युगवार्ता

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भीड़ की हिंसा को रोकना होगा

11/07/2019

भीड़ की हिंसा को रोकना होगा

अवधेश कुमार

भीड़ की हिंसा के हमारे पास दो उदाहरण हैं- पहलू खान और तबरेज। हम एक की निंदा करें और दूसरे की न करें तो जाहिर है, हम इस भयावह समस्या का समाधान नहीं चाहते, इसके द्वारा कुछ और लक्ष्य साधना चाहते हैं जो समाज हित में कतई नहीं हो सकता है।

भीड़ की हिंसा देश में लंबे समय चिंता का कारण बना हुआ है। इस समय झारखंड में तबरेज नामक एक व्यक्ति को भीड़ से पिटते और उससे जय श्रीराम और जय हनुमान बोलवाते हुए एक वीडियो वारयल है। तबरेज की अस्पताल में मृत्यु हो गई। हालांकि उसको पीटने और नारा लगवाने के अपराध में 11 लोग गिरμतार हुए हैं। तबरेज को मोटरसाइकिल चोरी करते हुए पकड़ा गया था और बांधकर उसकी पिटाई आरंभ हो गई। दूसरी घटना दो वर्ष पहले अलवर, राजस्थान में पहलू खान की पिटाई की है। उसे गोतस्करी के आरोप में गोरक्षकों की भीड़ ने पीटा एवं पुलिस को सौंप दिया। फलत: अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। वह भी भीड़ की हिंसा का मामला था। अब अलवर पुलिस ने जो आरोप पत्र दायर किया है उसमें मृतक पहलू खान को गो तस्कर बताया गया है।
आरोप पत्र में पहलू, उसके बेटों इरशाद और आरिफ पर राजस्थान गोजातीय पशु अधिनियम 1995 की धारा 5, 8 और 9 के तहत आरोपी बनाया गया है। अप्रैल 2017 में पहलू खान से गो-तस्करी के शक में भीड़ ने मारपीट की थी। इससे पहले 2018 की शुरुआत में राज्य की भाजपा सरकार के दौरान भी पहलू खान के दो साथियों के खिलाफ इसी तरह का आरोप पत्र दायर किया गया था। इन लोगों की भी भीड़ ने पिटाई की थी। ध्यान रखिए, पूरे मामले में दो प्राथमिकियां दर्ज हुईं थीं। एक में पहलू और उसके परिवार पर हमला करने वाली भीड़ को आरोपी बनाया गया है। वहीं दूसरी प्राथमिकी पहलू खान और उसके परिवार के खिलाफ की गई। अब राजस्थान सरकार कह रही है कि इसकी जांच भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई इसलिए जरूरी होगा कि इसकी दोबारा जांच कराई जाएगी। मामला न्यायालय में है। न्यायालय में अगर आरोप प्रमाणित नहीं हुए तो सभी छूट जाएंगे। सरकार चाहे तो न्यायालय के आदेश से दोबारा जांच करा सकती है। लेकिन मूल बात इसके कानूनी पहलू नहीं हैं। मूल बात यह भी नहीं है कि पहलू खान वाकई अपराधी था या तरबेज चोर था। मूल बात भीड़ की यह बढ़ती खतरनाक प्रवृत्ति है। पिछले वर्ष मई में उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई करते हुए कहा था कि 10 वर्षों में 86 वारदातें हुईं जिनमें 33 लोग मारे गए।


तबरेज की पिटाई का मामला 18 जून को सामने आया था। उसके बाद पहले उसकी प्राथमिक चिकित्सा और बाद में सदर अस्पताल में चिकित्सा भी कराई गई थी। इस दौरान उसे ऐसी किसी गंभीर चोट लगने की बात सामने नहीं आई जिससे उसकी जान को खतरा हो।

