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स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देगी मध्य-प्रदेश सरकार

20/05/2020

प्रमोद भार्गव
मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों में जान फूंकने की दृष्टि से अहम् फैसला लिया है। हाथ से बने शिल्पों को भी महत्व दिया जाएगा। चौहान ने कहा है कि अबतक गणेश, दुर्गा की मूर्तियां और दीपावली, होली व रक्षाबंधन पर्वों की सामग्रियां चीन से आयात की जा रही थीं, इस कारण लघु व कुटीर उद्योग प्रभावित हो रहे थे। लेकिन अब प्रदेश और देश में बने उत्पाद और मशीनरी खरीदे जाएंगे। यही नहीं, इन उद्योगों को जो पांच लाख की आर्थिक मदद दी जाती थी उसे बढ़ाकर 25 लाख किया जा रहा है। प्रदेश में तीन लाख करोड़ रुपए की फुटकी सामग्री खरीदी जाती है, इसे अब लघु उद्योगों से ही क्रय किया जाएगा। प्रदेश सरकार ने एक अन्य बड़ा निर्णय यह भी लिया है कि जिन बड़े निर्माण कार्यों के लिए ग्लोबल टेंडर बुलाए जाते रहे हैं, वे अब नहीं बुलाए जाएंगे। यदि इन फैसलों पर अमल होता है तो प्रदेश न केवल रोजगार के संकट से दूर होगा, बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भर बनने के भी सुनहरे अवसर मिलने लग जाएंगे। क्योंकि मध्य-प्रदेश प्राकृतिक संपदा व संसाधनों से भरा है। यदि इनसे वस्तुओं के निर्माण में स्थानीय युवा जुड़ेंगे और उन्हें बाजार भी मिलेगा तो रोजगार का संकट बड़ी मात्रा में दूर होता चला जाएगा।
मर्ज की सही पहचान हो जाए तो मरीज को ठीक होते ज्यादा वक्त नहीं लगता। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत जो भारी-भरकम पैकेज सूक्ष्म, लघु एवं मध्ययम उद्योगों (एमएसएमई) को दिया है। इससे स्वदेशी वस्तुओं की उत्पदकता तो बढ़ेगी ही, बड़ी संख्या में स्थानीय ज्ञान परंपरा से कुशल, अकुशल एवं शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार भी मिलेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दम तोड़ रहे इन उद्योगों को तीन लाख करोड़ रुपए के गिरवी एवं गारंटी से मुक्त कर्ज देने का ऐलान किया है। इससे देश के 45 लाख छोटे कारोबारियों को लाभ होगा और करीब 11 करोड़ लाोगों के रोजगार को जीवनदान मिलेगा। इन छोटे उद्योगों को सबसे बड़ी समस्या कर्ज नहीं मिलने की थी, अब तीन लाख करोड़ के कर्ज तो मिलेंगे ही, इनके लिए आपात सुरक्षा देने के लिए अलग से 70,000 करोड़ रुपए की निधि भी बनाई जाएगी। इसके इतर 20 हजार करोड़ रुपए कोरोना आपदा की वजह से विपत्ति में घिर गए व्यापारियों को फिर से धंधा शुरू करने के लिए दिए जाएंगे। सही काम करने वाले एमएसएमई से जुड़े उद्यमियों को 50 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त देने का प्रावधान किया गया है। इनके उत्पादों को बेचने के लिए डिजिटल सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इन निर्देशों पर अमल करते हुए प्रभावी पहल शुरू कर दी है।
तय है, 1991 के बाद भूमंडलीयकरण के बहाने लागू की गई थी, उसकी एकपक्षीय नीतियों के चलते लघु उद्योगों का जो पहिया जाम हो गया था, उसको गति मिलने की उम्मीद बढ़ गई हैं। इन उद्योगों का देश की जीडीपी में फिलहाल 29 फीसदी का और देश के निर्यात में 48 फीसदी का योगदान है। बहुराष्ट्रीय कंनियों के दबाव में ऐसी नीतियां बनाई गईं, जिससे ग्राम एवं कस्बों में स्थित छोटे उद्योगों की कमर टूट गई। राजनीतिक मजबूरी अथवा अदूरदर्शिता के चलते 2007 में देशी-विदेशी कंपनियों को लघु-उद्योगों में 24 प्रतिशत निवेश की बाध्यता समाप्त कर दी गई थी। इस उपाय को लघु उद्योग क्षेत्र में प्राण डालने का बहाना बताया गया था लेकिन देखते-देखते लघु व मझोले उद्योग डूबते चले गए। इसी हश्र की आशंका भी थी।
