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सोनिया शरण में कांग्रेस

10/07/2019

प्रिंयंका गांधी कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष होंगी। हालांकि वे अकेली नहीं होंगी। उनके साथ तीन और लोग भी रहेगे। रही बात अध्यक्ष की तो मल्लिकार्जुन खड़गे और अशोक गहलोत का नाम चल रहा है। एक दलित समुदाय से आते हैं तो दूसरे पिछड़े समुदाय से। तय पार्टी को करना है कि वह दलित पर दांव खेलेंगे या पिछड़ों पर। माना जा रहा कि पार्टी पिछड़े यानी अशोक गहलोत पर दांव खेलना चाहती है। उनका अध्यक्ष बनना लगभग तय माना जा रहा है। इसकी बड़ी वजह उनकी संगठनात्मक क्षमता को माना जा रहा है। उनके इसी जौहर के कारण राहुल गांधी ने उन्हें संगठन महासचिव बनाया था। वह एक दौर था जब उन्हें राहुल का करीबी माना जाता था। चुनाव परिणाम आने के बाद वे अशोक गहलोत समेत कई वरिष्ठ नेताओं पर बिफर पड़े थे। हार का ठीकरा इन लोगों के सिर पर फोड़ा था। प्रियंका गांधी ने हत्यारा तक कह डाला था। वह एक भावनात्मक बयान था। राजनीतिक तो उसे कहा नहीं जा सकता क्योंकि कांग्रेस की हत्या तो उसके अहंकार ने की है।

सच तो यह था कि उन्हें राहुल से ज्यादा अपने बच्चों का राजनीतिक भविष्य दिखाई देने लगा था। वे मान कर चल रहे थे कि वंशवादी राजनीति से निकले राहुल गांधी वंशवाद का पक्ष लेंगे। पर राहुल गांधी तो उल्टी गंगा बहाने पर तुले थे। अध्यक्ष बनने के बाद वे कांग्रेस के लोकतांत्रीकरण में जुट गए। इसलिए कई वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी भी हो गई। लेकिन इससे कांग्रेस का ओल्ड गार्ड कमजोर नहीं हुआ। इसकी एक बड़ी वजह खुद सोनिया गांधी भी हैं।

नेहरू-गांधी परिवार की ठसक ने की है। पार्टी में फलफूल रहे दरबारी संस्कृति ने की है। अगर कांग्रेस इससे बाहर निकलने की कोशिश करती तो शायद परिणाम बेहतर हो सकते थे। पार्टी के लोगों का कहना है कि राहुल गांधी ने कांग्रेस को दरबारी संस्कृति से बाहर लाने की कोशिश की। लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। बताया जाता है कि सोनिया गांधी ने जिन नवरत्नों को पाला पोसा है, वे राहुल की तामीरदारी करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनको लगता है कि राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस सुरक्षित नहीं है। सवाल यह है कि ऐसा उन्हें 2013 में क्यों नहीं लगा था? यही वह साल है जब राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वह जनवरी का महीना था। जयपुर के खुशनुमा मौसम में कांग्रेस की चिंतन बैठक हुई थी। उसी बैठक में नेहरू-गांधी परिवार के चिराग राहुल गांधी को विरासत सौंपने की पहल हुई थी। उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था। यह निर्णय उनके सक्रिय राजनीति में आने के तकरीबन सात साल बाद हुआ था।

2004 में वे अमेठी के सांसद बने थे। तब से उन्हें राज गद्दी के लिए तैयार किया जा रहा था। उनके ही सामने 2009 का आम चुनाव हुआ। 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका रही। हालांकि उसके बाद भी कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हुआ। कहने का मतलब यह है कि राहुल गांधी का लिटमस टेस्ट 2012 में हो चुका था। उत्तर प्रदेश में वह कोई चमत्कार नहीं दिखा पाए थे। फिर भी 2013 में उन्हें उपाध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के आला नेता तैयार थे। तब किसी ने सवाल नहीं खड़ा किया। सोनिया गांधी के निर्णय को सबने मूक सहमति दे दी। तो राहुल गांधी कांग्रेस को सुधारने निकल पड़े। कोशिश उस कांग्रेस कार्य समिति को बदलने की जिसे सोनिया गांधी ने पहले ही दरबारी बना दिया था। उस दरबारी पद्धति को राहुल बदलने आए। दरबारियों को लगा कि उनकी कुर्सी खतरे में है। फिर क्या था? कांग्रेस में संघर्ष शुरू हो गया। वह संघर्ष नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच नहीं था। वह संघर्ष कांग्रेस को लोकतांत्रिक बनाने का था। राहुल गांधी उसके अगुवा बने हुए थे और वरिष्ठ कांग्रेस उसके विरोधी। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह का वाकया इसकी नजीर है। राहुल गांधी पंजाब में नया नेतृत्व गढ़ रहे थे। वे चाहते थे कि नई पीढ़ी आगे आए।