यह संख्या अब काफी बढ़ गई है। किंतु इस आंकड़े से पता चलता है कि भीड़ की स्वयं न्याय करने की खतरनाक प्रवृत्ति हमारे समाज में लंबे समय से है। दुर्भाग्य यह है कि जब गोरक्षक हिंसा करते हैं, तो वह देश भर में बावेला का विषय बनता है लेकिन दूसरे संप्रदाय के लोग करते हैं तो उस पर लगभग चुप्पी बरती जाती है। आखिर दिल्ली में ध्रुव त्यागी की हत्या एक संप्रदाय विशेष की भीड़ की हिंसा थी और उसका कारण क्या था? उन्होंने अपनी बेटी के ेड़ने का विरोध किया था। मेरठ में एक फौजी ने एक लड़की को छेड़ते युवाओं का विरोध किया तो पूरी भीड़ उस पर हमला करने आ गई। फौजी की निर्ममता से हत्या कर दी। डॉ. नारंग से लेकर अंकित गुप्ता तक की ऐसी लंबी सूची है। अगर पहलू खान गो तस्कर था तो भी गोरक्षक भीड़ को उसको बेरहमी से मारने का अधिकार नहीं था। इसी तरह तबरेज खान ने यदि चोरी की तो भी उसे इस तरह मारने का अधिकार किसी को नहीं है। सरायकेला जिले के उपायुक्त के द्वारा गृह सचिव को 24 जून को जो रिपोर्ट भेजी गई है, वह कई सवाल खड़ी करती है। इसके अनुसार मोहम्मद तबरेज अंसारी 17/18 जून की रात अपने दो साथियों नुमैर अली और शेख इरफान के साथ कमल महतो नाम के आदमी के घर में चोरी की नीयत से घुसा था। ग्रामीणों ने चोरों को पकड़ने का प्रयास किया।
मोहम्मद तबरेज आलम ग्रामीणों के हाथ लग गया जबकि उसके दो साथी नुमैर अली और इरफान भागने में सफल रहे। आधी रात को घटी इस घटना के बाद ग्रामीणों ने तबरेज का पेड़ से बांधा और पिटाई की। पुलिस को इसकी सूचना मिली और लगभग पांच बजे सुबह तक वह घटनास्थल पर पहुंच गई। पुलिस तबरेज को थाने लाई और प्राथमिकी दर्ज की गई। इस दौरान उसकी प्राथमिक चिकित्सा भी कराई गई थी। उसमें उसे कोई गंभीर चोट लगने की बात सामने नहीं आई थी। 18 जून को ही धात की डीह गांव के लोगों के द्वारा तबरेज और उसके दो साथियों के विरुद्ध चोरी की प्राथमिकी भी दर्ज करायी गई थी। इसके बाद तबरेज को सदर अस्पताल ले जाकर उसकी एमएलसी भी कराई गई। वहां भी उसे किसी गंभीर चोट लगने की बात सामने नहीं आई थी। इसके बाद उसे न्यायिक अधिकारी के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया गया था। जानकारी के मुताबिक 22 जून को सुबह अचानक तबरेज की तबीयत खराब हो गई और उसे अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
इस घटना में अहम सवाल यह उठाया जा रहा है कि तबरेज की पिटाई का मामला 18 जून को सामने आया था। उसके बाद पहले उसकी प्राथमिक चिकित्सा और बाद में सदर अस्पताल में चिकित्सा भी कराई गई थी। इस दौरान उसे ऐसी किसी गंभीर चोट लगने की बात सामने नहीं आई है जिससे उसकी जान को खतरा हो सकता था। ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि चार दिनों के बाद अचानक उसकी तबीयत खराब कैसे हुई जो उसकी मौत का कारण बनी? 22 जून को ही सरायकेला-खरसावां के कार्यपालक दंडाधिकारी के सामने तबरेज के शव का पोस्टमॉर्टम किया गया। इसमें जो 11 लोग गिरμतार हुए वे सब गांव के आम गरीब हैं। पप्पू मंडल और अन्य के विरुद्ध लिंचिंग करने की शिकायत दर्ज कराई गई थी। 22 जून को ही पप्पू मंडल को गिरμतार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसके अगले ही दिन 23 जून को सरायकेला के पुलिस अधीक्षक ने इस मामले की विस्तृत जांच की थी और घटना पर लापरवाही बरतने के कारण चंद्रमोहन उरांव और विपिन बिहारी सिंह को निलंबित कर दिया गया था।
