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बिहार में बिखर गया महागठबंधन

27/09/2019

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

बिहार की राजनीति हमेशा से किसी न किसी कारणों से चर्चा में बनी रहती है। इस बार होने वाले उपचुनाव में बिहार की सियासत फिर चर्चा में है। लोकसभा चुनाव में एनडीए को हराने के लिए बना महागठबंधन अब बिखरने लगा है। ऐसा किसी सिद्धांत की वजह से नहीं बल्कि महागठबंधन के नेताओं के अहंकार और स्वार्थ की वजह से हो रहा है। पांच विधानसभा और एक लोकसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले ही विपक्षी नेता एक-दूसरे की पोल खोलने में मुश्तैदी से जुट गए हैं। ऐसे में उपचुनावों के नतीजों में उनका बिस्तर गोल होना तय लगता है। महागठबंधन के नेताओं की सिर-फुटौव्वल से एनडीए के हौसले बुलंद हैं। 
महागठबंधन के नेताओं के आपसी टकराव से ही लोकसभा चुनाव में उनका सूपड़ा साफ हो गया था। महागठबंधन के नेताओं को उससे उसे सीख लेनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में तय है कि उपचुनाव में महागठबंधन के दलों को एनडीए की बजाय आपस में ही लड़ना होगा। महागठबंधन में कांग्रेस के अलावा लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम), उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी शामिल हैं। राजद सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन उसके स्वार्थ भी बड़े हैं। उसने खुद ही गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया। इससे महागठबंधन में दरार आ गई। पहले तो इस दरार को पाटने की कोशिश हुई मगर सभी घटक दलों की महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि महागठबंधन टूटकर बिखर गया। 

उपचुनाव को लेकर सरगर्मी तेज
बिहार में उपचुनाव की तारीख की घोषणा के साथ ही पांच विधानसभा सीटों तथा एक लोकसभा सीट को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। 21 अक्टूबर को पांच विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले उपचुनाव के साथ-साथ रामविलास पासवान के भाई और समस्तीपुर के सांसद रामचंद्र पासवान के निधन से खाली सीट पर भी चुनाव होना है। सभी सीटों पर नतीजों का एलान 24 अक्टूबर को होगा। विधानसभा की पांच सीटों में से चार सीटों पर पिछली बार एनडीए का कब्ज़ा था। वहां से जनता दल यूनाईटेड (जदयू) के विधायक थे। लेकिन लोकसभा चुनाव में उनके सांसद बन जाने के कारण अब उपचुनाव होना है। जाहिर है जदयू अपनी सीटें बचाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करेगा। वैसे भी ये उपचुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए लिटमस टेस्ट हैं। बिहार में 10 माह बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं।   

तेजस्वी की अनुपस्थिति से बढ़ी रार 
बिहार में वर्षाकालीन सत्र चल रहा था। लेकिन तेजस्वी यादव जो नेता प्रतिपक्ष हैं भूमिगत हो गए थे। सदन में रोज उनका इंतजार होता रहा, मगर उन्होंने सदन से दूरी बनाए रखी। इसी दौरान मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस से 200 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई। तेजस्वी तब भी चुप रहे। पीड़ित परिवारों का हालचाल तक पूछना मुनासिब नहीं समझा। इतना ही नहीं गया और औरंगाबाद में सैकड़ों लोगों की जानें लू से गई, मगर तेजस्वी को जनता की याद नहीं आई। लेकिन पटना स्टेशन पर अतिक्रमण हटाने के लिए जैसे ही दूध मंडी को तोड़ा जाने लगा, अचानक से तेजस्वी और तेजप्रताप का दर्द उफान पर आ गया और वे धरना पर बैठ गए। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद महागठबंधन के 'राजकुमार' तेजस्वी का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था। अतिक्रमण हटना ही था। वह हटा भी लेकिन तेजस्वी महागठबंधन में ही अलग-थलग पड़ गए। 