दरअसल प्रकृति के बेहिसाब दोहन से करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे करने वाली कंपनियां लघु-उद्योगों के व्यवसाय में इसलिए नहीं जुड़ीं क्योंकि इनमें अकूत धन कमाना संभव नहीं था। नतीजतन देशी-विदेशी उद्योगपतियों ने इन्हें व्यावसायिक दृष्टि से कभी लाभदायी नहीं माना। गोया, न तो लघु उद्योगों में निवेश हुआ और न ही इनकी संख्या बड़ी। हां, एक समय लघु उद्योगों के लिए जो एक हजार के करीब उत्पाद आरक्षित थे, उन्हें घटाकर सवा सौ कर दिया गया। शेष उत्पादों के निर्माण व वितरण की छूट कंपनियों को दे दी गईं। जबकि देश में उदारीकरण की नीतियां लागू होने से पहले, बड़ी संख्या में लघु उद्योग, बड़े और मंझोले उद्योगों की सहायक इकाइयों के रूप में काम करते थे और अपने उत्पादों को इन्हीं कंपनियों को बेच देते थे। कंपनियों के हित में नीतियां बना दी जाने के कारण, लद्यु उद्योगों की भूमिका घटती चली गई और बची-खुची कसर चीन और दूसरे देशों से सस्ते उत्पाद आयात करने की प्रक्रिया ने खत्म कर दी। वैश्वीकरण का यह ऐसा दुखद पहलू था, जिसने ग्राम व छोटे शहरों में स्थित कामगारों को बेरोजगार किया और युवा होते लोगों को महानागरों की ओर रोजगार के लिए पलायन को विवश किया।
अब लघु उद्योगों को जो आर्थिक संरक्षण दिया है, इससे इनमें गति आएगी और खासतौर से चीनी वस्तुओं के आयात में आश्चर्यजनक कमी देखने को मिलेगी। क्योंकि चीन से निकले इस कोरोना वायरस के संबंध में यह भी धारणा है कि चीन ने इसे कृत्रिम तरीके से वुहान की प्रयोगशाला में निर्मित कर दुनिया की अर्थव्यवस्था चौपट करने की दृष्टि से फैलाया है। इस आशय का बयान केंद्रीय एमएसएमई व परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी दिया है। इस कारण चीनी उत्पादों के प्रति लोगों में भय, आक्रोश और नफरत एक साथ देखने को मिल रहे हैं। लिहाजा स्वदेशी उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी। फिलहाल चीन का एलईडी बल्ब और बिजली के अन्य उत्पादों पर शत-प्रतिशत कब्जा है। नतीजतन लघु उद्योगों के दायरे में आने वाले बल्ब, ट्यूबलाइट, एलईडी, पंखे और दीपावली, होली व रक्षाबंधन के लिए सामग्री बनाने वाले कुटीर उद्योग लगभग चौपट हो गए थे। अब इन उद्योगों को एक साथ दो तरह की संजीवनी दी गई है।
आर्थिक मदद के साथ 200 करोड़ तक की वस्तुओं का निर्माण व वितरण लघु उद्योग ही करेंगे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की कैंटीनों पर केवल स्वदेशी उत्पादों के विक्रय के आदेश दे दिए हैं। दस लाख जवानों के परिवारों के पचास लाख सदस्य इन्हीं कैंटीनों से खरीददारी करते हैं। एक जून से यह आदेश लागू हो जाएगा। यह खरीद प्रतिवर्ष करीब 2800 करोड़ रुपए की होती है। कालांतर में इसे थल, वायु और जल सेना की कैंटीनों में भी लागू किया जा सकता है। साफ है, इन उद्योगों को जीवनदान मिलने से उत्पादन में तो भारत आत्मनिर्भर होगा ही, रोजगार के संकट से भी एक हद तक राहत मिलेगी। साथ ही उद्योग और रोजगार का जो केंद्रीयकरण महानगरों में हो गया है, वह विकेंद्रीकृत होकर कस्बों और ग्रामों तक फैलेगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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