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संविधान पर गांधी के आदर्श मूल्यों की प्रतिछाया

01/10/2019

प्रमोद भार्गव

म सब जानते हैं कि महात्मा गांधी की संविधान के प्रत्यक्ष लेखन में कोई भूमिका नहीं रही। किंतु, उनके 'जो सब के लिए न्याय, समता और अपरिग्रह' के आदर्श मूल्य थे, उनकी प्रतिछाया जरूर संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अंतर्निहित है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति प्रजा में होनी चाहिए। इसलिए उनकी परिकल्पना को ही साकार रूप में अवतरित करने की दृष्टि से पंचायती राज प्रणाली अस्तित्व में है। गांधी सत्य, अहिंसा और सदाचरण के साथ 'सादा जीवन, उच्च विचार' के क्रियान्वयन के पक्षधर थे। गांधी की सफलता के मापदंड केवल नैतिक थे। हमारी वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी राजनीतिक दल और प्रशासनिक तंत्र का विरोध कानून का उल्लंघन मान लिया जाता है और विरोधी आंदोलनकारियों पर आपराधिक प्रकरण पंजीबृद्ध कर दिए जाते हैं। यही विरोध जब गांधी आंग्रेजी-शासन के विरुद्ध करते थे, तो उसमें अराजकता की कहीं गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि उनका मूल-मंत्र सत्याग्रह और भूख हड़ताल हुआ करते थे। लेकिन लोकतंत्र के पहरुये अब उन्हें आचरण में नहीं ढाल पाते। फलतः संविधान के अनुच्छेदों को परिभाषित भी बाहुबलियों के अनुरूप कर दिया जाता है। यह विडंबना गांधी की उस आत्मा को कचोटती होगी, जिसका बल ही सत्यनिष्ठा और नैतिकता थी।
गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से 1915 में भारत लौटे थे। गोपालकृष्ण गोखले के कहने पर उन्होंने किसान की वेशभूषा में भारत की यात्रा की। एक साल के भीतर उन्होंने देश और लोगों की समस्याओं को गंभीरता से जाना-समझा। जो भी नेता व आंदोलनकारी देश की परिस्थितियों के बदलाव के पक्षधर थे, उनसे संपर्क साधा। उसी समय महामना मदनमोहन मालवीय काशी हिंदू विश्व-विद्यालय के निर्माण में लगे थे। 4 फरवरी 1916 को बीएचयू की आधार-शिला कार्यक्रम में उन्होंने गांधी को भी आमांत्रित किया। मंच पर लार्ड हार्डिज, एनी बेसेंट और आर्थिक सहयोग देने वाले कई राजा-महाराजा उपस्थित थे। राजा-महाराजा रत्न-जड़ित कीमती वस्त्र और सोने के गहने पहने हुए थे। जबकि गांधी जी सफेद धोती-कुर्ते के साथ सिर पर साफा धारण किए हुए थे। शिलान्यास समारोह में उद्बोधनों का क्रम शुरू हुआ। सभी ने अंग्रेजी में अपनी बात कही। महामना ने गांधीजी से भी अंग्रेजी में संबोधित करने का आग्रह किया। उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देते हुए कहा, 'मुझे इस बात से संकोच हो रहा है कि विदेशी भाषा में बोलने को विवश किया गया है।' उनकी पहली पंक्ति सुनकर सब चकित रह गए। गांधीजी आगे बोले, 'जो लोग महल बनाते हैं। भोग-विलास की जिंदगी जीते हैं, वे हकीकत में किसान-मजदूर की खून-पसीने की कमाई का शोषण करते हैं। सामंतों की समूची दौलत गरीबों के खून से पैदा हुई है। जब तक आप लोग इन महंगे कपड़ों को उतारकर नहीं फेकेंगे, तब तक भारत का कल्याण संभव नहीं है। आप लोगों को इस संपत्ति को देशवासियों को सौंप देना चाहिए।' एनी बेसेंट समेत तमाम सामंत तिलमिला उठे। गांधी को रोकने की कोशिशें हुईं, लेकिन वे सुरक्षा घेरे में