुनौती खड़ी करेंगे? क्या स्थानीय मुद्दे और जातिगत समीकरण इस साल के चुनावों पर असर डालेंगे या फिर देश में चल रही राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की हवा महाराष्ट्र का रुख तय करेगी? पिछले पांच सालों में राज्य में हुए लगभग सभी चुनावों में बीजेपी और शिवसेना जीतते रहे हैं और अभी भी उनका ही पलड़ा भारी नजर आ रहा है। कांग्रेस से कई कद्दावर नेता सत्तापक्ष का रुख कर चुके हैं और पार्टी को उसके ही नेताओं के अलग-अलग गुटों ने कमजोर किया है।
चुनाव से कुछ ही महीने पहले ही कांग्रेस को बालासाहेब थोरट के रूप में नए अध्यक्ष मिले हैं। 66 वर्षीय थोरट किसान नेता हैं जो कि कॉपरेटिव आंदोलन से जुड़े रहे हैं और मंत्री पद भी संभाल चुके हैं। उन्हें अशोक चव्हाण के स्थान पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है, जिन्होंने लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया था।

चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस संगठन में हुए बड़े बदलाव को अगर हुड्डा विरोधी खेमे ने अंदरखाने स्वीकार नहीं किया तो कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भितरघात का सामना करना पड़ सकता है।

मुंबई कांग्रेस का अभी तक कोई अध्यक्ष नहीं है। एकनाथ गायकवाड एक्टिंग प्रेसिडेंट का दायित्व संभाल रहे हैं। नितिन राउत, बासवराज एम. पाटिल, विश्वजीत कदम, यशोमती चंद्रका ठाकुर और मुजμफर हुसैन को कार्यकारी अध्यक्ष का पद दिया गया है। भाजपा में शामिल हो गए विखे पाटिल के स्थान पर के. सी. पदावी कांग्रेस विधायक दल के नेता बनाए गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया की अध्यक्षता में स्क्रीनिंग कमेटी बनाई गई है जिसके अन्य सदस्य हैं हरीश चौधरी और मनीकम टैगोर। मल्लिकार्जुन खड़गे राज्य के प्रभारी महासचिव हैं। बेहतर चुनाव प्रबंधन के लिए कुछ वरिष्ठ नेताओं को अलगअलग क्षेत्रों का दायित्व सौंपा गया है।
मुकुल वासनिक को विदर्भ, अविनाश पांडेय को मुंबई, रजनी पटेल को पश्चिमी महाराष्ट्र और कोंकण, आर. सी. खुंटिया को उत्तरी महाराष्ट्र और राजीव साटव को मराठवाड़ा क्षेत्र का प्रभार सौंपा गया है। राज्य की कुल 288 सीटों में से 125 पर कांग्रेस और 125 पर ही राकांपा अपने उम्मीदवार उतारेंगे। 40 सीटें छोटे दलों के लिए छोड़ी गई हैं जिनमें समाजवादी पार्टी, स्वाभिमानी शेतकरी संगठन और सीपीआई जैसे दल शामिल हैं। कांग्रेस और राकांपा ने भले ही 125-125 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने पर सहमति जता दी है, लेकिन शरद पवार की पार्टी की राज्य के सभी 36 जिलों में प्रतिनिधित्व की मांग से दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे में नया पेंच फंसा हुआ है।
हालांकि, दोनों दलों के नेताओं का कहना है कि जल्द ही इस बारे में फैसला कर लिया जाएगा। दोनों दलों के पास एक साथ लड़ने के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं क्योंकि 2014 के विधान सभा चुनावों में जब दोनों ने अपने-अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, तो उन्हें बस 42 और 41 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।


 
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