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गैर-कांग्रेसवाद की जगह अब गैर-भाजपावाद

06/12/2019


गैर-कांग्रेसवाद की जगह अब गैर-भाजपावाद
संजय वर्मा

महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तरह का उलटफेर देखा गया है, उससे एक समय भारतीय राजनीति में कांग्रेस के विरोध में गैर-कांग्रेसी दलों की एकजुटता वाली राजनीति दिखने लगी है। क्या इसे अब गैर-भाजपावाद कहा जा सकता है।

मुंबई के शिवाजी पार्क में 28 नवंबर को उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद अब यह उम्मीद की जानी चाहिए कि महाराष्ट्र में पिछले एक महीने से जारी महा-ड्रामा का पटाक्षेप हो गया है। महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ उसने अपने पीछे प्रश्नों की एक श्रृंखला छोड़ी है। ऐसी क्या बात थी कि पिछले तीस साल से एक दूसरे के साथ चलने वाले भाजपा और शिवसेना को अलग होना पड़ा? क्या इसकी वजह शिवसेना की अपना मुख्यमंत्री बनाने की जिद भर थी? वह कौन सी मजबूरी थी जिसके कारण कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्षता को खतरे में डालते हुए कट्टर हिंदुत्व की पैरोकार शिवसेना के साथ सरकार बनाने का निर्णय लिया? क्या उसके अंदर यह खौफ नहीं कि इस निर्णय के बाद उसके दूसरे परंपरागत मतदाताओं की तरह मुसलमान भी उसका साथ छोड़ जाएंगे?
एनसीपी ने भाजपा के साथ मिलकर एक स्थिर सरकार देने की बजाय विरोधाभासों में भरी इस सरकार में रहना क्यों पसंद किया? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नब्बे के दशक तक चलने वाली गैर-कांग्रेसी राजनीति का स्थान अब गैर-भाजपाई राजनीति ने ले लिया है। शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के साथ आने का एक बड़ा कारण भाजपा को सत्ता से दूर रखना भी था। क्या भाजपा और शिवसेना केवल इसलिए अलग हुए क्योंकि शिवसेना को ढ़ाई साल तक के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहिए थी? ऐसी क्या बात थी कि देश के छोटे-छोटे राज्यों में सरकार बनाने वाली भाजपा ने शिवसेना को मनाने की बजाय ेश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक महाराष्ट्र को हाथों से निकल जाने दिया? दरअसल 50:50 की हिस्सेदारी तो एक बहाना थी, वास्तव में दोनों ही दल एक दूसरे से मुक्त होने की कोशिश पिछले 5-6 वर्षों से कर रहे थे। इस बार उन्हें अवसर मिल गया। 2014 का विधान सभा चुनाव भी दोनों ने अलग-अलग ही लड़ा था और फडणवीस की सरकार एनसीपी के समर्थन की वजह से बनी थी न कि शिवसेना के कारण। शिवसेना ने मजबूरी में भाजपा सरकार को समर्थन दिया था क्योंकि उसके समक्ष दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था।
शिवसेना के अंदर यह छटपटाहट महसूस की जाने लगी कि भाजपा उसका वह ‘स्पेस’ हथियाती जा रही है जिस पर बाला साहेब के दौर में उसका वर्चस्व हुआ करता था। यही कारण था कि शिवसेना ने 2014 का विधानसभा चुनाव अलग लड़ा था और साथ-साथ सरकार चलाने के बावजूद, कांग्रेस एवं एनसीपी के मुकाबले विपक्ष की भूमिका अधिक प्रखरता से निभाती रही। विशेषतौर पर पार्टी मुखपत्र ‘सामना’ के माध्यम से। इस आक्रामकता की वजह से भाजपा के लिए 30 साल पुराना सहयोगी बोझ बन गया। उसे लगता था कि अकेले लड़कर उसकी स्थिति बेहतर हो सकती है, क्योंकि वोट तो नरेंद्र मोदी के नाम से ही मिल रहे थे। लेकिन भाजपा नेतृत्व शिवसेना को एनसीपी की गोद में भी नहीं जाने देना चाहता था तभी लोकसभा चुनाव के पहले जब शिवसेना ने तल्ख तेवर दिखाए तो उसे मनाने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मातोश्री गए थे।
लेकिन चुनाव बाद जब शिवसेना ने 50:50 के फामूर्ले को लागू करने की जिद ठानी तो भाजपा ने चुप्पी साध ली। शिवसेना से बात करने की बजाय, भ्रष्टाचार के कई मामलों में फंसे अजित पवार से संपर्क साध लिया। इसका उद्देश्य बोझ बन गई शिवसेना और अपने राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को महाराष्ट्र में अगल-थलग करना था। अगर भाजपा ने अजित पवार की बजाय शरद पवार से ‘डायरेक्ट डील’ किया होता तो आज के दिन महाराष्ट्र में भाजपा और एनसीपी की सरकार होती। ईडी के केस की वजह से पहले से ही नाराज शरद पवार को उनसे छिपाकर अजित पवार के साथ डील करना नागवार गुजरा और नतीजा सामने है। शरद पवार को भाजपा से कभी कोई परहेज नहीं रहा है और इस बार भी नहीं रहता अगर भाजपा ने अजित पवार की बजाय उनसे बात की होती। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो पार्टी में शिवसेना के साथ जाने को लेकर भारी विरोध था विशेषतौर पर केरल लॉबी की तरफ से। लेकिन शरद पवार ने सोनिया गांधी को समझाया कि शिवसेना महाराष्ट्र में मुसलमानों के विरोध में नहीं है और मुसलमानों को आरक्षण उसके घोषणा पत्र का भी हिस्सा है।
इसके अलावा, शिवसेना अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को ‘सॉμट’ करने को भी तैयार है। सोनिया गांधी को यह भी समझाया गया कि इससे कांग्रेस को अपनी हिंदू-विरोधी छवि से मुक्ति पाने में भी सफलता मिल सकती है जिसके लिए राहुल गांधी ने जनेऊ धारण किया था और मंदिर-मंदिर घूमे थे। महाराष्ट्र जैसे संपन्न राज्य में सरकार का हिस्सा बनने से आर्थिक संकट में कमी आने की संभावना भी थी और विधायकों का दबाव तो था ही। एक दौर में कांग्रेस गठबंधन सरकारों में समर्थन देकर फिर गिराने के लिए कुख्यात थी लेकिन ऐसा तब होता था जब कांग्रेस उन सरकारों में शामिल नहीं होती थी औैर उन्हें बाहर से समर्थन देती थी। लेकिन 2004 के बाद, उसने दस साल तक केंद्र में गठबंधन सरकार चलाई और कई राज्यों में मिली-जुली सरकारों का हिस्सा रही। भाजपा भी नब्बे के दशक से लगातार ही गठबंधन सरकारों का हिस्सा रहती रही है। अभी भी कई राज्यों में वह मिलीजुली सरकार चला रही है। वर्तमान दौर गठबंधन सरकारों का ही है इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार सिर्फ इसलिए नहीं चल पाएगी क्योंकि वह भिन्न विचारधाराओं वाले दलों ने बनाई है। ऐसी सरकारें अब चलती हैं और तब तक चलती हैं, जब तक उनके पास दूसरा कोई विकल्प न हो। आज की राजनीति में विचारधारा की बात करना बेमानी है।
बस एक ही विचारधारा चलती है और वह है ‘सत्ता।’ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महाराष्ट्र ने गैर-भाजपावाद की राजनीति के दरवाजे खोल दिए हैं औैर इसने अस्सी के दशक तक जारी रहे गैरकांग्रेसवाद की जगह ले ली है? 1967 में सबसे पहले इस गैर-कांग्रेसवाद की सोच का उदय हुआ था जिसकी परिणति जयप्रकाश आंदोलन और जनता पार्टी के सत्ता में आने के रूप में हुई थी। जब आरएसएस और वामपंथी शक्तियों ने मतभेदों को किनारे कर इंदिरा गांधी सरकार का विरोध किया था। 1989 में भी वीपी सिंह के इर्द-गिर्द वैसे ही प्रयास हुए थे। जहां तक गैर-भाजपावाद की राजनीति का सवाल है तो इसका आरंभ 1996 में हुआ था जब भाजपा के खिलाफ अधिकतर दलों ने एक होकर पहले देवगौड़ा की सरकार बनाई और फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को एक बार 13 दिन और फिर 13 महीने में गिराया। गौरतलब है कि गैर-कांग्रेसवाद के दौर में कांग्रेस की स्थिति आज से बहुत बेहतर थी और नब्बे के दशक में आरंभ हुए गैर-भाजपावाद के बाद भाजपा भी निरंतर मजबूत होती चली गई।

