लेख

Blog single photo

... बिन पानी सब सून

02/07/2019

श्रीराम अग्रवाल
थाह और अपार जलनिधि के स्वामी सागर तट पर बसा चेन्नई शहर आज बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है। 90 लाख की आबादी वाला, देश के पांच विशालतम मेगा सिटी में एक चेन्नई में भूजल तथा झीलों के सभी स्रोत सूख चुके हैं। विगत 30 वर्षों में सर्वाधिक भयानक जल संकट से जूझ रहे इस शहर के बच्चों के स्कूल बैग में किताबों से ज्यादा पानी की बोतलों का बोझ बढ़ गया है। अधिक पानी का उपयोग करने वाले व्यवसाय बंद होने के कगार पर हैं। सरकारी और निजी संस्थानों के कर्मचारियों से पीने के लिये अपने साथ पानी लाने को कहा जा रहा है। घरेलू पानी आपूर्ति के पेयजल नलों में आपूर्ति 10 प्रतिशत से कम तथा जिन 4 जलाशयों में शहर को पानी की आपूर्ति होती थी उनमें बमुश्किल 1 प्रतिशत पानी ही बचा है। एक जगह पानी के झगड़े के कारण एक महिला को  अपनी जान गंवानी पड़ गई। 
चेन्नई के पड़ोसी जिलों थिरूवल्लूर व कांचीपुरम जिन्हें 'झीलों के जिले' नाम से जाना जाता था, उनकी 6000 झीलों में भी पानी लगभग सूख चुका है। सरकार ने चेन्नई से 200 किमी दूर जोलारपेट से ट्रेन द्वारा पानी लाने का फैसला किया है। ऐसे में अंतिम आस बची है 235 किमी दूर चोला साम्राज्य द्वारा 1100 वर्ष पूर्व निर्मित जलाशय, जहां से सैकड़ों टैंकर रोजाना पानी ढुलाई में लगे हैं। 9000 ली. का पानी का टैंकर जो सरकार द्वारा 700 रुपये में बेचा जाता था, अब निजी पानी व्यवसाइयों द्वारा 4-5 हजार रुपये में बेचा जा रहा है। एक निवासी के अनुसार, यदि कुछ दिन यही स्थिति बनी रही, तो चेन्नई से लोगों का पलायन प्रारम्भ हो जाएगा। 
लोग भूले नहीं होंगे कि वर्ष 2017 तथा 2018 में झमाझम तेज बारिश के कारण यही चेन्नई पानी में लगभग डूब गया था। 2017 में शहर की 109 बस्तियां तथा 2018 में 89 बस्तियां पानी में डूब गयी थीं। न केवल शहर के बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे अनेक संगठनों के कार्यकर्ताओं तथा आपात राहत सैन्य दल के लोगों ने इन डूबे हुए इलाकों के निवासियों को भारी जोखिम उठाकर न केवल सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था बल्कि उनके भोजन, कपड़ा व अन्तरिम आवासों की व्यवस्था भी की थी। गत 30 वर्षों से अल्पवृष्टि एवं सूखे की मार झेल रहे तमिलनाडु में तब न इस अतिरिक्त जल को रोकने की कोशिश की गयी और न ही सूखा पड़ने के पूर्व उससे निबटने की तैयारी।
नीति आयोग की वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व में सर्वाधिक भूजल उपयोग करने वाला देश है। चीन व अमेरिका में भी भारत से कम भूजल का उपयोग किया जाता है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस भयंकर भूजल दोहन के कारण 2007-2017 के बीच देश के भूजल स्तर में 61 प्रतिशत तक की कमी आई है। 
आई.आई.टी. खड़गपुर तथा कनाडा के एथाबास्का विश्वविद्यालय के संयुक्त अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि भारत को प्रतिवर्ष लगभग 4000 घनमीटर वर्षा जल प्राप्त होता है। लेकिन हम इस वर्षा जल का केवल 8 प्रतिशत संचित कर पाते हैं। जलशोधन एवं पुनः उपयोग हेतु बनाने की अक्षमता के कारण विश्व में यह जल संचयन सबसे कम है। समुद्र किनारे बसा इजरायल जैसा मरूस्थलीय देश, उपयोग किये गये पानी का 100 प्रतिशत शोधन कर लगभग 94 प्रतिशत वापस घरों में उपयोग हेतु भेज देता है। इजरायल समुद्री पानी के खारेपन को शोधित पेयजल में भी परिवर्तित कर देता है। प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा पर वहां के प्रधान नेतन्याहू ने इसका जीवन्त प्रदर्शन भी किया था। 