स्वार्थ से पड़ी बिखराव की बुनियाद 
बिहार में पांच विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर महागठबंधन बिखर गया है। राजद ने बिना महागठबंधन की राय के चार सीटों बेलहर से रामदेव यादव, नाथनगर से रजिया खातून, सिमरी बख्तियारपुर से जफर आलम और दरौंदा से उमेश कुमार सिंह के नाम की घोषणा कर दी है। यही नहीं राजद ने विधानसभा की किशनंगज सीट और लोकसभा की समस्तीपुर सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दी है। उसने महागठबंधन के बाकी दलों के लिए यह कहकर कोई सीट नहीं छोड़ी कि सभी सीटें राजद और कांग्रेस की परंपरागत सीटें हैं। अब बाकी दलों के नेता पूछ रहे हैं कि किशनगंज सीट को अपवाद माना जाए तो बाकी सीटें राजद की कैसे हो गईं जबकि 2015 में वहां से जदयू के विधायक चुने गए थे? समस्तीपुर लोकसभा सीट पर पहले भी लोक जनशक्ति पार्टी के रामचंद्र पासवान सांसद थे। ऐसे में हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के सुप्रीमो जीतनराम मांझी ने नाथनगर विधानसभा सीट पर अपनी पार्टी से अजय राय को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। मांझी पहले से इस सीट पर दावा कर रहे थे। मांझी को वीआईपी का भी साथ मिला है। उधर, मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने सिमरी बख्तियारपुर से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है।

रास नहीं आ रही राजद की सफाई
राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि महागठबंधन सिर्फ जिद और अहम से नहीं चलता। उसके लिए कर्तव्य निर्वाह भी करना पड़ता है। मांझी को बिना महागठबंधन के निर्णय के उम्मीदवार घोषित नहीं करना चाहिए था। 'हम' के महागठबंधन छोड़ देने के प्रश्न पर राजद नेता ने कहा कि जिसे जहां जाना हो, जा सकता है। कोई भी गठबंधन के लिए अपनी सीट बर्बाद नहीं कर सकता है। राजद जिन चार सीटों पर प्रत्याशी उतार रही है, वह राजद की परंपरागत सीट रही है। इस पर मुकेश सहनी ने कहा कि राजद को अगर अकेले ही चुनाव लड़ना था तो एक माह पहले ही जानकारी दे देनी चाहिए थी। जीतनराम मांझी भी इस प्रकरण से खासे नाराज हैं। उन्होंने कहा कि 'हमारे साथ धोखा हुआ है। भाजपा के इशारे पर महागठबंधन तोड़ने की कोशिश हो रही है। महागठबंधन तोड़ने वालों को जनता सबक सिखाएगी।' 

एनडीए का पलड़ा भारी 
भाजपा, जदयू और लोजपा का गठबंधन उपचुनाव में भारी पड़ता दिख रहा है। स्वाभाविक है कि जब विपक्ष बिखरा रहेगा तो इसका फायदा सत्ताधारी दल को ही मिलेगा। वैसे भी लोकसभा चुनावों के नतीजों ने एनडीए के पक्ष में हवा बना दी है। जनता दल (यू) के प्रधान महासचिव केसी त्यागी कहते हैं कि महागठबंधन नाम तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दिया हुआ है और जब उस गठबंधन में नीतीश ही नहीं हैं तो महागठबंधन कैसा? वह तो लठबंधन है जहां आपस में लठ बजने शुरू हो गए हैं। बिहार की प्रबुद्ध जनता सब देख रही है और वह उचित समय पर फैसला करेगी। 
     
रघुवंश का अलग राग
महागठबंधन में बिखराव से घबराए राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने बड़ा बयान देकर एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि महागठबंधन के सभी दल राजद में विलय कर जाएं तो सीट बंटवारे का विवाद खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा कि विवाद से राजनीति पर असर पड़ता है और अलग सियासी दुकान चलाने से फायदा नहीं है। अब इस तरह के बयान आने से साफ दिखने लगा है कि महागठबंधन पूरी तरह से बिखर गया है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि लोकसभा में एनडीए ने मात दे दिया और उपचुनाव में महज पांच सीटों पर इतनी भिड़ंत हो गई तो आगामी चुनाव में सीटों को लेकर क्या हो सकता है? आप खुद समझ सकते हैं।

(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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