जाहिरतौर पर देश के अन्य हिस्सों में भी इस गैर-भाजपावाद को आजमाया जाएगा लेकिन सफलता संदिग्ध है। 28 नवंबर को जैसा दृश्य शिवाजी पार्क में था वैसा ही कुछ पिछले वर्ष कर्नाटक में भी नजर आया था।

इसलिए पूर्व के अनुभव यह बताते हैं कि महाराष्ट्र में जिस गैर-भाजपावाद का आरंभ वर्तमान सरकार के गठन के साथ हुआ है, वह भाजपा के लिए लाभकारी भी हो सकता है क्योंकि अब तक जिस हिंदुत्व के एजेंडे को भाजपा, शिवसेना के साथ साझा कर रही थी, उस पर अब उसका एकछत्र कब्जा है। फिर प्रदेश में विपक्ष का जो ह्यस्पेसह्ण है, वहां भी भाजपा अकेली है। जाहिरतौर पर देश के अन्य हिस्सों में भी इस गैर-भाजपावाद को आजमाया जाएगा लेकिन सफलता संदिग्ध है। 28 नवंबर को जैसा दृश्य शिवाजी पार्क में था वैसा ही कुछ पिछले वर्ष कर्नाटक में भी नजर आया था या फिर कोलकाता में भी ऐसा ही एक आयोजन हुआ था लेकिन अंतिम परिणाम सबके सामने है। महाराष्ट्र में गैर-भाजपावाद इसलिए सफल रहा क्योंकि इसके पीछे शरद पवार जैसे मंजे हुए खिलाड़ी का दिमाग था और तीनों ही दलों के समक्ष अस्तित्व का संकट था। अगर अगले पांच साल तक देवेंद्र फडणवीस की सरकार रहती तो महाराष्ट्र में भी विपक्ष की वही हालत हो सकती थी जो केंद्र में नरेंद्र मोदी के आगमन के बाद हुई है। तीनों दलों के साथ आने का यह एक बड़ा कारण था। अभी ऐसा कोई संकेत नहीं कि दूसरे राज्यों में भी विपक्ष इस तरह की किसी मानसिकता से गुजर रहा है।


 
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