कैप्टन को यह पसंद नहीं था। लिहाजा वे बागी हो गए। राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अपरिपक्व बताने लगे। आलाकमान पर दबाव बनाने लगे। सोनिया गांधी को भी पुत्रमोह था। वे नहीं चाहती थीं कि वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के खिलाफ हो जाएं। लिहाजा वरिष्ठ नेताओं के सामने उन्होंने आत्म समर्पण कर दिया था। वे जो कह रहे थे सोनिया गांधी मान रहीं थीं। कारण बस एक था, क्षेत्रीय क्षत्रपों को राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए तैयार करना था। इसी वजह से कैप्टन से अहमद पटेल तक की ठसक को बर्दाशत किया गया। तब जाकर प्रियंका राग बंद हुआ और राहुल गांधी को लेकर आम सहमति बनी। पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुलमय हो गए। वे राहुल गांधी में कांग्रेस का भविष्य देखने लगे। पर सच तो यह था कि उन्हें राहुल से ज्यादा अपने बच्चों का राजनीतिक भविष्य दिखाई देने लगा था। वे मान कर चल रहे थे कि वंशवादी राजनीति से निकले राहुल गांधी वंशवाद का पक्ष लेंगे। पर राहुल गांधी तो उल्टी गंगा बहाने पर तुले थे। अध्यक्ष बनने के बाद वे कांग्रेस के लोकतांत्रीकरण में जुट गए। इसलिए कई वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी भी हो गई। लेकिन इससे कांग्रेस का ओल्ड गार्ड कमजोर नहीं हुआ। इसकी एक बड़ी वजह खुद सोनिया गांधी भी हैं।

संघर्ष नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच नहीं था। वह संघर्ष कांग्रेस को लोकतांत्रिक बनाने का था। राहुल गांधी उसके अगुवा बने हुए थे और वरिष्ठ कांग्रेस उसके विरोधी। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह का वाकया इसकी नजीर है। राहुल गांधी पंजाब में नया नेतृत्व गढ़ रहे थे। वे चाहते थे कि नई पीढ़ी आगे आए। कैप्टन को यह पसंद नहीं था। लिहाजा वे बागी हो गए। राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अपरिपक्व बताने लगे।

ओल्ड गार्ड उनके ही सिपहसलार रहे हैं। इस वजह से जब भी उन्हें सकंट महसूस होता था, सोनिया गांधी के पास पहुंच जाया करते थे। इस वजह से कांग्रेस में ही सत्ता के दो केन्द्र बन गए। लिहाजा राहुल गांधी अध्यक्ष होने के बाद भी स्वतंत्र रुप से निर्णय नहीं ले पा रहे थे। उनके हर निर्णय पर वीटो की आशंका मडराती रहती थी। इस वजह से राहुल गांधी ने पद छोड़ने का मन बना लिया। इसकी एक वजह चुनाव के दौरान वरिष्ठ नेताओं से मिला फीडबैक भी है। वह यह कि कांग्रेस सत्ता में वापसी कर रही है। पार्टी के डाटा विशेषज्ञय प्रवीन चक्रवर्ती ने तो 180 सीट मिलने की घोषणा भी कर दी थी। राहुल गांधी समेत पूरी पार्टी आश्वस्त थी। 23 मई को मीडिया का जमावड़ा नौ बजे तक 24 अकबर रोड पर ही था। सबको कहा जो गया था कि कांग्रेस सरकार बना रही है। कुछ चैनलों को चेतानवी भी दी गई थी। उनसे कहा गया था कि 23 मई को कांग्रेस की सरकार बन रही है और 24 मई को तुम्हारे संस्थान पर ताला लगा दिया जाएगा। इस तरह के माहौल में कांग्रेसी 23 मई को जगे थे। लेकिन नौ बजे तक सब सदमे में चले गए।

तब जाकर राहुल गांधी को पता चला कि चुनाव आंकड़ों पर नहीं जमीन पर लड़ा जाता है। उसमें कांग्रेस कहीं ठहरती। उसके नेता तो उनकी तरह ही आराम पसंद हो गए है। तभी तो फोन पर कार्यकर्ता बनाए गए थे। उनकी वजह से ही राहुल गांधी को अमेठी छोड़ कर भागना पड़ा था। उसका राजनीतिक संदेह ऐसा हो गया कि अमेठी जैसी सीट भी कांग्रेस के हाथ से निकल गई। बतौर अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए यह बहुत शर्मनाक स्थिति थी। एक तो वे हार भी चुके थे और दूसरा पार्टी के वरिष्ठ नेता उनके साथ नहीं खड़े थे। लिहाजा उन्होंने पार्टी पद छोड़ने का निर्णय ले लिया। तो नए अध्यक्ष की खोजबीन शुरू हो गई। पहले एके एटंनी से पूछा गया तो उन्होंने अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया। इसी तरह का जवाब सुशील कुमार शिंदे का भी था। उसके बाद अशोक गहलोत और मल्लिकार्जुन खड़गे से बात हुई। मना किसी ने नहीं किया। लेकिन संभवाना अशोक गहलोत की ज्यादा बताई जा रही है। हालांकि खड़गे चौंका सकते है। खैर अध्यक्ष जो बने हाल उसका डॉ. मनमोहन सिंह वाला ही होगा। कुर्सी पर तो वह रहेगा पर कांग्रेस कार्य समिति में निर्णय सोनिया गांधी का चलेगा। इसीलिए कहा जा रहा है कि कांग्रेस फिर से सोनिया गांधी की शरण में चली गई है।

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