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शिक्षा के अधिकार से वंचित करता बाल श्रम

11/06/2019

(बाल श्रम दिवस, 12 जून पर विशेष)

राकेश राणा
 देश का भविष्य कच्ची उम्र में ही बाल श्रम की चक्की में पिस रहा है। देश के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करने वाले शिक्षा से कोसों दूर हैं। अक्सर छोटे-छोटे बच्चे माता-पिता के साथ खेतों और अन्य कार्यों में लगे दिख जाएंगे। कहीं-कहीं तो बंधुआ मजदूरी तक करते पाये जाते हैं। बाल श्रम की तीन दशाएं सामान्यतः देखने को मिलती हैं। बच्चे या तो परिवार के साथ गृह कार्यों में संलग्न हैं और या फिर परिजनों के साथ घर के बाहर काम पर जाते हैं अथवा परिवार से अलग अकेले व्यवसायिक प्रतिष्ठानों, दुकानों, होटल, ढाबे आदि पर काम करते दिखते हैं। 
बाल श्रम के ये दैनिक दृश्य हैं। दुकानों पर काम करते बच्चे, कारखानों में खटता बचपन, गधों-घोड़ों पर बोझा ढोते बच्चे, खेतों में काम करते बच्चे, घर में छोटे भाई-बहनों को संभालते बच्चे, अपनी खेलने-कूदने की उम्र में मजबूरी में मजदूरी करते बच्चे, ईंट भट्ठों पर काम करने बाहर जाते बच्चे। अशिक्षा, गरीबी, कर्ज, जनसंख्या का बढ़ता बोझ जैसे अनेक कारण इस बाल श्रम की जड़ में हैं। ऐसा नहीं कि हमने इस दिशा में प्रयास नहीं किये हैं। निरन्तर सरकारी और गैर सरकारी सभी स्तरों पर हस्तक्षेप हुए हैं। बाल मजदूरी को रोकने के लिये बाल रोजगार अधिनियम 1938 पारित हुआ। समय-समय पर बाल श्रम उन्मूलन हेतु और बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून बने। 14 साल की आयु से कम के बच्चों के लिए हमारे संविधान में अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों को स्थापित किया गया है। अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्रावधान है कि हर राज्य 6 से 14 साल तक के बच्चे के लिए मुफ्त शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन सुलभ कराएगा। संविधान के तहत बच्चों की बाल श्रम से सुरक्षा का पूरा बंदोबस्त संविधान में किया गया है। कारखाना अधिनियम 1948, 14 साल तक की आयु वाले बच्चों को कारखाने में काम करने से रोकता है। खदान अधिनियम 1986, 18 साल से कम आयु वाले बच्चों का खदानों में काम करना निषेध करता है। बाल श्रम अधिनियम 1986, 14 साल से कम आयु वाले बच्चों के जीवन को जोखिम में डालने वाले व्यवसायों में काम करने को निषेधित करता है। बच्चों का किशोर न्याय अधिनियम 2000, बच्चों के रोजगार को एक दंडनीय अपराध घोषित करता है। बावजूद इस सबके बाल श्रम की स्थितियों में कोई खास सुधार नहीं दिखता है। बाल श्रम निषेध कानूनों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है। यह मानव अधिकारों का अभाव और बच्चों के बचपन को अर्थरहित करना है। बच्चे कहां और किस तरह के कामों में सुरक्षित हैं, इस बाबत कोई कानून बहुत स्पष्ट नहीं है। असंगठित क्षेत्रों में बाल श्रम भयावह परिदृश्य के साथ मौजूद है। 
बाल श्रम में खतरनाक कार्यों की व्याख्या कोई कानून करता नहीं दिखता। जोखिमपूर्ण कार्यों की एक सूची भर प्रस्तुत करता है। बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में जिस ढंग से प्रभावी पहल की जानी थी, शायद हम नहीं कर सके, चूक गए। गरीबी का उन्मूलन इस दिशा में पहली जिम्मेदारी थी जो आज तक नहीं  हो पाया। मुफ्त शिक्षा और जीने की सामान्य आवश्यक दशाएं सबका पहला हक है। मौजूदा बाल श्रम निषेध कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिये जरूरी संशोधनों की आवश्यकता है। जोखिम वाले कार्यों की सूची जो वर्तमान में कानून के अन्तर्गत है उसमें और अधिक व्यवसायों को शामिल करने की आवश्यकता है, जिन्हें खतरनाक गतिविधियों के दायरे से बाहर रखा गया है।