नीति आयोग ने पिछली रिपोर्ट में इस भयावह स्थिति से चेताया था, पर किसी राज्य ने इस पर ध्यान नहीं दिया। मूलतः बढ़ती हुई जनसंख्या, द्रुतगति से शहरीकरण तथा भारी औद्योगिकीकरण इस समस्या का कारण है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो अगले वर्ष तक देश के 21 बड़े महानगर शून्य जल दिवस (जीरो वाटर डे) की स्थिति में पहुंच सकते हैं। यूरोपियन यूनियन की एक रिपोर्ट के अनुसार अंधाधुंध शहरीकरण के कारण आन्ध्र, महाराष्ट्र, कर्नाटक व दिल्ली जैसे प्रदेश इस समय पानी की सर्वाधिक कमी की स्थिति में हैं। चेन्नई के वर्षा जल संचयन केन्द्र के निदेशक, शेखर राघवन के अनुसार, शहरों के विस्तार एवं अनियंत्रित एवं अनियमित भवन निर्माण गतिविधियों के कारण प्राकृतिक जलभराव क्षेत्रों को पाटा जा रहा है। पर्यावरण फाउंडेशन के संस्थापक अरूण कृष्णमूर्ति का कहना है कि अनियंत्रित बोरिंग वेल के उपयोग से पानी की समस्या हुई है। हमें बोरिंग गतिविधियों पर पूर्ण नियंत्रण करना होगा। एक समाचार के अनुसार, कर्नाटक सरकार अगले 5 वर्ष के लिए मल्टीस्टोरी भवन निर्माण पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। 
बढ़ता हुआ वैश्विक तापमान भी न केवल भारत अपितु भूमध्य रेखा के आसपास के कई देशों में भूगर्भीय जल के स्तर को सूखाता जा रहा है। भीषण तपिश में भूमितल की जल आद्रता भाप बनकर उड़ती जाती है और छोड़ जाती है पृथ्वी की छलनी-छलनी सूखी परतें। और हम, सूखी धरती को और गहरे छेदते चले जा रहे हैं। हम भूमि की उस परत तक धरती को छेदने की स्थिति में न पहुंच जाएं जहां से पानी के स्थान पर भाप और आग की लपटें ऊपर आ जाएं। देश के कई क्षेत्रों से धरती दरकने, सूखने, धुआं निकलने व कोयला खनन क्षेत्र में गहरी होती खदानों से आग निकलने की खबरें यदाकदा आती रहती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकार संगठन की एक रपट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की भयंकरता के कारण, विश्व क्रमशः ऐसी अवस्था में पहुंच रहा है जब अमीर लोगों के पास बढ़ते हुए तापमान, भूख से संघर्ष से बचने के साधन होंगे, परन्तु विश्व के 80 प्रतिशत से अधिक गरीब जनता को दुष्परिणाम भोगने होंगे। राज्यसभा में जल संकट पर हुई चर्चा में केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री माधवन के अनुसार सूखे और जल अभाव के कारण ग्रामीण जनसंख्या पहले से ही अति-जनसंख्या वाले शहरों की ओर भागेगी। इस कारण गरीबों को भोजन, पानी, आवास और महंगा होता जाएगा। 2030 तक देश की 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या को पेयजल उपलब्ध नहीं हो सकेगा। अगले 5 वर्षों  में यदि इस समस्या का सरकारों, गैर सरकारी संगठनों एवं जनता द्वारा कोई उपाय नहीं किया गया तो भारत को जल संकट की भयंकरतम स्थिति से जूझना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में स्वच्छता आन्दोलन की तरह ही जन-जन की सक्रिय सहभागिता के साथ 'जल संरक्षण आन्दोलन' चलाने का भी आह्वान किया है। 
इस संकट से उबरना अकेले सरकार के वश में नहीं है। प्राप्त पेयजल का घरों में विभिन्न उपयोगों में सावधानीपूर्वक उपभोग करना, वर्षा ऋतु में बह जाने वाले पानी की आवासीय भवनों तथा सार्वजनिक रूप से वर्षा जल संचयन (रेन हार्वेंस्टिंग) तथा उपयोग किये गये जल को पुनः उपयोग योग्य बनाने (वाटर रिसाइकलिंग) के क्षेत्र में, आवासीय इकाई स्तर से नगर निगम, महानगर तथा प्रान्तीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर युद्धस्तर से कार्य करना होगा। हमें शून्य जल की स्थिति में नहीं पहुंचने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। वैज्ञानिकों तथा सरकार को छोटे घरेलू वाटर रिसाइकलिंग प्लान्ट बनवाकर मल्टीस्टोरी बिल्डिंग तथा महानगरों के पॉश इलाकों में लगाना आवश्यक करना होगा, क्योंकि पानी की सर्वाधिक बर्बादी इन्हीं इलाकों में होती है। जहां से आये दिन, निजी स्वीमिंग पूल और पेयजल से कार धोने के समाचार मिलते रहते हैं। आवश्यकता है जनता के स्वयं चेतने की, क्योंकि 'रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून'।
(लेखक बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति रह चुके हैं।) 


 
Top