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दीपावली पर नहीं दिखी प्रदूषण की चिंता

29/10/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'

दीपावली का पर्व देशभर में मनाया गया। इस बार दीपावली के कई रंग देखे गए। लोगों ने दीपावली से पहले वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की खूब चिंता की। ड्रोन से दिल्ली के सीमावर्ती गांवों में पराली जलाते किसानों की तस्वीरें खींची और उन्हें कार्रवाई का नोटिस भी पकड़ाया, लेकिन दीपावली के पटाखों से हुए प्रदूषण की किसी ने भी चिंता नहीं की। इस बार ग्रीन पटाखे भी बनाए गए। उम्मीद थी कि ध्वनि और वायु प्रदूषण कम होगा। सरकार ने निर्देश जारी किया कि दीपावली पर दो घंटे ही पटाखे दगेंगे। लेकिन जोश में लोगों ने कब होश खो दिया, पता ही नहीं चला। शाम होते ही पटाखे जो फूटने शुरू हुए तो देर रात तक उनके फूटने का सिलसिला जारी रहा। अकेले लखनऊ में करीब 90 करोड़ के पटाखे बिके और जलाए गए। जब एक शहर में पटाखे पर इतना खर्च हुआ तो पूरे देश में दीपावली पर पटाखों पर कितना अपव्यय हुआ होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। वातावरण में कितना प्रदूषण बढ़ गया होगा, इसकी कल्पना भी सहज ही की जा सकती है। दीपावली पर पटाखे जलाने से संतोष न हुआ तो लोगों ने दूसरे दिन भी पटाखे फोड़े। दीपावली के दिन से कुछ ज्यादा ही पटाखे फोड़े गए। यह प्रतिस्पर्धा अगर धन की बचत और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर हुई होती तो कितना अच्छा होता? दीपावली के उत्साह के नाम पर यह देश अपने धन और स्वास्थ्य का कितना नुकसान करता है, अगर इसकी जरा भी चिंता की जाए तो निश्चित ही ऐसी बात नहीं होती दीपावली पर सही मायने में हम श्री समृद्धि की आराधना कर सकते हैं। धन और पर्यावरण का नुकसान तो लक्ष्मी पूजन नहीं हो सकता। गणेश जी विवेक के देवता हैं। अपने ही धन में आग लगाकर अपने स्वास्थ्य के लिए संकट पैदा करना कहां का विवेक है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर साल की तरह इस बार भी सैनिकों के साथ दीपावली मनाई तो भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे लोगों के साथ दीपावली मनाई। अमेरिका में भी वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दीपावली मनाई। अमेरिका में दीपावली वर्ष 2009 से ही मनाई जा रही है। अमेरिका में रह रहे भारतीयों का इससे बड़ा सम्मान भला और क्या हो सकता है? 
दीपावली अपने आप में सकारात्मकता का समग्र दर्शन है। किसी कवि ने कहा है कि 'अंधेरे रास्ते पर चलें उम्मीदों का एक दीप जला आएं।' अहंकार नकारात्मकता का प्रतीक है और जलता हुआ दीपक सकारात्मकता का। दीपक जलाने की परंपरा इस देश में सदियों से चली आ रही है। जीवन भी एक दीपक है। जीवन दीप जलता रहे। बुझे नहीं, सारा यत्न इस बात का होना चाहिए। दीपक शुभता के प्रतीक हैं। दीपक अंधकार पर प्रकाश की विजय का शंखनाद है। दीपक कद में भले ही छोटा हो लेकिन उसकी क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता। अकेला दीपक अमावस्या के सघन अंधकार को दूर करने की क्षमता रखता है। अगर उसे अपने कुटुंबियों, स्वजातीय बंधु-बांधवों का सहयोग मिल जाए तो फिर कहना ही क्या? अंधकार का तो नामोनिशान ही मिट जाए।  
 अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए यही बात हम मानवों पर भी लागू होती है। रामनगरी अयोध्या में देव-दीपावली सोल्लास मनाई गई। इस अवसर पर अयोध्या में करीब 6 लाख दीपक जलाए गए। सरकार का लक्ष्य 5 लाख 51 हजार दीपकों को जलाने का था लेकिन दीपक जल गए अपेक्षा से ज्यादा। गिनीज बुक वालों ने भी यह माना कि राम की पैड़ी पर उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग और डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के सहयोग से चार लाख दस हजार दीपक जलाए गए। उन्होंने तो अयोध्या में सर्वाधिक दीपक जलाने का प्रमाणपत्र भी दे दिया। सरकार का दावा है कि प्रमुख मंदिरों समेत अयोध्या के 14 और स्थानों पर दो लाख से अधिक आस्था के दीप जलाए गए। दीपक कितने जले, कितने नहीं जले, यह मायने नहीं रखता। मायने तो यह रखता है कि जिस मकसद से दीपक जलाए गए, वह मकसद पूरा हुआ कि नहीं हुआ। सामूहिक दीपक जलाने का मकसद क्या हो सकता है? सामान्य आदमी यही कहेगा कि एकजुटता और अखंडता। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की अयोध्या में यह तीसरी दीपावली थी। हर दीपोत्सव में दीपों की संख्या ही नहीं, कार्यक्रम का दायरा भी बढ़ गया है। इस साल से अयोध्या में होने वाला दीपोत्सव राजकीय मेले में तब्दील हो गया है। योगी आदित्यनाथ ने बहुत ही पते की बात कही है कि वे सरकार बनने से दर्जनभर बार अयोध्या आए हैं और हर बार अयोध्या के विकास के लिए उन्होंने कुछ न कुछ दिया ही है। यह कुछ भी सामान्य नहीं है, करोड़ों रुपये की सरकारी विकास योजनाओं का है। इस साल भी 236 करोड़ की योजनाएं अयोध्या के विकास के लिए मिली हैं। त्यौहार सामूहिकता में ही अच्छे लगते हैं। भारतीय संस्कृति साथ-साथ चलने, साथ-साथ बोलने की रही है। त्यौहारों पर मेलों का आयोजन हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है। मेलों को लेकर सरकारों की दिलचस्पी सराहनीय है लेकिन इस देश में मेले स्वतः नियंत्रित होते रहे हैं। उसमें कुम्भ जैसे बड़े मेले और कल्पवास भी शामिल रहे हैं। गायत्री परिवार लंबे अरसे से दीप यज्ञ का आयोजन करता रहा है। कम खर्च में दीपदान का जो महत्व समझ में आता है, दीपोत्सव के बड़े आयोजन भी उस लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाते। धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते रहने चाहिए लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि धन का तर्कसंगत, न्यायसंगत, विवेकसंगत उपयोग हो। क्या इसके लिए हम अपनी प्राचीन आयोजन परम्पराओं के मूल में जा सकते हैं। हमें सोचना होगा कि क्या हम कम खर्च में भी बड़े आयोजन कर सकते हैं या नहीं। क्या हम पटाखों पर होने वाले खर्च को इस देश के विकास में लगा सकते हैं?

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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