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सिनेमा व सिरीज और संवेदना का सवाल

01/10/2019

सिनेमा व सिरीज और संवेदना का सवाल

प्रकाश के रे

फिल्मकारों पर भी समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाने की नैतिक जिम्मेदारी होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी परोसने से पहले समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का स्वमूल्यांकन भी जरूरी है।

हमारे समाज में महिलाओं के बलात्कार और यौन शोषण की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सिनेमा के साथ अब इंटरनेट पर विभिन्न प्लेटफार्मों पर चल रही सिरीजों पर भी आरोप लग रहा है कि उनके चित्रण ने भी ऐसे अपराधों को बढ़ाने में भूमिका अदा की है। हर मुद्दे की तरह इस सवाल पर भी कोई आखिरी बात कह पाना संभव नहीं है। अश्लीलता या अपसंस्कृति को बढ़ावा देने के लिए फिल्मों को शुरुआत से दोष दिया जाता रहा है, लेकिन बलात्कार के दृश्य को लेकर सबसे पहली बड़ी बहस 1980 में बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ पर हुई। हिंदी सिनेमा के इतिहास में शायद यह पहली फिल्म थी जिसमें बलात्कार को केंद्रीय विषय बनाया गया था।
इसमें समाज की नैतिक गिरावट और भ्रष्टाचार तथा पुलिस और न्यायिक तंत्र की बेईमानी की ओर इंगित किया गया था। लेकिन फिल्म में जिस तरह से दो लंबे बलात्कार के दृश्यों को दिखाया गया था, उस पर प्रदर्शन का प्रमाणपत्र देनेवाली संस्था को भी आपत्ति थी और सार्वजनिक बहसों में भी सवाल उठाये गये। कुछ दृश्यों को काटने के बाद ही फिल्म को मंजूरी मिली थी। आलोचकों ने लिखा कि ये दृश्य लोगों में उत्तेजना पैदा कर मुनाफा कमाने की नीयत से डाले गये हैं। बॉक्स आॅफिस पर फिल्म ने न सिर्फ खूब कमाई की, बल्कि उसने इसी विषय पर कई फिल्मों के निर्माण को भी प्रोत्साहित किया जिनमें बलात्कार के दृश्य दिखाये गये।
ऐसे दृश्यों के अलावा उत्तेजक और मादक चित्रण की आलोचना के जवाब में फिल्मकार और अनेक बौद्धिक यह तर्क देते हैं कि दर्शक की समझ पर ऐसे अंगुली उठाना ठीक नहीं है तथा असल बुराई तो समाज में है जिसे फिल्मकार बस अपना विषय बनाता है। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अगर कमाई के इरादे से दर्शकों की यौन कुंठा की तुष्टि के बलात्कार या सेक्स के दृश्य डाले जाते हैं, तो ऐसे दृश्यों की हर फिल्म सफल क्यों नहीं हो जाती। एक बिंदु यह भी है कि अगर बलात्कार या हिंसा को परदे पर देख कर करोड़ों दर्शक तुष्ट होते हैं, तो फिर इसे एक बड़े गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बीमारी की तरह देखा जाना चाहिए और फिल्मकारों पर सवाल उठाने में ऊर्जा खर्च करने के बजाये लोगों में बेहतर चेतना और संवेदना के प्रसार के लिए कोशिश करनी चाहिए।
यह सवाल भी अहम है कि अगर सिनेमा दर्शकों पर इतना ही गहन प्रभाव डालता है, तो फिर सिनेमा के अच्छे संदेशों का ऐसा ठोस असर क्यों नहीं होता है। वर्ष 1994 में आयी शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ के लंबे बलात्कार दृश्य पर भी ऐसे ही सवाल उठाये गये थे। फिल्म को सेंसर बोर्ड और अदालतों के चक्कर काटने पड़े थे तथा अनेक दृश्यों के हटाने या संशोधित करने के बाद ही उसका प्रदर्शन संभव हो सका था। सिनेमा में चित्रण का मसला कई कानूनी पेचीदगियों से भी संबद्ध है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के साथ भारतीय दंड संहिता के 1986 के उस कानून का भी ध्यान रखा जाना चाहिए जो महिलाओं के अभद्र चित्रण का निषेध करता है।
सिनेमैटोग्राफी कानून, 1952 के प्रावधान भी हैं। वर्ष 1969 में दंड संहिता की धारा 292 के तहत अश्लीलता को भी परिभाषित किया गया है। वर्ष 1991 में सेंसर बोर्ड के दिशानिर्देशों को संशोधित कर चित्रण पर कठोरता बरतने के उपाय भी किये गये हैं। वर्ष 1995 में संचार से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने इस मांग को ठुकरा दिया था कि सेंसर के नियमों को नरम बनाया जाना चाहिए ताकि वे विदेशी फिल्मों के साथ मुकाबला कर सकें। समिति की दो टूक राय थी कि ऐसा करना अश्लीलता की प्रतिस्पर्द्धा करना होगा। समय-समय पर अश्लीलता को लेकर भी बहसें हुई हैं जिनका असर फिल्म इंडस्ट्री और सेंसर बोर्ड पर हुआ है।
यह भी सच है कि महिलाओं के अनुचित चित्रण को रोक पाने में सेंसर बोर्ड लगातार असफल रहा है और अक्सर ऐसी फिल्में उसकी कैंची के नीचे आ जाती हैं, जो दरअसल महिलाओं को लेकर अधिक संवेदनशील होती हैं। बहरहाल, जरूरी यह है कि फिल्मकार भी समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को ठीक से निभायें, बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के प्रति पुलिस और अदालत मुस्तैद रहें तथा समाज और व्यक्ति भी अपने भीतर संवेदनशीलता और नागरिकता के मूल्यों को मजबूत करें।


 
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