बैठे वायसराय हार्डिज को इंगित कर बोले, 'आखिर वायसराय संदेह की दीवार से क्यों घिरे रहते हैं? इस तरह भयभीत रहकर जीने से तो अच्छा मर जाना है। हमें ईश्वर के अलावा किसी से नहीं डरना चाहिए, चाहे वे राजा-महाराजा हों या किंग जॉर्ज!' इस भाषण से कई सामंत बीच सभा से उठकर चले गए। इसे उन्होंने अपना अपमान माना। एनी बेसेंट भी चली गईं। परंतु, गांधी जी को जो कहना था, वह कहकर ही थमे। यह दो टूक कटु सत्य स्वंतत्रता आंदोलन के बदलते नेतृत्व का प्रतीक था। यहीं से गांधी जी बदलाव के केंद्रीय ध्रुव बनने लग गए। यही वह भाषण था, जिसमें संविधान के अन्याय, अपरिग्रह, स्वतंत्रता, असमानता और भाषाई नीति-निर्देशक तत्व प्रच्छन्न थे।
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को इसे स्वीकार किया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 284 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए। इसकी प्रस्तावना में ध्येय वाक्य लिखा गया, 'संविधान जो भारत के लोगों द्वारा बनाया गया तथा स्वयं को समर्पित किया गया।'
संविधान निर्माण की प्रक्रिया लंबी चली है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जहां-जहां अधिवेशन होते थे, उनमें अकसर मूलभूत अधिकार और मांगें विवरणिका में शामिल की जाती थीं। ऐसे अधिकारों की मांग की शुरूआत 1918 में मुंबई अधिवेशन से हुई। इन सब पर गांधी का प्रभाव परिलक्षित था। इसमें राज्य संघ विधेयक का आरंभिक प्रारूप पारित किया गया, जिसे राष्ट्रीय सम्मेलन ने 1925 में अंतिम रूप दिया। इसमें विधि के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा स्वधर्म पालन की स्वतंत्रता जैसे अधिकार सम्मिलित किए गए। इन्हीं मांगों को 1927 में मद्रास अधिवेशन में दोहराया गया। 1928 में मोतीलाल नेहरू की समिति ने आम जनता को न्याय के साथ मानव अधिकारों की पैरवी की। 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन में बुनियादी अधिकारों के साथ कर्तव्यपालन का भी उल्लेख किया गया। 1930 के प्रस्ताव में सामाजिक तथा आर्थिक अधिकारों को संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में समाविष्ट किया गया। हालांकि ये दायित्व मूल संविधान में दर्ज नहीं किए जा सके थे।
कालांतर में 1976 में 42वां संशोधन करके एक नया अध्याय संविधान में जोड़ा गया। संविधान में संसद के प्रति उत्तरदायी संसदीय प्रणाली, अल्पसंख्यकों हेतु रक्षा उपायों और संघीय राज्य व्यवस्था के जो प्रबंध किए गए हैं, वे 1928 की नेहरू समिति के प्रस्तावों से लिए गए हैं। इन पर स्पष्टतः गांधी का प्रभाव था। अतएव कहा जा सकता है कि संविधान के करीब 75 प्रतिशत स्रोत देशज थे। इन देशी स्रोतों के अलावा नीति-निर्देशक तत्वों की कल्पना आयरलैंड के संविधान से ली गई। विधायिका के प्रति उत्तरदायी वाली संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से आई। राष्ट्रपति में संघ की कार्यपालिका-शक्ति एवं संघ के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश निहित करना और उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का पदेन सभापति बनाने के उपबंध अमेरिकी संविधान से लिए गए। 
भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों पर जिस तरह से गांधी की अंतर्भावना का प्रभाव परिलक्षित है, उसी तर्ज पर गांधी की भावना को मूल संविधान की प्रति में संलग्न चित्रों से भी प्रतिबिंबित किया गया है। यानी, इसकी इबारत को लोग सरलता से समझें, इसलिए भारतीयता से ओतप्रोत 22 तस्वीरें चित्रित हैं। संविधान के 22 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय एक नए चित्र के साथ शुरू होता है। इन चित्रों को शांति निकेतन के आचार्य नंदलाल बोस ने अपने छात्रों के सौजन्य से तैयार किया था। ये चित्र भारतीय इतिहास की विकास यात्रा के द्योतक हैं। इन चित्रों के चारों ओर जो चौहद्दी (बॉर्डर) है, उसमें बहुरंगों में गाय, बैल, घोड़ा, हाथी और शेर उत्कीर्ण हैं। ये कृषि एवं दुग्ध आधारित अर्थव्यवस्था के साथ वन्य-जीवों और मनुष्य के सह-अस्तित्व के भी प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति में शतदल कमल के फूल का भी अभिन्न महत्व है।  इसलिए चौहद्दी में इस फूल को भी जगह दी गई है।
मौलिक अधिकार दर्शाने वाले संविधान के तीसरे भाग का प्रारंभ त्रेतायुग के चित्र से होता है। इसमें रावण को पराजित कर भगवान राम अपनी अर्धांगिनी सीता को लंका से वापस ला रहे हैं। अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ हैं। राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को दर्शाने के लिए कुरुक्षेत्र में युद्ध से पहले अर्जुन और कृष्ण के संवाद का चित्र प्रस्तुत है। यह गीता का उपदेश है। इस कलाकृति को अध्याय चार में स्थान दिया गया है। अध्याय पांच के आरंभ में बोधिवृक्ष के नीचे बैठे भगवान बुद्ध के आत्मज्ञान प्राप्ति की तस्वीर है। इस भाग का शीर्षक 'संघ' है। इस भाग में राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति की भूमिका के नियम उल्लेखित हैं। संविधान के दसवें भाग की शुरुआत अनुसूचित तथा जनजातीय क्षेत्रों के बारे में जानकारी देते चित्र से होती है। यह गुप्तकालीन नालंदा विवि का चित्र है। नालंदा में दुनियाभर के छात्र आकर ज्ञानार्जन करते थे। 14वें भाग में अकबर के दरबार की झलक है। इसमें सम्राट अकबर, दरबारी और चंवर झुलाते सेवक हैं। यह अध्याय केंद्र और राज्यों के अधीन सेवाओं को दर्शाता है। 18वें अध्याय में गांधी की नोआखाली यात्रा से जुड़ा चित्र है। दंगों के दौरान सांप्रदायिक सद्भावना का प्रतिनिधित्व करता यह चित्र आपातकालीन स्थितियों से सामना करने का प्रतीक है। इस चित्र में गांधीजी के साथ दीनबंधु एंड्रयूज भी हैं। इसमें एक हिन्दू महिला गांधीजी के माथे पर तिलक लगा रही है और कुछ मुस्लिम पुरुष हाथ जोड़कर खड़े हैं। यह गांधी के सर्वधर्म समभाव और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक चित्र है। 19वें भाग में नेताजी सुभाषचंद्र बोस 'आजाद हिंद फौज' का सैल्युट ले रहे हैं। इस चित्र में अंग्रेजी भाषा में अंकित है कि इस पवित्र युद्ध में हमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आवश्यकता हमेशा रहेगी। इससे तात्पर्य यह भी है कि नरम दल के साथ गरम दल के नेताओं का भी आजादी की लड़ाई में अहम् योगदान रहा है। स्पष्ट है, गांधी जी का प्रभाव संविधान के मूल दर्शन के साथ-साथ चित्रों में भी प्रतीकात्मक रूप में अभिव्यक्त है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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