24 जून की सुबह इस घटना के अन्य आरोपियों कमल महतो, सोनामु प्रधान, प्रेम चंद माहली और भीम मंडल को भी गिरμतार कर लिया गया। भीड़ में किसने मारा और कौन वहां दर्शक था इसका पता करना हमेशा कठिन होता है। कई घटनाओं पर शोध करने वाले कुछ समान तो कुछ अलग कारण निकाले हैं। उदाहरण के लिए दो वर्ष पहले महाराष्ट्र के धुले में जिन पांच निर्दोष नवजवानों को केवल एक बच्चे से किसी जगह का रास्ता पूछने के कारण बच्चा चोर कहकर मार दिया गया। पकड़े गए 35 लोगों में से कुछ ने बताया कि हमारे बच्चे चोरी हो रहे हैं, पुलिस उनका पता नहीं करतीं। तो यह एक कारण है कि पुलिस कार्रवाई नहीं करती। न्यायालय में लंबी प्रक्रिया चलती है। गोरक्षण के नाम पर हिंसा करने वाले भी तर्क देते हैं कि पुलिस की संरक्षण में गोतस्करी होती है। कुल मिलाकर मूल बात पुलिस और न्याय प्रणाली से उठता हुआ विश्वास भीड़ की हिंसा का बड़ा कारण है।
हम इस कारण को मानें न मानें, आजकल चोर या लूटेरों को पकड़ने के बाद पीट-पीट कर अधमरा करने या मार डालने की आम खतरनाक प्रवृत्ति हो गई है। हालांकि शोध के आंकड़ें बताते हैं कि गोरक्षण या अन्य मजहबी उन्माद के तहत होने वाली भीड़ की हिंसा बच्चा चोर या अन्य कई मामलों की हिंसा से कम है। देश में बच्चा चोरी का संगठित आपराधिक तंत्र है जिसके लिए एक अबोध बच्चा उसके लिए डर से बिना कुछ लिए भीख मांगने की मशीन है। यह बहुत बड़ी कानूनी चुनौती है जिसे रोक पाने या बच्चों को वापस करा पाने में पूरा तंत्र विफल है। इसमें लोगों का गुस्सा होना स्वाभाविक है। पर बच्चा चोर के नाम पर अभी तक मारे गए ज्यादातर लोग निर्दोष पाए गए हैं। कहीं-कहीं तो भीड़ ने किसी पागल या नसेड़ी को बच्चा चोर समझकर मार डाला।
फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कई बार कुछ गांवों में अभी भी जिसे डायन या चुड़ैल कहकर भीड़ टूट पड़ती है वो अत्यंत कमजोर परिवार की या अकेली महिला होती है। इस तरह की हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। लोग जो भीड़ में हिंसा करके अपनी दबंगता स्थापित करते हैं वे असली जिन्दगी में कायर होते हैं। वे अपने आसपास के शक्तिशाली गुंडे, दादा या भ्रष्टाचारी के खिलाफ आवाज तक नहीं उठाते। हम सबको समझना होगा कि अंतत: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में हमें स्वयं पुलिस, न्यायालय और जल्लाद तीनों की भूमिका नहीं निभानी है। किसी भी कारण से आप हिंसा करते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया में प्रतिहिंसा हो सकती है जिसका शिकार कोई और हो सकता है। पहलू खान गौ तस्कार था यह पुलिस मान रही है।

तो गोरक्षकों ने उसे सही पकड़ा किंतु उस पर कार्रवाई पुलिस और न्यायालय करती। गोरक्षक न्यायालय में उसके खिलाफ लड़ते। उसी तरह तबरेज यदि चोरी में पकड़ा गया, तो भी आपके पास इतना ही अधिकार है कि आप उसे पुलिस के हवाले करें। हालांकि कुछ लोग भीड़ की हिंसा के नाम पर एकपक्षीय बात फैलाते हैं और भ्रम पैदा करते हैं।


 
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