 शिक्षा के अधिकार को वास्तविक धरातल पर उतारने की महती आवश्यकता है। 1 अप्रैल 2010 से लागू शिक्षा अधिकार कानून को पूर्ण अमल में लाना जरूरी है। निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 नाम तो दिया गया है परन्तु काम अभी बाकी है। इस अधिनियम के लागू होने से 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को अपने नजदीकी विद्यालय में निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा पाने का कानूनी अधिकार मिल गया है। इस अधिनियम के तहत गरीब परिवार के बच्चों के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत दाखिला देने का प्रावधान रखा गया। राइट-टू-एजुकेशन एक्ट देश में एक महत्वाकांक्षी कानून के आशय से लाया गया था कि भारत एक युवा देश है। भावी पीढ़ी को शिक्षा और विशिष्ट गुणों का परिमार्जन कराकर देश को खुशहाल और सशक्त बनाया जाएगा। राष्ट्र शक्शिाली एवं समृद्ध बनेगा। यह कानून उत्तरदायित्व बोध वाले सक्रिय नागरिक तैयार करेगा। शिक्षा का अधिकार कानून 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को स्कूल फीस, यूनिफार्म, पुस्तकें, ट्रांसपोर्टेशन और मीड-डे मील जैसी तमाम सुविधाएं प्रदान करता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए 30 बच्चों को पढ़ाने के लिए कम से कम एक प्रशिक्षित अध्यापक हो। हर तीन किलोमीटर के दायरे में स्कूल हो। यह अधिनियम भारत राष्ट्र को एक विकसित एवं शिक्षित समाज के रूप में स्थापित करने का शानदार प्रयास है। इस अधिनियम का सही क्रियान्वयन कर 2020 तक भारत को एक ज्ञान-समाज में रूपान्तरित करने की योजना है। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का यह सपना इस पहल के साथ साकार होगा। केन्द्र सरकार के साथ-साथ इस अधिनियम के समुचित रूप से क्रियान्वयन में राज्य सरकारों की भी महती भूमिका है।
 बाल श्रम और ड्राप-आउट जैसे कलंक 21वीं सदी में धुले बिना हम सम्मानजनक ढंग से दुनिया के सामने सिर ऊंचा नहीं कर पाएंगे। देश की आधी आबादी महिलाएं मात्र 53.67 प्रतिशत ही साक्षर हो पाईं आजादी के 72 साल बाद भी। इस निरक्षरता का असर न सिर्फ महिलाओं के जीवन स्तर पर अपितु उनके परिवार एवं देश के आर्थिक विकास पर सीधा पड़ता है। निरक्षर महिलाओं में सामान्यत: उच्च मातृत्व मृत्यु दर, पोषाहार का निम्न स्तर, न्यून आय अर्जन क्षमता और परिवार में उन्हें बहुत ही कम स्वायतता प्राप्त होती है। निरक्षरता के पीछे बाल श्रम है जो शिक्षा से वंचित रखता है। बाल श्रम का साक्षरता के साथ गहरा नाता है। शिक्षित जनसंख्या की कमी देश के आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न कर रही है। सबको शिक्षित करना हमारा पहला दायित्व बनता है और एक नैतिक अनिवार्यता भी। शिक्षा न सिर्फ शिक्षित करती है, बल्कि आत्मविश्वास पैदा करती है। अपने हक-अधिकारों के प्रति जागरूक करती है और सृजनात्मक क्षमता का विस्तार कर राष्ट्र निर्माण में योगदान करती है।

(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं।)


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